Hemant Soren Assam Tribals : असम के विस्थापित आदिवासियों की आवाज बनेंगे हेमंत सोरेन, झारखंड-ओडिशा-बंगाल के मजदूरों के हक का मुद्दा होगा राष्ट्रीय
Hemant Soren Assam Tribals
असम में झारखंड, ओडिशा और बंगाल से विस्थापित होकर बसे लाखों आदिवासी वर्षों से अपनी (Hemant Soren Assam Tribals) पहचान, भूमि अधिकार, रोजगार, उचित मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा जैसे बुनियादी सवालों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पीढ़ियों से चाय बागानों, उद्योगों और कृषि क्षेत्र में योगदान देने के बावजूद यह समुदाय आज भी हाशिये पर खड़ा है। प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक अनदेखी के कारण इनकी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं, जिससे आदिवासी समाज में गहरा असंतोष देखने को मिल रहा है।
इन्हीं ज्वलंत मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाने के उद्देश्य से All Assam Adivasi Students Association द्वारा एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष और झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। आयोजकों का कहना है कि यह मंच असम के आदिवासी समाज की पीड़ा, संघर्ष और वर्षों से लंबित न्यायपूर्ण मांगों को मुखर आवाज देगा।
विस्थापन की पीड़ा, अधिकारों से वंचित पीढ़ियां
असम में बसे आदिवासी समुदायों का इतिहास संघर्ष और उपेक्षा से भरा रहा है। ब्रिटिश काल में चाय बागानों और अन्य कार्यों के लिए झारखंड, ओडिशा और बंगाल से लाए गए आदिवासी आज भी भूमि स्वामित्व, स्थायी रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं। न तो उन्हें पूर्ण स्थानीय पहचान मिल सकी और न ही संवैधानिक संरक्षण का लाभ। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में उनकी स्थिति लगातार कमजोर बनी हुई है।
आदिवासी संगठनों का मानना है कि अब इन सवालों को सिर्फ राज्य स्तर तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इन्हें राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया ((Hemant Soren Assam Tribals)) जाना चाहिए। उनका विश्वास है कि हेमंत सोरेन का नेतृत्व इन मुद्दों को नई दिशा दे सकता है। झारखंड में आदिवासी अधिकारों, भूमि संरक्षण और सामाजिक न्याय से जुड़े उनके संघर्ष और नीतिगत फैसलों के कारण असम के आदिवासी समाज में उनके प्रति विशेष भरोसा देखा जा रहा है।
चुनावी माहौल में सियासी संकेत भी
गौरतलब है कि आने वाले कुछ महीनों में असम में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे समय में आदिवासी समाज का संगठित होकर हेमंत सोरेन के प्रति समर्थन और भरोसा जताना राजनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। यह संदेश केवल असम तक सीमित नहीं है, बल्कि कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों के लिए भी संकेत है कि आदिवासी समाज अब अपने अधिकारों को लेकर अधिक सजग और संगठित हो चुका है।
बताया जाता है कि कुछ महीने पहले देश के विभिन्न राज्यों से आए आदिवासी संगठनों ने हेमंत सोरेन के समक्ष राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व की अपेक्षा भी जताई (Hemant Soren Assam Tribals) थी। असम में आयोजित होने वाले इस विशाल जनसम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उनका आमंत्रण उसी प्रक्रिया का अगला कदम माना जा रहा है। इससे झारखंड मुक्ति मोर्चा और हेमंत सोरेन का प्रभाव झारखंड की सीमाओं से बाहर तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है।
आदिवासी संगठनों का कहना है कि यह आयोजन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि देशभर के आदिवासी समाज को एक सूत्र में बांधने का प्रयास है। उनका मानना है कि हेमंत सोरेन के नेतृत्व में निरंतर संघर्ष, स्पष्ट दृष्टि और ज़मीनी जुड़ाव आदिवासी समाज को अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर लड़ने की नई ताकत दे सकता है। आने वाले समय में यह पहल राष्ट्रीय आदिवासी राजनीति को नई दिशा देने वाली साबित हो सकती है।
