खबरों की मरम्मत : उपेक्षित नौकरशाही का गिरोह सक्रिय, रील, रोल और रीयल का तमाशा, तो क्या सायकल अब..

उपेक्षित नौकरशाही का गिरोह सक्रिय

पूर्ववर्ती सरकार की उपेक्षित नौकरशाही का एक गिरोह मौजूदा सरकार की नौकरशाही के खिलाफ अचानक सक्रिय हो गया हैें। ये वही गिरोह है जिसने बम्पर जनादेश वाली भूपेश बघेल की सरकार को मात्र पांच साल में चलता कर दिया। ये वही गिरोह है जो मीडिया के कुछ लोगों को इस शर्त पर इन्टरटेन करता था कि डॉ. रमन सिंह के खिलाफ लिख, छाप या सोशल मीडिया पर ट्रोल करके दिखाओं तब सीएम से बात करता हूं। ऐसा नहीं कि उस गिरोह के लोग इस सरकार में मेन स्ट्रीम में नहीं है, है लेकिन गिरोह का तर्क जबरदस्त हैं कि हमाम में सब नंगे है। जमीन, जायदाद, शराब, सट्टा, रेत, राखड़, कोल, करप्शन के घपलों, घोटालों में आकंठ डूबा यह गिरोह जेल, थाना, पुलिस, हिरासत, हथकड़ी में कोर्ट, कचहरी, की दहलीजों पर चहलकदमी करता हुआ आदिवासी मुख्यमंत्री की सदाशयता का मजाक उड़ा रहा हैं और उम्मीद कर रहा है कि आंका रहम करें। हाल ही के फेरबदल में आउट आफ ट्रेक हुए कुछ लोगों को यह गिरोह सहानुभूति का पाठ भी पढ़ा रहा है। यही वजह है कि ढाई साल बाद भी अन्दरखाने साय सरकार के खिलाफ निगेटिव नरेटिव बिल्डिंग की बुनियाद रखी जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि मौजूदा सरकार की नौकरशाही किसी के इशारे पर किसी के लिए सुपारी नहीं दे रही हैं।

रील, रोल और रीयल का तमाशा

प्रधानमंत्री के मितव्ययिता संदेश को कुछ रीलबाजों ने तमाशा बना दिया है। कोई सायकिल से दफ्तर जा रहा है, कोई ईवी रिक्शा में पार्टी की बैठके अटेन कर रहा हैं और कोई बयानों की रील बनाकर रोलबाजी कर रहा है। बस इन रील या रोलबाजों को पेट्रोलपम्पों और गैस एजेसिंयों में लगने वाली वाहनों या लोगो की लम्बी लाईने भर नही दिख रही हैं। इवेन्ट और हेडलाईन मैनेजमेन्ट के ये ठेकेदार रील और रीयल के अन्तर को पाट तो सकते नही इसलिए तमाशा खड़ा करते रहते है। इन सबको मालूम था कि तीन रूपए लीटर पेट्रोल की कीमते बढ़ानी है इसलिए आयल कंपनियो ने पम्पों पर सप्लाई चोक कर दी थी जिसके चलते कई पम्प बंद हो गए थे। रेट बढऩे के बाद वही पम्प फिर से शुरू हो गए जिनके यहा नो स्टाक का बोर्ड लगा था। और दो दिन तक मीडिया की हेडलाईन से पैनिक क्रिएट हुआ सो अलग।

विपक्ष में कौन कितना अच्छा?

दरअसल विपक्ष की भूमिका को लेकर देशव्यापी बहस छिड़ी हैं कि विपक्ष की असल अग्निपरीक्षा कब होती है? जैसे 2013 के पहले वाले विपक्ष पर मौजूदा विपक्ष प्रपोगंडा पोलिटिक्स का आरोप लगाता रहा हैं। इसे हम छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में यदि देखे पूर्ववर्ती सरकार में पीएससी के कथित घोटाले को लेकर सड़क पर उतरे तत्कालीन विपक्ष नें सड़क पर इतना तांडव मचाया कि बम्पर जनादेश की सरकार किसी न्यायालयीन आदेश से नहीं बल्कि जनादेश से सत्ता से बाहर हो गई। लेकिन हाईकोर्ट ने उन सभी को नियुक्ति देने का आदेश दे दिया जिनकी नियुक्ति को लेकर विपक्ष ने तांडव मचाया था। यानि प्रपोगंडा पोलिटिक्स के आरोपी विपक्ष ने तत्कालीन सरकार के वो सारे अच्छे काम भी धूल धूसरित कर दिए थे जो मौजूदा सरकार भी कर रही है, जैसे धान के किसानों को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि। दरअसल विपक्षी भूमिका को लेकर यह बहस तब शुरू हुई जब नीट की परीक्षा रदद हुई और अब महंगाई से जनता परेशान है। 2013 के पहले का विपक्ष मंहगाई के मुद्दे को लेकर सिलेंडर के साथ सड़क पर आ जा रहा था लेकिन इस बार का बयानवीर विपक्ष सोशल मीडिया के स्क्रीन से बाहर ही नहीं आ पा रहा हंै। कमोबेश यही हाल नीट के मसले को लेकर है विपक्षी तेवर को लेकर लोग निराश है ।

तो क्या सायकल अब स्टेटस सिंबल बनेगी

पेट्रोल डीजल की खपत कम करने के लिए किए जा ढ़कोसलों की हौसला अफजाई करने के लिए कुछ ए,बी,सी,डी ग्रेड के सभी विधाओं के सेलिब्रेटी सायकिल की सवारी कर दफ्तर, दुकान और शहरो में तफरीह करने का वीडियों डाल रहे हैं। इसमें वे सब शामिल है जिनके काफिले में महंगी दो चार,पांच गाडियां, दो चार हथियारधारी गणमेन, बाउंसर जिनका स्टेटस सिंबल है। ऐसे में ये लोग सायकल से कितने दिन चलेगेें और कहा कहा चलेंगे। जनता की हर तकलीफ को तमाशा और आपदा को अवसर बताने और बनाने वाले ये स्टेटस सिंबलधारी लोग जनता के तकलीफों पर जले पर नमक छिड़कने जैसा काम कर रहे है। हमने पिछले सप्ताह ही लिख दिया था कि हे सोशलमीडिया के शूरवीरों, हे आभासी दुनिया के एलियनों, वाट्सप यूनिवर्सिटी के रण बाकुरों जनता को अपने हाल पर छोड़ दो वो खुद जी लेगी। आर्टिफिशयिल इन्टलीजेसी की अकल लगाकर गुमराह करने से अच्छा है कि जनता को अपने हाल पर छोड़ दिया जाय ।

आ जा मेरी सायकल में बैठ जा…

कहते हैं न कि घूरे के दिन भी बहुरते हैं। इन दिनों छत्तीसगढ़ में सायकल के दिन बहुर रहे हैं। नेताओं और नौकरशाहों में सायकल चलाने की होड़ लग गई है। कल तक जिस सायकल को कुत्ता भी नहीं पूछता था आज वही सायकल शान की सवारी बन गई है और मीडिया की सुर्खियां बटोर रही है। नेता और अफसर सायकल से अपने दफ्तर जा रहे हैं और जनता को जागरूक करने के लिए राह चलते लोगों को भी अपनी सायकल पर बैठने के लिए बुला रहे हैं। वे सायकल चलाते हुए गा रहे हैं -आ जा मेरी सायकल में बैठ जा… आ जा मेरी सायकल में बैठ जा.. फुल स्पीड जाएंगे, कहीं रुकेंगे न हम, खाना पीना सायकल में ही होगा सनम..। दरअसल पीएम मोदी ने पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने की देशवासियों से अपील की है और उस अपील को नेताओं और नौकरशाहों ने पूरी गंभीरता से लिया है। अब इससे आम जनता कितनी प्रेरित होती है यह तो आने वाला वक्त ही बेहतर बताएगा। फिलहाल तो लोग इस चिन्ता में दुबले हो रहे हैं कि नौकरशाहों के सायकल प्रेम के चलते कहीं ऐसा न हो कि अपराधी किसी वारदात को अंजाम देकर मोटर साइकल या कार पर सवार होकर फरार हो जाएं और थानेदार व कप्तान साहब अपनी सायकल से उनका पीछा करें?

कब सुधरेंगे पीएचई के अफसर…परफार्मेंस सिर्फ 19 परसेंट !!!

भीषण गर्मी के मौसम में पूरे प्रदेश से जलसंकट की शिकायतें सामने आ रही हैं। केंद्र सरकार की जल जीवन मिशन और नगरीय निकायों के लिये अमृत मिशन जैसी योजनाओं पर अरबों रुपए का प्रावधान होने के बाद भी लोग प्यासे हैं। पीएचई विभाग के अफसरों का निकम्मापन इसकी बड़ी वजह है। पिछले साल के बजट में पीएचई विभाग को 6300 करोड़ रुपए दिये गए थे। अफसरों ने सिर्फ 1011 करोड़ रुपए खर्च किये, यानी पीएचई को मिले बजट का सिर्फ 19 फीसदी हिस्सा ही खर्च हो पाया। आंकड़े से साफ जाहिर है कि सरकार चाहे डबल इंजन की हो या ट्रपल इंजन की, जब तक अफसर नहीं सुधरेंगे, तब तक किसी का कल्याण नहीं होने वाला। गजब ये है कि साल भर में 19 फीसदी की परफार्मेंस के बावजूद विभाग में कोई हलचल नहीं हो रही है। कार्यप्रणाली में सुधार के लिये कोई एक्सरसाइज नहीं हो रही। विभाग ने पूअर परफार्मेंस को शायद नियति मान लिया है। अब चाहे पब्लिक पानी संकट से जूझती है तो जूझती रहे। मंत्री, विधायक को आम जनता के कोप का शिकार होना पड़े तो होते रहें। अफसरों पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पड़ोस के एमपी में भी कमोबेश यही हाल है। वहां तो पूरा का पूरा विभाग ही खत्म कर दिया गया है। पीएचई जैसे महत्वपूर्ण विभाग का खात्मा करते हुए दूसरे विभाग में मर्ज कर दिया गया है।

नौकरशाही की सुस्त चाल ऐसी कि कछुआ भी शरमा जाए

प्रदेश में नौकरशाही की सुस्त चाल से सरकार के कामकाज पर लगातार उंगलियां उठ रही है। पीएचई अफसरों के निकम्मेपन को जानने-समझने के बाद अब वन विभाग के कामकाज को भी समझना जरूरी है। वर्तमान में तेंदूपत्ता तोड़ाई का काम चल रहा है। सरकार ने 13 लाख संग्राहकों को चरणपादुका देने का ऐलान किया था, लेकिन तोड़ाई शुरू होने से पहले पादुका का वितरण नहीं किया जा सका। वजह ये है कि खरीदी की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई। जंगलों में पादुका के बिना सांप-बिच्छू के खतरे और पत्थर, कंकड़, कांटे से होने वाली चोट से जूझते हुए तोड़ाई का काम किया जा रहा है। विभागीय अफसरों का कहना है कि खरीदी की प्रक्रिया तीन महीने पहले शुरू की गई। इस प्रक्रिया में कम से कम एक माह का समय और लगेगा। यानी 10 जून तक तोड़ाई का काम पूरा हो जाएगा। यह काम पूरा होने के कई हफ्ते बाद ही संग्राहकों को चरणपादुका मिल पाएगी। अब नौकरशाही की ऐसी सुस्त चाल देखकर कछुआ शर्म से पानी-पानी तो होगा ही।

ऐसे में कैसे होगा संगठन का सृजन?

जिला स्तर पर कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान के बाद करीब 6 महीने बाद अब नवनिर्वाचित जिला व ब्लॉक अध्यक्षों को प्रशिक्षण देने की तैयारी शुरू हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित कई अन्य कांग्रेस नेता प्रशिक्षण शिविर में शामिल होंगे। दरअसल, सृजन के बाद से शुरुआती हलचल और सक्रियता बढऩे के कुछ महीने बाद कांग्रेसियों की सक्रियता का फुग्गा फुस्स होने लगा है। जमीनी स्तर पर कांग्रेस में ‘सृजन’ के बावजूद आपसी जूतमपैजार और सिर फुटौव्वल खत्म नहीं हुई है। राहुल, खरगे को संगठन के जमीनी खोखलेपन का पता ही नहीं है। लिहाजा, वे भी भाषण देकर बिना किसी ठोस नतीजे के लौट जाएंगे। अब सवाल ये है कि कांग्रेसियों को गुटीय लड़ाई और आपसी खींचतान को खत्म करने का प्रशिक्षण कौन देगा? इससे भी बड़ा … लाख टके का सवाल ये है कि अगर नसीहत देगा भी तो इसका असर कितना होगा? जब गुटबाजी और वर्चस्व की लड़ाई खुले तौर पर हो रही हो, तब संगठन का सृजन कैसे होगा ?

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