सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई के दौरान देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने केंद्र सरकार (Judicial System Burden) से विशेष कानूनों को लेकर कड़ा सवाल किया। उन्होंने कहा कि जब भी सरकार कोई स्पेशल कानून बनाती है, तो यह क्यों नहीं सोचा जाता कि उसका असर न्याय व्यवस्था पर क्या पड़ेगा। कानून बन जाते हैं, लेकिन उन्हें लागू करने के लिए जरूरी न्यायिक ढांचा और संसाधन नहीं बढ़ाए जाते, जिससे अदालतों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
CJI ने टिप्पणी (Judicial System Burden) करते हुए कहा कि क्या कभी यह अध्ययन किया जाता है कि किसी नए विशेष कानून के लागू होने से कितने मामले बढ़ेंगे और न्याय प्रणाली पर कितना दबाव पड़ेगा। उन्होंने हाल ही में आई एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि केवल दिल्ली में ही चेक बाउंस से जुड़े मामलों ने पूरे सिस्टम को जाम कर रखा है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कानून तो बना दिए जाते हैं, लेकिन न तो अदालतों की संख्या बढ़ाई जाती है और न ही जजों व ढांचे की व्यवस्था की जाती है।
कर्नाटक के जातिगत हिंसा मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी
यह टिप्पणी कर्नाटक में जातिगत हिंसा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आई। इस मामले में याचिकाकर्ता पर ‘टाइगर गैंग’ का सक्रिय सदस्य होने का आरोप है। उसे गिरोह का सरगना बताया गया है, जो कथित तौर पर हफ्ता वसूली और जबरन वसूली जैसे अपराधों में शामिल रहा है।
सुनवाई के दौरान CJI (Judicial System Burden) ने याचिकाकर्ता को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि वह तो रिंगलीडर है और संभव है कि जेल में भी आराम से रह रहा हो। इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने आपत्ति जताई और कहा कि यह टिप्पणी अनुचित है। वकील ने अदालत को बताया कि आरोपी गंभीर बीमारी से पीड़ित है और उसका किडनी ट्रांसप्लांट हो चुका है। इस पर CJI ने तंज कसते हुए कहा कि तब तो जेल उसके लिए रिकवरी की सुरक्षित जगह हो सकती है।
गवाहों के पलटने का मुद्दा
अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कुल 12 जबरन वसूली के मामले दर्ज हैं, जिनमें से आठ मामलों में गवाहों के पलट जाने के कारण उसे बरी किया गया। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि आरोपी का प्रभाव इतना अधिक है कि यदि उसे जमानत दी गई तो बाकी मामलों में भी गवाह प्रभावित हो सकते हैं।
अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में ट्रायल साप्ताहिक आधार पर चल रहा है और उम्मीद है कि एक वर्ष के भीतर इसे पूरा कर लिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा कि अभियोजन की जिम्मेदारी है कि वह अहम और प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को प्राथमिकता के आधार पर पेश करे।
जमानत पर कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट (Judicial System Burden) ने फिलहाल आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि मुख्य गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद उसे दोबारा जमानत के लिए आवेदन करने की छूट होगी। यदि ट्रायल एक साल से अधिक समय लेता है, तो आरोपी पुनः जमानत की मांग कर सकता है।
इस सुनवाई के बहाने CJI ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि बिना पर्याप्त तैयारी के बनाए गए कानून न केवल अदालतों पर बोझ डालते हैं, बल्कि न्याय की गति को भी धीमा कर देते हैं। यह टिप्पणी नीति निर्माण और न्याय व्यवस्था के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत को रेखांकित करती है।

