नवप्रदेश स्पेशल खबरों की मरम्मत : नोटशीट से मची हड़कम्प, गालीजीवी साहब से सब दुखी, दर्जा प्राप्त नेताओं की पीड़ा

नोटशीट से मची हड़कम्प

लम्बे समय बाद राज्य का परिवहन विभाग विभागीय अफसरों की हरकतों के चलते फिर सुर्खियों में हैं । डेपुटेशन पर विभाग में पंहुचे पुलिस के अफसरों को एक्सटेंशन के लिए बार्गनिंग फाइव स्टार होटल में हो रही है। हालंाकि बात का बतंगड़ और तिल का ताड़ बनते ही महकमें में अन्दरखाने मची हड़कम्प से फिलहाल मामलों को स्थगित रखा गया हैं। लेकिन इससे ज्यादा बड़ी दूसरी खबर है कि मंत्री के यहा ओएसडी बनकर जाने वाले एक तेज तर्राट अफसर को रोकने की कोशिशे जिस लेवल पर हो रही हंै उस लेवल को अभी तक किसी ने पार होते नही देखा। यहा तक कि सीएस के सलेक्शन के समय भी। गौरतलब है कि पिछली सरकार में पूर्व मुख्यमंत्री के एसीएस रहे सुब्रत साहू को महज इसलिए चीफ सेकेटरी की दौड़ से बाहर कर दिया गया कि वे पांच साल पिछली सरकार के खास रहे। कमोबेश कुछ ऐसा ही इत्तेफाक इस अफसर के साथ भी है। क्योकि अफसर इतना तेजतर्राट है कि पिछली सरकार में पोलिटिकल मेनेजमेन्ट का मास्टरमाइंड माना जाता था। मौजूदा सरकार में अपने टेलेन्ट का ऐसा जलवा बिखेरा कि मंत्री इस टेलेन्ट के कायल हो गए और नोटशीट चलवा दी। इससे इतनी हड़कम्प है कि इस अफसर को रोकने के लिए दिल्ली तक फीड बैक भेजा जा रहा हैं और संगठन के जो लोग पश्चिम बंगाल में चुनाव में लगे है उनको भी खबर कर दी गई है। अब देखना यह है कि जीतता कौन हैं सत्ता और संगठन का इकबाल या अफसर का टेलेन्ट।

साय, राय और गाय

सवा दो साल की सरकार के कामकाज के बारे में हर तीसरा आदमी एक,दूसरे और तीसरे से पूछ रहा है कि साय सरकार कैसी चल रही है? जाहिर है तीनो की राय एक नही हो सकती है लेकिन ‘ना काहू से दोस्ती और न काहू से बैर’ की तर्ज पर तीनो की राय का एक लब्बोलुआब निकलता है कि ‘गरीब की गाय विष्णु देव साय’ दरअसल यह प्रतिक्रिया तब आई जब मुख्यमंत्री साय ने दो दिन पहले आदिवासी परिवारों को दो गाय देने की घोषणा की थी। रायशुमारी के झंडाबरदारों की जुगाली कहती है कि आदिवासियों को गाय मिले न मिले लेकिन 22 साल बाद आदिवासियों को ‘साय’ तो मिल गए मुख्यमंत्री के रूप में ।

दर्जा प्राप्त नेताओं की पीड़ा

करीब दो दर्जन से अधिक कैबीनेट और राज्य मंत्रियों के दर्जा प्राप्त प्रतिभाशाली निगम मंडल के अध्यक्षों, उपाध्यक्षों और संगठन के कुछ स्वनामधन्य नेताओं को अपनी सरकार की कार्यप्रणाली से भारी शिकायत है। लेकिन अनुशासन का तकाजा यह है कि चाह कर भी कही बोल नहीं पाते। अलबत्ता आपस में अपना दु:ख बांट लेते हैं। दुख का मसौदा कुछ इस प्रकार है-राज्य के बाहर से कम से कम 30 से 40 वेंडर मंत्रालय से लेकर सरकार के अन्य विभागों में लगभग 400 करोड़ के काम कर रहे हैं जिसमें सप्लाई से लेकर बहुत सारे सेगमेन्ट है। लेकिन ये वेंडर किसी भी नेता या मंत्री को भाव नहीं दे रहे है। दर्जा प्राप्त नेताओं का दु:ख यह है कि इनके विभाग के बजट से जुड़ी कोई भी फाईल मंत्रालय जाती है तो वित्त विभाग का अड़ंगा आ जाता है। जिन उम्मीदों के साथ दर्जा पाया था वे उम्मीदे खत्म होती दिख रही है। इसलिए ये दर्द बाहर आ रहा है। असन्तुष्टों का तर्क यह है कि यदि यही काम हमारे मार्फत होता तो कम से 40 विधानसभा क्षेत्रों के कार्यकर्ता उपकृत होते, जो आने वाले चुनाव में पार्टी का झंडा उठाते।

गालीजीवी साहब से सब दुखी

जब कोई अरविंद केजरीवाल टाईप आईएएस अफसर किसी जिले का कलेक्टर बन जाता है तो उसका गुरूर गाड़ा में नहीं समाता। पूरे जिले को अपनी जागीर समझने लगता है। यहां तक कि खुद को खुदा से भी दो हाथ ऊंचा समझने का मुगालता पाल लेता है। होता डीएम है लेकिन रुतबा ऐसे दिखाता है मानो किसी प्रदेश का सीएम या देश का पीएम हो। ऐसे ही एक जिले के कलेक्टर साहब की साहबी उनके मातहतों के दिल को दुखा रही है। उक्त गालीजीवी कलेक्टर अधीनस्थ अफसरों और कर्मचारियों से अक्सर गालीगलौज करते रहते हैं। यह ठीक है कि उनकी दी गई गाली को कोई लेता नहीं है वरना सबके पास गालियों का जखीरा जमा हो जाता। बेचारे अधीनस्थ अधिकारी और कर्मचारी गाली खाकर भी बड़े साहब के हुजूर में यस सर… यस सर… करने पर विवश होते हैं क्योंकि पापी पेट का सवाल है। नौकरी सबको करनी है लेकिन मन ही मन वे भी गालीबाज अफसर को जमकर गरियाते है। कायदे से ऐसे गालीबाज अफसरों को तो पुलिस महकमे में होना चाहिए। लगता है वे आईपीएस बनने ही गए थे लेकिन गलती से हुई मिस्टेक के कारण आईएएस बन गए। बहरहाल उनके मातहतों को ईश्वर अपमान रुपी खून का घूंट पीते रहने की शक्ति प्रदान करे। ओम् शांति।

दुख तो अपना साथी है…

छत्तीसगढ़ मंत्रालय में पदस्थ कई अफसरों का दुख भी कम होने का नाम नहीं ले रहा है। वे मन मसोस कर जैसे जैसे वक्त गुजार रहे हैं। उनको तकलीफ इस बात की है कि कल तक उनकी पांचों उंगलियाँ घी में और सिर कढ़ाई में होता था लेकिन आज उन्हे रुखी सूखी पर गुजारा करना पड़ रहा है। उनका प्रतिद्वंद्वी मलाई में मुंह मार रहा है और उन्हें छाछ भी नसीब नहीं हो रही है। ऐसे ही एक अफसर की दूसरे से ठन गई है। दोनों एक दूसरे की जड़ खोदने के लिए सब्बल लेकर भिड़े हुए हैं। दोनों के बीच शीत युद्ध चल रहा है। इससे दोनों का नुकसान हो रहा है। इसका दुष्परिणाम पूरा डिपार्टमेंट भुगत रहा है। दोनों ने तय कर लिया है कि न मैं खाऊंगा न किसी को खाने दूंगा। नतीजतन अधीनस्थ स्टाफ के लिए भी भूखे पेट भजन करने की नौबत आ गई है। यदि यह जंग लंबी चली तो सब बर्बाद हो जाएंगे। वे चाहते हैं कि किसी तरह इन दो शक्तिशाली अफसरों के बीच चल रही वर्चस्व की लड़ाई खत्म हो ताकि सबके साथ सबका विकास हो सके जो इस जंग के कारण रुका हुआ है और सबके लिए विनाशक सिद्ध हो रहा है। कुछ लोग दोनों महारथियों के बीच सीजफायर कराने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन सफल नहीं हो पा रहे हैं। एक अमेरिका बना हुआ है जो प्रतिद्वंद्वी को नेस्तनाबूत करने की कसम खाए बैठा है तो दूसरा ईरान की तरह हेकड़ी दिखा रहा है और कह रहा है कि – मै झुकेगा नहीं साला..। भले ही डूब जाएगा लेकिन सबको डूबोकर ही दम लेगा। इस महायुद्ध से दुखी अधीनस्थ स्टाफ अपने डिपार्टमेंट के डोनाल्ड ट्रंप और जूनियर खामेनेई को सद्बुद्धि देने की ईश्वर से कामना कर रहे हैं और इसके लिए हवन पूजन कराने पर भी गंभीरतापूर्वक विचार कर रहे हैं।

दुखी तो कार्यकर्ता भी हैं…

नेताओं का दुख अपनी जगह है कार्यकर्ता भी कोई कम दुखी नहीं है। वे भी बहुत प्रतिभाशाली हैं ओर अपनी प्रतिभा से अपने क्षेत्र के लोगों को लाभान्वित करना चाहते हैं। जन सेवा करने को जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली की तरह छटपटा रहे हैं?। नगरीय निकाय चुनाव निपटे डेढ़ साल हो गया है लेकिन अभी तक एल्डरमैन पदों पर नियुक्ति नही हो पाई है। बेचारे बेसब्री से एल्डरमैन बनने की बाट जोह रहे हैं। अपने आकाओं के बंगलों की परिक्रमा कर जूते चप्पल घिस रहे हैं लेकिन नतीजा शून्य बटे सन्नाटा ही निकल रहा है। अब तो कई प्रतिभाशाली कार्यकर्ताओं ने उम्मीद का दामन ही छोड़ दिया है। इनमें से अधिकांश कार्यकर्ता ऐसे हैं जिन्हें पार्षद पद के टिकट से वंचित किया गया था और पार्टी प्रत्याशी को जीताने की जिम्मेदारी दी गई थी इस वादे के साथ कि तुम्हे एल्डरमैन पद से नवाजा जाएगा। बेचारों ने पार्टी प्रत्याशी को विजयी बनाने जमकर पसीना बहाया। तन, मन धन से पार्टी की सेवा की लेकिन एल्डरमैन पद अभी तक उनके लिए मृगमरिचिका बना हुआ है। दुखी आत्मा बनकर गाते फिर रहे हैं कि – दिल के अरमां आंसुओं में बह गए, हम वफा कर के भी तन्हा रह गए..?

रीलबाजी 1 -हाय रानी, हैलो रानी के चक्कर में लाइन अटैच

सोशल मीडिया पर रील बाजी के चक्कर में मस्तूरी थाने के कांस्टेबल ने हाय रानी हैलो रानी गाने पर पत्नी के साथ डांस किया। केवल डांस कर लेते तो भी गनीमत थी, भाई साहब ने रील भी बना ली और सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर दिया। वीडियो वायरल हो गया। पुलिस कप्तान के पास जब वीडियो पहुंची तो साहब ने एक झटके में निपटा दिया। महकमे में लोग भी अब देवानंद का मजाक उड़ा रहे हैं। लोग मजे ले रहे हैं कि कांस्टेबल को ठुमके लगाने की जरूरत क्यों पड़ी। 60 के दशक में हिंदी फिल्मों के सदाबहार हीरो देवानंद के नाम का असर है या हाय रानी हैलो रानी जैसे गाने के बोल का असर, कह पाना मुश्किल है।

रीलबाजी 2-तलवार लहराई, वकील साहब अंदर

कोर्ट में इंसाफ दिलाने वाले वकील साहब भी रीलबाजी के चक्कर में अँदर हो गए। दरअसल, वकील साहब ने हर-हर महादेव गाने पर खुलेआम तलवार लहराई। घर के सामने कार खड़ी कर शराब पी। पिस्टल, तलवार, फरसा लेकर आने जाने वाले लोगों को डराया। इसका वीडियो भी बनाया। वीडियो वायरल होते ही पुलिस ने घर के बाहर धमाचौकड़ी मचाने वाले वकील को बड़े घर के अंदर भेज दिया। अब वकील साहब कोर्ट में जमानत की अर्जी लगा रहे हैं।

राजधानी में नल्ले ही नल्ले

सर्वे रिपोर्ट आई है कि राजधानी रायपुर जिले में सबसे ज्यादा 16 लाख 68 हजार 185 गैर कार्यशील लोग रहते हैं। गैर कार्यशील लोग यानी नल्ले। ये लोग कोई काम नहीं करते। नल्लों की संख्या के लिहाज से दूसरे नंबर पर बिलासपुर है जहां 12 लाख 3 हजार 22 और तीसरे नंबर पर दुर्ग है जहां 11 लाख 31 हजार 110 नल्ले हैं। ये आंकड़े सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हैं। राजधानी में राजनीतिक दलालों और नौकरशाहों के लिये कमीशनखोरी या लायजनिंग करने वालों की काफी बड़ी तादाद है। इस वर्ग के लोगों की आमदनी भी बहुत होती है, लेकिन शायद उन्हें कार्यशील लोगों की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाता है। नल्लों की तादाद में अव्वल आने का राज भी यही माना जा रहा है।

समझ आया… छत्तीसगढ़ में गांजे की खपत क्यों बढ़ रही

प्रदेश के बजट में राजधानी में तात्यापारा शारदा चौक रोड का चौड़ीकरण करने की बजाय फ्लाईओवर बनाने के लिये सौ करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस मामले को लेकर राजनीति गरमा रही है। भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल और कांग्रेस के पूर्व महापौर ऐजाज ढेबर चौड़ीकरण की मांग पर जोर दे रहे हैं। सरकार ने फ्लाईओवर बनाने की तैयारी कर ली है। बड़ा मुद्दा ये है कि अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि निर्माण कौन करेगा। निगम कमिश्नर का कहना है कि पीडब्लूडी को फ्लाईओवर बनाना है। पीडब्लूडी अफसर कह रहे हैं कि विभाग के बजट में फ्लाईओवर का निर्माण शामिल नहीं है। बजट में सौ करोड़ का प्रावधान होने के बावजूद अगर निर्माण एजेंसी तय नहीं है, इसका मतलब साफ है कि सारे विभाग मदहोश हैं। आसानी से समझा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में गांजे की खपत क्यों बढ़ रही है।

विभाग को होश आया

छत्तीसगढ़ के आदिम जाति विभाग ने कमाल कर दिया है। विभाग में आदिम जाति वर्ग के कल्याण के लिये दर्जनों योजनाएं हैं। भारी भरकम बजट का प्रावधान भी किया जाता है। प्रदेश में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाली आबादी यानी एससी एसटी वर्ग के हितों के लिये बने विभाग को मिले बजट का 32 फीसदी हिस्सा खर्च नहीं हो पाया। अफसर पता नहीं किस कुंभकर्णी नींद में सोते रहे कि वित्तीय वर्ष समाप्त होने के बाद ही विभाग को होश आया कि सिर्फ 68 प्रतिशत बजट खर्च हो पाया है।

भ्रष्टाचार में एक और नवाचार!!! छोटी कर दी साड़ी की साइज

महिला बाल विकास विभाग में भ्रष्टाचार का नवाचार इन दिनों प्रदेश में चर्चा में है। प्रदेश की एक लाख 94 हजार आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को साड़ी बांटने में गड़बड़ घोटाला कर दिया गया। विभाग ने खादी ग्रामोद्योग को साड़ी की सप्लाई करने का आदेश दिया। टेंडर प्रक्रिया में साढ़े 5 मीटर की साड़ी सप्लाई करनी थी। लेकिन भाई लोगों ने 5 मीटर की साड़ी सप्लाई कर दी। इस वजह से आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को साड़ी पहनने में दिक्कत हो रही है। धोने पर साड़ी सिकुड़कर और छोटी हो गई। रंग भी उतर गया। बताया जा रहा है कि 9 करोड़ 70 लाख रुपए के टेंडर में 50 परसेंट का घोटाला किया गया है। अब मामला उजागर होने पर जांच शुरू हो गई है। साड़ी का रंग उतरने के बाद अब इस मामले में जिम्मेदार अफसरों और साड़ी सप्लायरों के चेहरे का रंग भी उड़ गया है।

टेक्निकल यूनिवर्सिटी के कॉलेज में चोरी की नई टेक्नॉलॉजी!!!

सीएसवीटीयू के संघटक शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज अंबिकापुर में चोरी के मामले में नवाचार देखकर अफसर भौंचक्के रह गए हैं। यहां के कम्प्यूटर लैब में कम्प्यूटर तो रखे हैं लेकिन कंप्यूटर के भीतर सारे पुर्जे गायब हैं। यानी, लैब में कम्प्यूटर का खोखा (केबिनेट) रखा है। चोरों ने रैम, हार्ड़ डिस्क, मदरबोर्ड, की बोर्ड और माउस निकाल लिये हैं। इस मामले का खुलासा होने के बाद जांच शुरू हो गई है। जांच में पता चलेगा कि इंजीनियरिंग कॉलेज में चोरी की नई टेक्नॉलॉजी किसने ईजाद की है। फिलहाल, तो इस घटना से कुलपति से लेकर इंजीनियरिंग पढ़ाने वाले प्रोफेसर हैरान-परेशान हैं।

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