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रोचक बातों…बातों में…सुकांत राजपूत की कलम से…

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ताली बजवाए, पैसा तो दें…

कोरोना कोविड-19 (corona virus) से जंग के लिए केंद्र (center govt) और राज्यों (state) के बीच अपनी पीठ थपथपाने की होड़ मची हुई है। केंद्र सरकार को विपक्षी भी पानी पी-पी कर कोस रहे हैं। इन सब के पीछे की खास वजह है वल्र्ड बैंक से कोविड के लिए मिला अरबों रुपए का लोन।

केंद्र सरकार ने मार्च के अंतिम सप्ताह में वल्र्ड बैंक से सहयोग मांगा था। 2 अप्रेल को बतौर लोन डब्ल्यूबी ने 75 अरब रुपए रिलीज भी कर दिया। केंद्र के पास कोविड-19 से लडऩे के लिए 75 अरब रुपए की मदद राशि मिल गई। फिर भी राज्यों को विश्व बैंक से मिली राशि का एक अंश मात्र तक नहीं दिया गया है। ताली, थाली, शंख और दिया-बाती करने के बाद भी खाली हाथ हैं राज्य।

दाऊ इसलिए मांग रहे पैसा…

विश्व बैंक से 75 अरब रुपये कोविद 19 से लडऩे के लिए लोन मिल गया है। पूरी राशि भी केंद्र सरकार को 2 अप्रैल को रिलीज भी कर दी गई है। परंतु अब तक जिन उद्देश्यों के लिए पैसे मिले उसको राज्यों को देनें में केंद्र अब तक विचार ही कर रहा है। खासकर छत्तीसगढ़ राज्य को तो कोविड-19 से लडऩे के लिए कोई आर्थिक मदद अब तक नहीं की गई है।

चाईना का रैपिड टेस्ट की खुद हवा निकल गई। कोरिया की किट से जांच हुई जिसे खरीदना पड़ा है। विश्व बैंक से मिली मदद के बाद सीएम भूपेश बघेल ने कोरोना संक्रमण से लडऩे के लिए 30 हजार करोड़ के लिए दो बार पत्र भी लिख चुके हैं। लेकिन केंद्र सरकार है कि कान में जूं नहीं रेंग रही।

पीएम केयर फंड भी लबरेज…

बात करें तो कोरोना संक्रमण के लिए पीएम से लेकर सीएम केयर फंड में भी खूब दान आया है। तीन दिन पहले तक कोरोना के लिए पीएम केयर फंड में तकरीबन 60 हजार करोड़ रुपए तक जमा हो चुका था। केयर फंड और विश्व बैंक से मिले पैसों का पूरा हिसाब-किताब वॉशिंगटन पोस्ट की सुर्खियां भी बनीं।

बावजूद इसके फंड और विश्व बैंक की राशि का कोरोना से जंग में कहां, कितना और कब किन राज्यों को दिया गया यह जवाब फिलहाल पुख्ता नहीं है। बातों ही बातों में आर्थिक गणितबाजों का कहना है कि इन राशियों का उपयोग कहीं आर्थिक लॉकडाउन से उबरने के लिए केंद्र न करें।

लोन का यह खामियाजा…

अब तक कोरोना से जंग का मतलब भारत में ताली, थाली, दिया-बाती ही थी। क्योंकि कोरोना का ईलाज तो दूर इसकी शिनाख्त तक करने का सहीं कारगर उपाय देश में नहीं था। पहले रैपिड टेस्ट किट सहारा बनीं और जल्द ही यह विवाद में पड़ गई। कोरिया से मंगवाई गई किट से जांच रिपोर्ट में वक्त लगा। अब विश्व बैंक से बतौर लोन मिली कोविड-19 से निपटने के लिए राशि का उपयोग भले ही केंद्र सरकार अपने तरीकों से करे।

परंतु यह तो साफ हो गया है कि अब इस लोन के एवज में भारत सरकार को डब्ल्यूएचओ की शतें मानने के लिए बाध्य होना ही पड़ेगा। क्योंकि जिन कारणों के लिए मदद मिली है उसके बाद नियमतया डब्ल्यूएचओ के मुताबिक ही लॉक डाउन पालन के अलावा दिये गए टास्क पर ही काम करना होगा। इसी का नतीजा है कि टास्क के मुताबिक जांच शुरु होने के बाद ही केस की संख्या और मरने वालों की तादात देश में बढ़ गई है। मतलब पहले जो था वह सिर्फ ताली, थाली के मुताबिक चल रहा था।

राज्य का हिस्सा वाजिब है…

डब्ल्यूएचओ की गाइड लाइन को फॉलो करना ही पड़ेगा। लॉक डाउन की मियाद, जांच के तरीके, प्रभावितों को राशन से लेकर दवाएं तक उपलब्ध करवाने का निर्देश मानना केंद्र सरकार की बाध्यता है। राज्यों को भी कोरोना से निपटने के लिए बिना आर्थिक मदद के केंद्र सिर्फ गाइड लाइन फॉलो करवा रहा है। एसे में उन पैसों में राज्यों का भी हक बनता है। संक्रमणकाल में शराब बिक्री भी सेंट्रल गाइड लाइन के बाद ही राज्यों में शुरु हुई है।

इतना ही नहीं केंद्र को यूएई से भी बल्क में जांच किट मुफ्त में मिली है जिसे वो उपयोग में ला रहा है। इस तरह हिंग लगे न फिटकरी वाली कहावत केंद्र सरकार की है। अरबों रुपए बाहरी मदद, देशवासियों का केयर फंड में करोड़ों रुपए का दान अब मुफ्त में यूएई के शेखों व्दारा भेजी गई जांच किट के अलावा सेंट्रल के खाद्य भंडारण में अनाज का बफर स्टॉक भी है। फिर भी राज्यों को न तो आर्थिक मदद, मुफ्त अनाज और जांच किट की सुविधा नहीं देना क्या सियासत है?

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