देशभर में महिलाओं और छात्राओं के लिए मासिक धर्म अवकाश (Menstrual Leave) पर राष्ट्रीय नीति बनाने (Menstrual Leave Policy India) की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने इसे खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि इसे कानून के जरिए अनिवार्य कर दिया गया तो इसका महिलाओं के करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
अदालत ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और जस्टिस Joymalya Bagchi की पीठ ने कहा कि इस तरह का प्रावधान लागू होने पर नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने में संकोच कर सकते हैं। अदालत के अनुसार इससे अनजाने में महिलाओं से जुड़े जेंडर स्टीरियोटाइप और मजबूत हो सकते हैं।
नीति पर विचार कर सकता है सक्षम प्राधिकरण
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर संबंधित सक्षम प्राधिकरण प्रतिनिधित्व मिलने पर विचार (Menstrual Leave Policy India) कर सकता है। सभी हितधारकों से सलाह लेकर मासिक धर्म अवकाश से जुड़ी नीति बनाने की संभावना का अध्ययन किया जा सकता है।
सुनवाई में दिया गया उदाहरण
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि कुछ राज्यों और संस्थानों ने पहले ही इस दिशा में कदम उठाए हैं। उदाहरण के तौर पर Kerala के कुछ शिक्षण संस्थानों और कई निजी कंपनियों में कर्मचारियों को स्वैच्छिक रूप से Menstrual Leave देने की व्यवस्था है।
स्वैच्छिक छुट्टी का किया स्वागत
अदालत ने कहा कि यदि कोई संस्था स्वेच्छा से ऐसी छुट्टी (Menstrual Leave Policy India) देती है तो यह स्वागत योग्य कदम है। लेकिन इसे कानून के माध्यम से अनिवार्य करना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे रोजगार के अवसरों पर असर पड़ सकता है।
