Editorial: तमिलनाडु में जोसेफ विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है और इसी के साथ ही उन्होंने अपने एक चुनावी वादे को अमलीजामा पहनाते हुए दो सौ यूनिट तक बिजली को फ्री करने की फाइल पर हस्ताक्षर कर दिये हैं। अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने चुनावी घोषणा पत्र में किये गये वादों को पूरा करना है।
गौरतलब है कि उन्होंने हर परिवार की एक महिला को ढाई हजार रूपये मासिक सम्मान निधि देने की, शादी के समय आठ ग्राम सोना देने की तथा हर परिवार को साल में छह रसोई गैस सिलेंडर मुफ्त देने की तथा बेरोजगारों को 4000 रूपये महिना देने की तथा महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा प्रदान करने की और आगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को 18 हजार रूपये महिना वेतन देने और किसानों का कर्ज माफ करने सहित और भी ढ़ेरों घोषणाएं कर रखी है।
इन सभी घोषणाओं को यदि अमलीजामा पहनाया जाता है तो इस पर 12 लाख करोड़ रूपये सालाना खर्च आएगा जबकि तमिलनाडु सरकार का बजट 2 लाख करोड़ रूपये है ऊपर से दुबर पर दो अषाढ़ वाली बात यह है कि तमिलनाडु पर 11 लाख करोड़ का कर्जा है। कर्ज के मामले में तमिलनाडु की गिनती देश के सबसे बड़े कर्जदार राज्यों में होती है। ऐसी स्थिति में जबकि पहले ही तमिलनाडु कर्ज से सिर से पांव तक लदा हुआ है ऐसे में इन चुनावी घोषणाओं को पूरा करने के लिए नये मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के पास संसाधन कहां से आएंगे। यह विचारणीय मुद्दा है।
तमिलनाडु सरकार जब तक 11 लाख करोड़ का कर्ज अदा नहीं करेगी। तब तक उसे नया कर्ज भी प्राप्त नहीं होगा। बहरहाल देखना दिलचस्प होगा कि तमिलनाडु की नई सरकार ने वहां की जनता को सुनहरे सपने दिखाकर उनका वोट हासिल किया है उन सपनों को वह कैसे साकार करेगी। यदि वह इसमें विफल रही तो तमिलनाडु की जनता इस नई सरकार को भी उखाड़ फेंकने में देर नहीं लगाएगी। वैसे भी अल्पमत वाली यह सरकार कागज की नांव की मानिंद है जिसका देर तक और दूर तक सफर कर पाना नामुमकिन होता है। यदि एक भी सहयोगी दल ने समर्थन वापस लिया तो यह सरकार गिर सकती है।
