FDP Closing Ceremony : शासकीय माता शबरी नवीन कन्या महाविद्यालय में एफडीपी का समापन, उच्च शिक्षा में जेंडर समावेशन पर हुआ मंथन

शासकीय माता शबरी नवीन कन्या महाविद्यालय में आयोजित फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम का समापन जेंडर समावेशन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर गंभीर विमर्श (FDP Closing Ceremony) के साथ हुआ। “Gender Inclusion in Higher Education: Emerging Challenges, Opportunities and Transformative Role in Education” विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में उच्च शिक्षा में समान अवसर, सम्मान, सहभागिता और सामाजिक बदलाव की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई। सात दिवसीय आयोजन के अंतिम चरण में वक्ताओं ने शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी, संवेदनशील और अवसर-समान बनाने की जरूरत पर जोर दिया।

कार्यक्रम के छठवें दिवस के प्रथम सत्र में रमन विश्वविद्यालय की डॉ. ज्योति पांडे ने अपने विचार रखते हुए कहा कि उच्च शिक्षा में जेंडर समावेशन सामाजिक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि जेंडर समानता आज केवल सामाजिक विमर्श का विषय नहीं, बल्कि वैश्विक प्राथमिकता बन चुकी है। शिक्षा के माध्यम से समाज में समान अवसर, सम्मान और नेतृत्व की भावना को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने विज्ञान, इतिहास, संस्कृति और समाज के संदर्भ में जेंडर समानता के विभिन्न आयामों को रेखांकित करते हुए इस बात पर बल दिया कि समाज में मौजूद जेंडर स्टिरियोटाइप्स, असमानता और भेदभाव को दूर किए बिना वास्तविक प्रगति संभव नहीं है। उन्होंने छात्राओं को शिक्षा, शोध, विज्ञान और तकनीकी क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

FDP Closing Ceremony

अपने वक्तव्य में डॉ. ज्योति पांडे ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य, विशेष रूप से एसडीजी-5, में महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार और अवसर प्रदान करने पर विशेष जोर दिया गया है। उन्होंने बताया कि शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम (FDP Closing Ceremony) नहीं है, बल्कि यह समाज में सम्मान, समानता और सहभागिता की संस्कृति विकसित करने का सबसे प्रभावी साधन भी है। कार्यक्रम के दौरान महिलाओं के अधिकार, शिक्षा और रोजगार के अवसर, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, वेतन असमानता और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा जैसे विषयों पर भी चर्चा की गई। उनका कहना था कि शिक्षा के क्षेत्र में समान अवसर और समावेशी वातावरण का निर्माण ही वास्तविक सामाजिक विकास की बुनियाद है।

FDP Closing Ceremony

द्वितीय सत्र में प्राचार्य डॉ. शुभदा राहलकर ने जेंडर की अवधारणा को सामाजिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोणों से समझाया। उन्होंने कहा कि जेंडर केवल जैविक अंतर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक संरचना भी है, जिसमें समाज द्वारा निर्धारित भूमिकाएं, अपेक्षाएं और व्यवहार शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि प्रचलित रूढ़िवादिता और जेंडर स्टिरियोटाइप्स के कारण महिलाओं को कई क्षेत्रों में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

बायोलॉजी और शारीरिक संरचना के उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने मेल और फीमेल बॉडी सिस्टम की समानताओं और असमानताओं को समझाते हुए यह स्पष्ट किया कि सामाजिक अवसरों का निर्धारण जैविक अंतर के आधार पर नहीं होना चाहिए। उन्होंने विज्ञान, इतिहास, संस्कृति और समाज के संदर्भ में जेंडर समानता की अनिवार्यता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि STEM जैसे क्षेत्रों में अभी भी महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम है, जबकि उचित अवसर और प्रोत्साहन मिलने पर महिलाएं हर क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकती हैं।

सप्तम दिवस के प्रथम सत्र में डायरेक्टर बायो एक्सल डॉ. सरिता कोठारी ने महिलाओं के अधिकार, शिक्षा और रोजगार के अवसर, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, वेतन असमानता, स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा जैसे विषयों पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि जेंडर समानता सुनिश्चित करने के लिए केवल नीतियां काफी नहीं हैं, बल्कि सामाजिक सोच में बदलाव और समावेशी शिक्षा प्रणाली का विकास भी जरूरी है। उनके वक्तव्य ने यह स्पष्ट किया कि जेंडर समानता का प्रश्न केवल महिला सशक्तिकरण से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक न्याय और संतुलित विकास का विषय है।

FDP Closing Ceremony

एफडीपी के द्वितीय सत्र में रायपुर से आई अनुष्का मौर्य ने अपने अनुभव और आकांक्षाएं साझा करते हुए कहा कि उनके भी सपने हैं, जिन्हें वह जीना (FDP Closing Ceremony) चाहती हैं। उन्होंने कहा कि वह पढ़-लिखकर एक अच्छे पद पर कार्य करना चाहती हैं और दसवीं की परीक्षा देने के बाद आगे भी अपनी शिक्षा जारी रखना चाहती हैं। उन्होंने भावुक शब्दों में कहा कि यदि समाज समान अवसर और सहयोग दे, तो लड़कियां भी देश की प्रगति में बराबर का योगदान दे सकती हैं। उनके वक्तव्य ने कार्यक्रम को वास्तविक सामाजिक संदर्भ से जोड़ते हुए यह दिखाया कि समान अवसर का प्रश्न सिर्फ सिद्धांत नहीं, बल्कि हजारों लड़कियों के जीवन और भविष्य से जुड़ा हुआ है।

क्षेत्रीय अपर संचालक श्री पी.डी. साहू ने कहा कि जेंडर समानता स्थापित करने में शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि शिक्षक अपने व्यवहार, भाषा और दृष्टिकोण के माध्यम से बच्चों को यह सिखा सकते हैं कि हर व्यक्ति का सम्मान करना जरूरी है, चाहे उसका जेंडर कुछ भी हो। जब शिक्षकों के स्तर पर समानता और संवेदनशीलता का संदेश दिया जाता है, तो विद्यार्थी भी उसी सोच को अपनाते हैं। उन्होंने शिक्षा संस्थानों को सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि अगर स्कूल और कॉलेज संवेदनशील होंगे, तो समाज भी धीरे-धीरे अधिक समावेशी बनेगा।

महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. नंदनी तिवारी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि समाज में लंबे समय तक महिलाओं को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, लेकिन आज शिक्षा, जागरूकता और आत्मविश्वास के बल पर महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा, विज्ञान, खेल, राजनीति और प्रशासन जैसे सभी क्षेत्रों में महिलाएं अपनी प्रतिभा से नई ऊंचाइयां हासिल कर रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एक शैक्षणिक संस्थान के रूप में महाविद्यालय का दायित्व है कि वह अपने विद्यार्थियों में समानता, सम्मान और संवेदनशीलता के मूल्य विकसित करे। संस्थानों को ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए, जहां हर छात्र और छात्रा बिना किसी भेदभाव के अपने सपनों को साकार कर सके।

सप्तम दिवस के सार को डॉ. आर.के. पटेल ने प्रस्तुत किया, जबकि फीडबैक डॉ. आरती सिंह ने दिया। कार्यक्रम में डॉ. शोभा महेश्वर और डॉ. अर्चना शुक्ला ने वक्ताओं का परिचय (FDP Closing Ceremony) दिया। डॉ. दीपिका महोबिया ने एफडीपी के सातों दिवस का सफल संचालन किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. दीपक शुक्ला ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम की सफलता में महाविद्यालय परिवार के डॉ. तिर्की, डॉ. ललिता, डॉ. शशिकला सिन्हा, डॉ. वंदना, डॉ. सुरेखा, डॉ. पटेल, डॉ. ईशा बेला लकड़ा, डॉ. बेला महंत, एकांबर और आभा सहित समस्त कर्मचारियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

यह आयोजन सिर्फ एक औपचारिक समापन कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उच्च शिक्षा में जेंडर समावेशन, समान अवसर और सामाजिक संवेदनशीलता को लेकर गंभीर शैक्षणिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आया। महाविद्यालय में हुई यह चर्चा इस बात का संकेत है कि शिक्षा संस्थान यदि चाहें, तो वे समाज में समानता और परिवर्तन की मजबूत नींव तैयार कर सकते हैं।

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