देश में झूठी शिकायतों और मनगढ़ंत आरोपों पर रोक लगाने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट में एक अहम जनहित याचिका (False Complaint Law India) दायर की गई है। याचिका में केंद्र और सभी राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई है कि पुलिस थानों, अदालतों और अन्य सार्वजनिक कार्यालयों में ऐसे डिस्प्ले बोर्ड लगाए जाएं, जिन पर झूठी शिकायत दर्ज कराने, गलत आरोप लगाने और फर्जी सबूत पेश करने पर मिलने वाली सजा का स्पष्ट उल्लेख हो।
यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि निर्दोष नागरिकों के खिलाफ झूठे मुकदमे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं।
कानून मौजूद, लेकिन प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल
याचिका में तर्क दिया गया है कि भारतीय न्याय संहिता 2023 के चौदहवें अध्याय में झूठी शिकायतों, दुर्भावनापूर्ण अभियोजन और फर्जी साक्ष्य से निपटने के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान (False Complaint Law India) मौजूद हैं। इसके बावजूद सरकार और प्रशासनिक तंत्र द्वारा इन्हें जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने के ठोस प्रयास नहीं किए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि पुलिस थानों के साथ-साथ तहसीलों, जिला अदालतों, पंचायत भवनों और शैक्षणिक संस्थानों में भी ऐसे सूचना बोर्ड लगाए जाएं। इसके अलावा एफआईआर दर्ज करने से पहले शिकायतकर्ता को झूठी शिकायत के कानूनी परिणामों के बारे में अनिवार्य रूप से बताया जाए और उनसे शपथ पत्र या लिखित वचनबद्धता ली जाए कि दी गई जानकारी पूरी तरह सत्य है।
मामलों और सजा के आंकड़ों में बड़ा अंतर
याचिका में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि दर्ज मामलों की संख्या और दोषसिद्धि की दर के बीच भारी अंतर है। बड़ी संख्या में मामलों का अंत बरी होने या खारिज होने के साथ होता है, जो यह संकेत देता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली झूठे मुकदमों और मनगढ़ंत सबूतों के बोझ तले दब रही है।
याचिका में कहा गया है कि झूठी शिकायतें और दुर्भावनापूर्ण अभियोजन कई बार पूरी आपराधिक प्रक्रिया (False Complaint Law India) को ही सजा में बदल देते हैं। इसका असर व्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिसकी भरपाई लगभग असंभव हो जाती है।
विधि आयोग की चेतावनी और मौलिक अधिकारों पर असर
याचिका में विधि आयोग की 277वीं रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें मौजूदा उपायों को “अनिश्चित और अप्रभावी” बताया गया था। रिपोर्ट के अनुसार झूठे मामलों के कारण न केवल अदालतों का कीमती समय बर्बाद होता है, बल्कि बोलने की स्वतंत्रता, व्यापार करने और पेशा जारी रखने जैसे मौलिक अधिकार भी प्रभावित होते हैं।

