चुनाव बीत चुका है, लेकिन बहस खत्म होने का नाम नहीं ले रही। सोशल मीडिया पर उठी एक छोटी-सी आशंका अब सियासत के केंद्र (Maharashtra Voting Controversy) में आ खड़ी हुई है। आरोप, जवाब और प्रत्यारोप के बीच सवाल यही है—क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसा अब पहले जैसा मजबूत है?
महाराष्ट्र में नगर निगम चुनाव के दौरान सामने आए इरेज़ेबल इंक विवाद ने अब राष्ट्रीय राजनीति का रूप ले लिया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे को लेकर चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि वोट के अधिकार से किसी भी तरह की छेड़छाड़ लोकतंत्र की जड़ों पर हमला है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव प्रबंधन पर निशाना साधा और कहा कि नागरिकों को भ्रमित करने की कोशिश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक (Maharashtra Voting Controversy) है। उनके इस बयान के बाद महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों की पारदर्शिता को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
इंक को लेकर कैसे शुरू हुआ विवाद
नगर निगम चुनाव के मतदान के दिन कई ऐसे वीडियो सामने आए, जिनमें मतदाताओं की उंगलियों पर लगी स्याही आसानी से मिटती दिखाई दी। विपक्षी दलों का दावा है कि यह स्याही सैनिटाइज़र या केमिकल से हटाई जा सकती है, जिससे दोबारा मतदान की आशंका पैदा होती है। इसी को लेकर सवाल उठाए गए कि क्या मतदान प्रणाली में कहीं चूक हुई है।
राजनीति हुई तेज
इस मुद्दे पर राज्य की राजनीति भी गरमा गई है। विपक्षी दलों ने प्रशासन पर पक्षपात और लापरवाही के आरोप लगाए, वहीं सत्तापक्ष ने इन दावों को बेबुनियाद बताया। बयानबाज़ी के बीच यह मामला अब सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास से जुड़ा विषय बन गया है।
आयोग का पक्ष
विवाद बढ़ने के बाद चुनाव प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि इस्तेमाल की गई स्याही निर्धारित मानकों के अनुरूप है और केवल स्याही का हल्का पड़ना दोबारा मतदान का प्रमाण नहीं माना (Maharashtra Voting Controversy) जा सकता। साथ ही, मामले की जांच के निर्देश भी दिए गए हैं ताकि किसी भी तरह के संदेह को दूर किया जा सके।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अब जब यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर उठ चुका है, तो आने वाले दिनों में इस पर संसद से लेकर सड़क तक चर्चा जारी रह सकती है। सवाल सिर्फ स्याही का नहीं, बल्कि भरोसे का है—और वही इस बहस का केंद्र बन चुका है।

