- 950 से अधिक देवी-देवताओं की उपस्थिति ने रचा इतिहास
- दशहरा में अबूझमाड़ से सुकमा-बीजापुर तक उमड़ी आस्था
- शांति की वापसी से सदियों पुरानी परंपराओं को मिला नया विस्तार
अनिल सामंत
जगदलपुर। बस्तर में शांति की वापसी का सबसे जीवंत प्रमाण इस बार विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा (Bastar Dussehra) में देखने को मिला। जिन दुर्गम गांवों से नक्सली आतंक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के कारण देवी-देवताओं की उपस्थिति वर्षों तक बाधित रही, वहां की आस्था इस बार पूरे वैभव के साथ जगदलपुर पहुंची। केशकाल, अबूझमाड़,सुकमा और बीजापुर के करीब 50 अंदरूनी गांवों के 950 से अधिक देवी-देवताओं की भागीदारी ने बस्तर दशहरा को ऐतिहासिक स्वरूप दे दिया। यह केवल धार्मिक आयोजन में बढ़ी भागीदारी नहीं,बल्कि बस्तर के सामाजिक जीवन में लौटते विश्वास,सांस्कृतिक जुड़ाव और सामान्य होते जनजीवन की बड़ी तस्वीर है।
वर्षों तक नक्सली प्रभाव के कारण अलग-थलग पड़े गांवों के ग्रामीण इस बार अपने आराध्य देवी-देवताओं के प्रतीकों के साथ बस्तर दशहरा (Bastar Dussehra) में शामिल होने पहुंचे। छत्तीसगढ़ के दूरस्थ अंचलों के साथ पड़ोसी ओडिशा से भी देवी-देवताओं के प्रतीक पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ लाए गए। इनकी उपस्थिति ने स्पष्ट किया कि बस्तर की सांस्कृतिक परंपराएं केवल शहरों तक सीमित नहीं हैं,बल्कि सुदूर वनांचलों के गांवों में भी उनकी जड़ें गहरी हैं।
माउली परघाव की रस्म में 954 देवी-देवताओं की उपस्थिति दर्ज की गई,जबकि भीतर रैनी में 461 देवी-देवता शामिल हुए। यह भागीदारी बस्तर दशहरा की व्यापकता और स्थानीय समुदायों की अटूट आस्था को रेखांकित करती है।
सड़क,सुरक्षा और विश्वास से खुला सांस्कृतिक रास्ता
बस्तर (Bastar Dussehra) के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुखनंदन राठौर के अनुसार,सड़कों के बेहतर निर्माण और दूरस्थ क्षेत्रों में शांति बहाल होने से ग्रामीणों की आवाजाही आसान हुई है। जिन गांवों के लोग सुरक्षा संबंधी कारणों से पहले उत्सव में शामिल नहीं हो पाते थे,वहां के ग्रामीण इस बार पूरे उत्साह के साथ जगदलपुर पहुंचे और आयोजन में भागीदारी निभाई। एएसपी राठौर के अनुसार केशकाल का पूर्व नक्सल क्षेत्र धनोरा से आंगा देव पहुचे थे,आंगादेव सवार सिरहा ने बताया वे बस्तर दशहरा को देखने आए थे,आगामी वर्षो से वे हर वर्ष बस्तर दशहरा में पहुंचेंगे। सिरहा के अनुसार उनके कुनबे में 170 ग्रामीण है,आगामी वर्ष सभी बस्तर के इस महापर्व में सम्मलित होंगें।
इस बदलाव का महत्व बस्तर की भौगोलिक सीमाओं से कहीं बड़ा है। बस्तर दशहरा की परंपरा में देवी-देवताओं और उनके साथ आने वाले समुदायों की भागीदारी ही उसकी आत्मा है। जब दुर्गम अंचलों के आराध्य अपने भक्तों के साथ इस महापर्व में पहुंचते हैं,तब सांस्कृतिक एकता केवल शब्द नहीं,धरातल पर दिखाई देने वाली सच्चाई बन जाती है।
बस्तर की यह तस्वीर देश के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश
बस्तर की यह तस्वीर देश के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है,शांति का वास्तविक अर्थ केवल हिंसा का कम होना नहीं, बल्कि लोगों का निर्भय होकर अपनी परंपराओं को जीना, सामाजिक जीवन से जुडऩा और विकास की मुख्यधारा में आगे बढऩा है। बस्तर दशहरा में दूरस्थ गांवों के देवी-देवताओं की ऐतिहासिक भागीदारी इसी बदलते बस्तर की सशक्त पहचान बनकर उभरी है।
