छत्तीसगढ़ के आखिरी छोर पर बसे खैरागढ़ और राजनांदगांव के आसमान में इन दिनों एक अलग ही रौनक है, जो आम इंसान की नजरों (Khairagarh Bird Hotspot) से भले ही दूर हो, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है। सालों तक गुमनाम रहे इन इलाकों ने अचानक देश के नक्शे पर एक ‘बर्ड हॉटस्पॉट’ के रूप में धमाका कर दिया है। साल 2019 से शुरू हुआ एक जमीनी शोध जब 2025 के पड़ाव पर पहुंचा, तो नतीजे हैरान करने वाले थे।
यहाँ पक्षियों की 296 ऐसी प्रजातियां मिली हैं, जो यह बताती हैं कि मैकाल की पहाड़ियों और बाघनदी के पानी में कुछ तो ऐसा जादुई है जो परिंदों को सात समंदर पार से खींच लाता है। यह सिर्फ एक गिनती नहीं है, बल्कि इस बात की गवाही है कि यहाँ का माहौल परिंदों के लिए किसी मखमली घर जैसा सुरक्षित और सुकून भरा हो चुका है।
विदेशी मेहमानों ने बनाया परमानेंट ठिकाना, पहली बार दिखा दुर्लभ नजारा (Khairagarh Bird Hotspot)
इस खबर का सबसे मजेदार और रोमांचक पहलू यह है कि राजनांदगांव और खैरागढ़ अब विदेशी मेहमानों के लिए सिर्फ ‘हॉलिडे डेस्टिनेशन’ नहीं रहे, बल्कि उन्होंने यहाँ अपना घर बसाना शुरू कर दिया है। शोध में पाया गया कि करीब 58 प्रजातियां ऐसी हैं, जो यहाँ केवल घूमने नहीं आतीं बल्कि बाकायदा घोंसले बनाकर अपने अंडे-बच्चों की परवरिश कर रही हैं।
सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ‘रिवर टर्न’ और ‘एशियन ब्राउन फ्लाईकैचर’ को लेकर है, जिन्होंने पहली बार छत्तीसगढ़ की मिट्टी पर अपनी पीढ़ी आगे बढ़ाई है। इतना ही नहीं, आसमान का सुल्तान कहे जाने वाले ‘सिनेरियस वल्चर’ ने भी यहाँ अपनी हाजिरी लगाकर वैज्ञानिकों को जश्न मनाने का मौका (Khairagarh Bird Hotspot) दे दिया है। यहाँ के जलाशय जैसे छिंदारी और खातूटोला अब पक्षियों की ऐसी ‘हाई-प्रोफाइल’ सोसायटियों में बदल चुके हैं, जहाँ सुबह की शुरुआत हजारों चहचहाहटों के संगीत के साथ होती है।
खतरे के बीच ‘रेड लिस्ट’ वाले वीआईपी परिंदों की मौजूदगी
लेकिन इस खुशनुमा तस्वीर के पीछे एक गंभीर पहलू भी छिपा है। इस इलाके में 16 से ज्यादा ऐसी प्रजातियां भी पाई गई हैं, जो दुनिया भर में ‘विलुप्ति’ की कगार पर खड़ी हैं। इजिप्शियन वल्चर और लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क जैसे परिंदे, जिन्हें देखने के लिए दुनिया भर के फोटोग्राफर्स तरसते हैं, वो यहाँ बेखौफ उड़ते देखे जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यहाँ का ‘मोज़ेक इकोसिस्टम’ यानी जंगल, पानी और इंसानी बस्तियों का मिला-जुला ताना-बाना इन पक्षियों के लिए कवच का काम (Khairagarh Bird Hotspot) कर रहा है। हालांकि, खेतों में छिड़का जाने वाला जहर और बिजली के तार इनके लिए बड़े विलेन साबित हो रहे हैं। डोंगरगढ़ के जंगलों को अब ‘कंजर्वेशन रिजर्व’ बनाने की मांग उठ रही है ताकि इस प्राकृतिक खजाने को लुटेरों और लापरवाही से बचाया जा सके।
जुनून से शुरू हुआ सफर और बन गया नेशनल रिकॉर्ड
हैरानी की बात यह है कि इस पूरे वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण की शुरुआत किसी तामझाम वाले सरकारी प्रोजेक्ट से नहीं, बल्कि कुछ दोस्तों के बर्ड वॉचिंग के शौक से हुई थी। प्रतीक ठाकुर, अविनाश भोई, डॉ. दानेश सिन्हा और डॉ. अनुराग विश्वकर्मा जैसे नामों ने अपनी दूरबीन और कैमरों के जरिए वो सच खोज निकाला जिसे अब तक सिस्टम ने नजरअंदाज किया था।
आज छिंदारी जैसे इलाकों में इको-टूरिज्म के जरिए स्थानीय लोग भी इस मुहिम से जुड़ रहे हैं। यह सिर्फ पक्षियों की कहानी नहीं है, बल्कि राजनांदगांव और खैरागढ़ के लिए भविष्य का वो रास्ता है, जो इस इलाके को दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर चमका (Khairagarh Bird Hotspot) सकता है। अगर हम इन नन्हे मेहमानों को बचा ले गए, तो यकीन मानिए कि यह इलाका आने वाले वक्त में देश का सबसे बड़ा ‘नेचर हब’ कहलाएगा।
