Family Court Divorce Case : तलाक मामले में इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द

बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए प्रकरण को दोबारा परिवार न्यायालय भेज दिया है। मामला पति द्वारा दायर तलाक याचिका से जुड़ा है, जिसमें उसने पत्नी के कथित आपत्तिजनक आचरण को आधार बनाते हुए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में सीडी पेश की थी। फैमिली कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी का प्रमाणपत्र संलग्न नहीं होने के आधार पर उस साक्ष्य को मान्य नहीं माना था।

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इस प्रकरण की सुनवाई हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा शामिल थे, के समक्ष (Family Court Divorce Case) हुई।

डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि पारिवारिक विवादों के मामलों में केवल तकनीकी कारणों से सीसीटीवी फुटेज, सीडी या अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को खारिज नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 14 और 20 के तहत परिवार न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त है कि वह विवाद के प्रभावी और न्यायसंगत निपटारे के लिए ऐसे साक्ष्य स्वीकार कर सकता है, जो तकनीकी रूप से साक्ष्य अधिनियम के सभी प्रावधानों को पूरा न भी करते हों।

मामला रायगढ़ जिले के एक दंपती से जुड़ा है, जिनके बीच लंबे समय से वैवाहिक विवाद चल रहा है। पति ने फैमिली कोर्ट में पत्नी पर क्रूरता और आपत्तिजनक आचरण के आरोप लगाते हुए तलाक की याचिका दायर (Family Court Divorce Case) की थी।

पति का आरोप था कि उसकी पत्नी अन्य पुरुषों के साथ अश्लील चैटिंग और वीडियो कॉल के जरिए आपत्तिजनक बातचीत करती थी। इन आरोपों के समर्थन में पति ने बेडरूम में सीसीटीवी कैमरे लगवाए थे और संबंधित फुटेज को सीडी के रूप में कोर्ट में पेश किया था।

फैमिली कोर्ट ने सुनवाई के बाद पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने यह कहते हुए सीडी को साक्ष्य मानने से इनकार कर दिया था कि उसके साथ धारा 65-बी का अनिवार्य प्रमाणपत्र संलग्न नहीं है। वहीं, पत्नी द्वारा दायर दांपत्य अधिकारों की बहाली की याचिका को स्वीकार कर लिया गया था।

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फैमिली कोर्ट के इस आदेश को चुनौती देते हुए पति ने हाई कोर्ट का रुख किया (Family Court Divorce Case) था। हाई कोर्ट ने मामले की पुनः समीक्षा करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और निर्देश दिया कि प्रकरण को प्राथमिकता के आधार पर दोबारा सुनकर शीघ्र निर्णय किया जाए।

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि पारिवारिक मामलों में न्याय का उद्देश्य केवल प्रक्रिया का पालन नहीं, बल्कि विवाद का प्रभावी समाधान होना चाहिए।

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