बिलासपुर में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि गिरफ्तारी, हिरासत या रिमांड के दौरान संवैधानिक और कानूनी सीमाओं का उल्लंघन किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि पुलिस को अधिकार मिला है, लेकिन उसका इस्तेमाल संयम और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने हिरासत में कथित दुर्व्यवहार से जुड़ी एक रिट याचिका का निपटारा करते (Chhattisgarh High Court) हुए स्पष्ट किया कि छोटे या तुच्छ विवादों में भी नागरिकों की गरिमा, स्वतंत्रता और संवैधानिक सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। अदालत ने 21 जनवरी को पारित आदेश में कहा कि हिरासत में किसी भी प्रकार का उत्पीड़न, मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना पूरी तरह अस्वीकार्य है।
अदालत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिए हैं कि वे प्रदेश की सभी पुलिस इकाइयों को स्पष्ट और स्थायी दिशा-निर्देश जारी करें, ताकि अवैध हिरासत, अनावश्यक हथकड़ी, सार्वजनिक रूप से घुमाना या किसी भी तरह का अपमान दोबारा न हो। कोर्ट ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर संवैधानिक आदेशों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
यह याचिका दुर्ग जिले के भिलाई क्षेत्र के पांच निवासियों द्वारा दायर (Chhattisgarh High Court) की गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि अक्टूबर 2025 में सिनेमा हॉल में मामूली कहासुनी के बाद स्मृति नगर चौकी पुलिस ने उनके साथ अवैध हिरासत, मारपीट, मानसिक प्रताड़ना, हथकड़ी लगाने और सार्वजनिक रूप से घुमाने जैसी कार्रवाई की।
राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पुलिस ने एक महिला की लिखित शिकायत के आधार पर कार्रवाई (Chhattisgarh High Court) की थी। वहीं पुलिस महानिदेशक ने शपथपत्र में दावा किया कि सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया, मेडिकल जांच कराई गई और सार्वजनिक परेड का आरोप पुलिस वाहन में आई तकनीकी खराबी के कारण उत्पन्न गलतफहमी है।
संबंधित थाना प्रभारी को कारण बताओ नोटिस जारी करने की जानकारी भी दी गई। हाईकोर्ट ने उम्मीद जताई है कि भविष्य में पुलिसिंग पूरी तरह पेशेवर, जवाबदेह और कानून के अनुरूप होगी तथा नागरिकों के अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित किया जाएगा।

