बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सहायक संचालक कृषि पद की भर्ती से जुड़े दो मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि विज्ञापन में यदि कृषि विषय में स्नातकोत्तर डिग्री अनिवार्य योग्यता के रूप में निर्धारित है, तो भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद हॉर्टिकल्चर (उद्यानिकी) की डिग्री को समकक्ष मानकर किसी अभ्यर्थी को पात्र नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) को पात्र अभ्यर्थियों की अंतिम चयन सूची कानून के अनुसार दोबारा तैयार करने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने दोनों याचिकाओं पर 24 अगस्त 2026 को आदेश पारित किया। मामला वर्ष 2020 में पीएससी द्वारा जारी सहायक संचालक कृषि के भर्ती विज्ञापन से संबंधित था। विज्ञापन में मान्यता प्राप्त कृषि विश्वविद्यालय से कृषि विषय में स्नातकोत्तर डिग्री को अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता निर्धारित किया गया था।
विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट भी नहीं मानी
याचिकाकर्ता ने भुजबल सिंह की पात्रता पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि उनके पास कृषि के बजाय हॉर्टिकल्चर में स्नातकोत्तर डिग्री है। पीएससी ने बाद में गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर कृषि और हॉर्टिकल्चर को समकक्ष मानते हुए उनकी पात्रता को सही ठहराया था। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद विज्ञापन में निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के दायरे को इस तरह विस्तारित नहीं किया जा सकता। विज्ञापन में जिस योग्यता को अनिवार्य किया गया है, पात्रता का निर्धारण उसी के आधार पर होना चाहिए। बाद में किसी विशेषज्ञ समिति की राय के आधार पर अलग डिग्री को समकक्ष मानना भर्ती की निर्धारित शर्तों में बदलाव के समान होगा।
अंतिम चयन सूची फिर से बनाने का निर्देश
हाईकोर्ट ने सीजीपीएससी को निर्देश दिया कि पात्र अभ्यर्थियों को ध्यान में रखते हुए अंतिम चयन सूची को कानून के अनुरूप दोबारा तैयार किया जाए। अदालत के इस आदेश से सहायक संचालक कृषि पद की भर्ती प्रक्रिया और चयन सूची पर सीधा असर पड़ सकता है।
क्षैतिज आरक्षण की चुनौती खारिज
दूसरे मामले में हितेश सोनकर ने चयन सूची में क्षैतिज आरक्षण के संचालन को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि अधिक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी को ओपन पीडब्ल्यूडी श्रेणी में समायोजित किया जाना चाहिए था, जिससे ओबीसी पीडब्ल्यूडी श्रेणी में उनके लिए अवसर बनता। हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि क्षैतिज आरक्षण केवल अभ्यर्थियों के तुलनात्मक अंकों के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित नियमों के तहत रोस्टर और अभ्यर्थियों की पहचान की निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि आयोग ने नियम 17.6 या आरक्षण रोस्टर का गलत तरीके से पालन किया। केवल अलग-अलग अभ्यर्थियों के अंकों की तुलना के आधार पर आरक्षण प्रक्रिया में अनियमितता नहीं मानी जा सकती। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक समीक्षा का दायरा चयन प्रक्रिया की वैधता, निष्पक्षता और पारदर्शिता की जांच तक सीमित रहता है। इस आधार पर क्षैतिज आरक्षण से जुड़ी याचिका खारिज कर दी गई।
