बस्तर के घने जंगलों और बीहड़ों की जिस खामोशी में कभी माओवादियों के भीतर सुरक्षा बलों के कदमों की आहट का खौफ गूंजता था, आज वहीं जीवन की एक नई और सुकून भरी कहानी लिखी जा रही है।
जिन जंगलों, पहाड़ों और झरनों की ओट में माओवादी अपनी जिंदगी बिताते थे, खौफ के साये में वे कभी प्रकृति की इस अनुपम सुंदरता को महसूस नहीं कर सके। लेकिन राज्य शासन की पहल और नुवा बाट (Nuva Baat Bastar) अभियान ने अब हालात बदल दिए हैं।
इसी बदलाव की बानगी तब देखने को मिली, जब हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे बीजापुर जिले के 30 पुनर्वासित युवाओं ने बस्तर के विश्वप्रसिद्ध चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात का भ्रमण किया। कभी इन्हीं जंगलों और चट्टानों की ओट में ये युवा पुलिस और सुरक्षा बलों की दहशत में रातें गुजारते थे, हर पल जान का जोखिम बना रहता था। आज वही युवा (Nuva Baat Bastar) के तहत निश्चिंत होकर, बिना किसी डर के, जलप्रपात की गिरती धाराओं को निहारते नजर आए।
चित्रकोट और तीरथगढ़ भ्रमण के दौरान उनके चेहरों पर अब सुरक्षा बलों का खौफ नहीं, बल्कि एक पर्यटक का कौतूहल, आत्मविश्वास और गहरी शांति दिखाई दे रही थी। यह दृश्य अपने आप में इस बात का प्रमाण था कि नुवा बाट (Nuva Baat Bastar) अभियान ने केवल उनकी राह ही नहीं बदली, बल्कि सोच और जीवन दृष्टि को भी नई दिशा दी है।
जिला प्रशासन द्वारा की गई इस संवेदनशील और अनूठी पहल का उद्देश्य इन युवाओं को मानसिक तनाव, हिंसक अतीत और डर की परछाइयों से दूर ले जाना है। साथ ही उन्हें समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक और सुरक्षित स्थान दिलाना भी इस प्रयास का अहम हिस्सा है। बीजापुर के इन 30 युवाओं सहित कुल 60 पुनर्वासित युवा वर्तमान में नुवा बाट (Nuva Baat Bastar) कार्यक्रम के अंतर्गत पुनर्वास का लाभ ले रहे हैं।
ये सभी युवा अब हथियार छोड़कर अपने हाथों में हुनर थाम चुके हैं। प्रशासन की ओर से 30 युवाओं को ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान के माध्यम से राजमिस्त्री कार्य का तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे निर्माण क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकें। वहीं शेष 30 युवा लाइवलीहुड कॉलेज में फूड एंड बेवरेज का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं, जिससे वे भविष्य में हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में रोजगार और स्वरोजगार के अवसर हासिल कर सकें।
हथियार छोड़ हाथों में थामा हुनर
इस परिवर्तन को और अधिक आत्मीय तथा भरोसे से भरा बनाने के लिए बस्तर जिला प्रशासन ने एक और मानवीय पहल की। नुवा बाट (Nuva Baat Bastar) के तहत प्रशिक्षण ले रहे सभी पुनर्वासित युवाओं को वेलकम किट प्रदान की गई। यह किट केवल जरूरत का सामान नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि समाज ने उनके अतीत को पीछे छोड़ते हुए उन्हें खुले दिल से स्वीकार किया है।
कभी बीहड़ों के अंधेरे, डर और हिंसा के बीच जीवन बिताने वाले ये युवा आज खुले आसमान के नीचे तीरथगढ़ जलप्रपात के सौंदर्य का आनंद ले रहे हैं। यह सफर इस बात का संकेत है कि बस्तर में शांति, विश्वास और विकास की जड़ें अब गहरी होती जा रही हैं। नुवा बाट (Nuva Baat Bastar) अभियान ने यह साबित कर दिया है कि संवाद, संवेदना और अवसर मिलें, तो सबसे कठिन रास्ते भी नई मंजिल की ओर ले जा सकते हैं।

