कभी-कभी अदालत में समय ही सबसे बड़ा गवाह बन जाता है। सालों पुराने मामलों में जब हर बयान, हर रिपोर्ट और हर देरी को परखा जाता है, तब सच अपने अलग ही रूप में सामने आता है। एक ऐसे ही मामले में लंबे इंतजार के बाद न्यायिक समीक्षा ने नतीजा बदल दिया।
यह मामला बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से जुड़ा है, जहां 19 साल पुराने दुष्कर्म प्रकरण में सुनवाई करते हुए सिंगल बेंच ने निचली अदालत (Bilaspur High Court) द्वारा दी गई सात साल की सजा को रद्द कर दिया। न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।
प्रकरण की जड़ें बलरामपुर जिले से जुड़ी हैं। आरोप था कि फरवरी 2006 की एक शाम विवाहिता महिला के साथ खेत में बलपूर्वक दुष्कर्म किया गया। घटना के तीन दिन बाद मामला दर्ज किया गया और विवेचना के बाद सत्र न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसी फैसले को आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
अपील की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने कई अहम बिंदु उभरकर आए। पीड़िता के बयान और अन्य गवाहों के कथनों में गंभीर विरोधाभास पाए गए। पीड़िता ने यह कहा था कि वह आरोपी को पहचानती (Bilaspur High Court ) नहीं थी, जबकि परिवार के अन्य सदस्यों ने उसे पड़ोसी बताया। अदालत ने इसे मामले की विश्वसनीयता पर असर डालने वाला पहलू माना।
मेडिकल रिपोर्ट भी अभियोजन के पक्ष को मजबूती देने में नाकाम रही। जांच में न तो किसी प्रकार की बाहरी या आंतरिक चोट पाई गई और न ही हालिया यौन संबंध को लेकर कोई स्पष्ट निष्कर्ष सामने आया। इसके अलावा, एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी के पीछे भी कोई ठोस कारण प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल पीड़िता के बयान के आधार पर सजा तभी दी जा सकती है, जब वह पूरी तरह सुसंगत, विश्वसनीय और अन्य साक्ष्यों से पुष्ट हो। इस मामले में ऐसा नहीं पाया गया, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना न्यायसंगत है।
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अदालत ने निचली अदालत का फैसला पलट (Bilaspur High Court) और आरोपी को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। यह निर्णय एक बार फिर इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि आपराधिक मामलों में सजा का आधार केवल आरोप नहीं, बल्कि ठोस और भरोसेमंद साक्ष्य होते हैं।
