Judicial Probe 2026 : जस्टिस वर्मा मामले में लोकसभा अध्यक्ष की जांच समिति गठित करने पर रोक नहीं
Judicial Probe 2026
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज किए जाने के बावजूद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित करने पर न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत कोई रोक नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा शामिल हैं, ने जस्टिस वर्मा के वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि तत्कालीन राज्यसभा अध्यक्ष जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद उपसभापति को प्रस्ताव खारिज करने का अधिकार नहीं है। इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि (Judicial Probe 2026) मामले में लोकसभा अध्यक्ष जांच समिति गठित कर सकते हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा समिति के गठन में कुछ प्रक्रियागत खामियां प्रतीत होती हैं। अदालत यह जांच करेगी कि क्या ये खामियां इतनी गंभीर हैं कि पूरे (Judicial Probe 2026) कार्यवाही को समाप्त करने की आवश्यकता पड़े।
मुकुल रोहतगी ने शुरू में ही लोकसभा अध्यक्ष के इस कदम का विरोध किया था और तर्क दिया कि यदि महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा में एक ही दिन पेश किए जाते, तो समिति का गठन दोनों सदनों द्वारा संयुक्त रूप से होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट जस्टिस वर्मा की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें उन्होंने न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत उनके आवास पर बरामद जले नोटों से जुड़े मामले में गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी।
बताते चलें कि 14 मार्च, 2025 को जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आवास के स्टोर रूम में आग लगी थी, जिसमें बड़ी संख्या में जले हुए नोट बरामद हुए थे। उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट के जज के रूप में कार्यरत थे। इस मामले में संसदीय समिति की वैधता और गठन की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (Judicial Probe 2026) विशेष महत्व रखता है।
जांच समिति के गठन और उसके कार्यकाल पर कोर्ट की निगरानी यह सुनिश्चित करेगी कि सभी प्रक्रियाएं संविधान और नियमों के अनुरूप हों। सूत्रों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट इस बात की भी जांच करेगा कि क्या समिति द्वारा की गई कार्रवाई में किसी भी स्तर पर (Judicial Probe 2026) त्रुटि या प्रक्रियागत कमी है। इस फैसले से न केवल न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।
