देश के आईटी सेक्टर के लिए वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही राहत नहीं, बल्कि एक कड़ा इम्तिहान बनकर सामने आई। कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा, वेतन संरचना और कार्यशर्तों को अधिक पारदर्शी बनाने के इरादे से लागू किए गए नए लेबर कोड्स ने बड़ी आईटी कंपनियों की बैलेंस शीट पर सीधा दबाव (IT Sector Impact) डाला है। अक्टूबर से दिसंबर 2025 की तिमाही में इस बदलाव का असर लागत के रूप में सामने आया, जिसने मुनाफे की रफ्तार को अचानक धीमा कर दिया।
नवंबर 2025 से प्रभावी हुए प्रावधानों के चलते टॉप आईटी कंपनियों को ग्रेच्युटी, पीएफ और लीव से जुड़ी देनदारियों का दोबारा आकलन करना पड़ा। नतीजा यह रहा कि केवल एक तिमाही में ही हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च बुक करना पड़ा, जिसे कंपनियों ने “एक्सेप्शनल” श्रेणी में दिखाया है।
खर्च का सबसे भारी बोझ
तीसरी तिमाही में सबसे ज्यादा असर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज पर पड़ा। कंपनी ने इस दौरान 2,128 करोड़ रुपये के अतिरिक्त खर्च दर्ज किए, जिनमें बड़ा हिस्सा ग्रेच्युटी दायित्वों और लीव लायबिलिटी एडजस्टमेंट (IT Sector Impact) से जुड़ा रहा। इसी तरह, इंफोसिस को करीब 1,289 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार उठाना पड़ा, जबकि एचसीएलटेक पर इसका प्रभाव 956 करोड़ रुपये के आसपास रहा। तीनों कंपनियों को मिलाकर यह आंकड़ा 4,373 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
क्विक फैक्ट बॉक्स
कुल अतिरिक्त खर्च (Q3): ₹4,373 करोड़
सबसे ज्यादा असर: TCS
मुख्य कारण: ग्रेच्युटी, पीएफ और लीव देनदारियों का पुनर्गणना
लागू अवधि: नवंबर 2025 से
मार्जिन बचे, लेकिन दबाव साफ
इतने बड़े खर्च के बावजूद कंपनियों ने अपने ऑपरेटिंग मार्जिन को पूरी तरह टूटने नहीं दिया। टीसीएस ने तिमाही में 25 प्रतिशत से अधिक का ऑपरेटिंग मार्जिन बनाए रखा। इंफोसिस का मार्जिन (IT Sector Impact) जरूर घटा, लेकिन प्रबंधन का मानना है कि अगर लेबर कोड से जुड़ी अतिरिक्त लागत न होती, तो यह स्तर कहीं बेहतर होता। एचसीएलटेक ने भी संकेत दिए हैं कि इस बदलाव का असर नियंत्रित दायरे में रखने की कोशिश जारी है।
विश्लेषकों का कहना है कि यह झटका भले ही एकमुश्त दिखे, लेकिन इसके असर की गूंज आने वाली तिमाहियों में भी सुनाई दे सकती है। खासकर तब, जब वेतन ढांचे में न्यूनतम 50 प्रतिशत बेसिक सैलरी जैसी शर्तें स्थायी रूप से लागू हो चुकी हैं।
क्या बदला नए लेबर कोड में
बेसिक सैलरी का न्यूनतम हिस्सा तय
पीएफ और ग्रेच्युटी कवरेज का विस्तार
तय कार्यघंटे और नियुक्ति पत्र अनिवार्य
महिलाओं के लिए नाइट शिफ्ट की अनुमति
आगे की राह आसान नहीं
आईटी कंपनियों का आकलन है कि लेबर कोड से जुड़ी लागत चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। आने वाले समय में यह खर्च नियमित रूप ले सकता है, हालांकि इसका असर 10 से 20 बेसिस प्वाइंट्स के बीच सीमित रहने की उम्मीद जताई जा रही है। दूसरी ओर, ब्रोकरेज फर्म्स चेतावनी दे रही हैं कि बढ़ती रिकरिंग कॉस्ट के चलते सैलरी हाइक की रफ्तार धीमी पड़ सकती है और मार्जिन पर दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है।
कुल मिलाकर, नए लेबर कोड्स ने कर्मचारियों के हितों को मजबूत जरूर किया है, लेकिन आईटी सेक्टर के लिए यह बदलाव फिलहाल एक महंगा सबक साबित हो रहा है, जिसका असर आने वाले वर्षों तक दिख सकता है।

