Sabarimala Case Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट में आस्था बनाम अंधविश्वास पर तीखी बहस, सती प्रथा का भी जिक्र

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई अब एक बहुत ही दिलचस्प मोड़ (Sabarimala Case Supreme Court) पर आ गई है। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच इस समय एक बहुत ही मुश्किल सवाल का जवाब ढूंढ रही है कि क्या धर्म के मामलों में कोर्ट दखल दे सकता है? बुधवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में माहौल तब गर्मा गया जब ‘अंधविश्वास’ और ‘सती प्रथा’ जैसी बातों का जिक्र हुआ।

जज और सरकार के बीच तीखी बहस (Sabarimala Case Supreme Court)

सुनवाई के दौरान जस्टिस अमानुल्लाह ने एक बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि अदालत को यह तय करने का पूरा हक है कि कौन सी चीज धर्म का हिस्सा है और क्या महज एक ‘अंधविश्वास’ है। उन्होंने दलील दी कि अगर कोर्ट किसी चीज को अंधविश्वास करार देता है, तो सरकार उस पर कानून बना सकती है।

लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर तुरंत ऐतराज (Sabarimala Case Supreme Court) जताया। मेहता ने कहा कि जो बात किसी एक के लिए अंधविश्वास हो सकती है, वही बात किसी दूसरे के लिए उसकी गहरी आस्था हो सकती है। उन्होंने साफ कहा कि जज चाहे कितने भी विद्वान क्यों न हों, उन्हें यह तय नहीं करना चाहिए कि किसी धर्म की परंपरा अंधविश्वास है या नहीं।

सती प्रथा और जादू-टोने का उदाहरण

जब सरकार ने कहा कि अदालतों को इन मामलों से दूर रहना चाहिए, तो बेंच ने एक कड़ा उदाहरण (Sabarimala Case Supreme Court) दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर हम दखल नहीं देंगे, तो फिर सती प्रथा, जादू-टोना और नरभक्षण जैसी चीजों का क्या होगा? क्या इन्हें भी धर्म मानकर छोड़ दिया जाए? कोर्ट का कहना था कि आप यह नहीं कह सकते कि ‘आखिरी फैसला सिर्फ सरकार का होगा’। कोर्ट को यह देखना ही होगा कि क्या कोई परंपरा इंसान के अधिकारों के खिलाफ तो नहीं है।

धर्म को समझने का अपना नजरिया

इसी बीच जस्टिस नागरत्ना ने एक बहुत ही बैलेंस बात कही। उन्होंने कहा कि अगर हमें यह देखना है कि कोई धार्मिक परंपरा जरूरी है या नहीं, तो हमें उसी धर्म के नजरिए से उसे देखना होगा। हम किसी दूसरे धर्म के चश्मे से उसे गलत नहीं ठहरा सकते। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि ये सब तभी तक ठीक है जब तक इससे समाज की नैतिकता या किसी की सेहत को नुकसान न पहुंचे।

क्या है असली विवाद?

पूरा मामला अनुच्छेद 25 और 26 के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जो हमें धर्म की आजादी देते हैं। कोर्ट अब यह तय करने की कोशिश कर रहा है कि धर्म की आजादी बड़ी है या फिर बराबरी का अधिकार। सॉलिसिटर जनरल का कहना है कि किसी खास उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने से रोकना भेदभाव नहीं, बल्कि एक परंपरा है। अब देखना यह है कि कोर्ट इस पर क्या अंतिम फैसला (Sabarimala Case Supreme Court) सुनाता है।

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