बिलासपुर हाई कोर्ट ने विवाह विच्छेद से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट कर (Bilaspur High Court Divorce Verdict) दिया है कि पत्नी की कथित गलतियों को माफ कर लंबे समय तक साथ रहने के बाद पुराने आरोपों के आधार पर तलाक नहीं मांगा जा सकता। कोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए पत्नी की याचिका स्वीकार कर ली है।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि दहेज प्रताड़ना के मामले से बरी होने के बाद पति-पत्नी करीब सात साल तक साथ रहे। यह इस बात का प्रमाण है कि पति ने पूर्व के विवादों और आरोपों को स्वीकार कर माफ कर दिया था। ऐसी स्थिति में उन्हीं पुराने आरोपों को आधार बनाकर तलाक की मांग कानूनन टिकाऊ नहीं है।
मामला जांजगीर-चांपा और बलौदाबाजार-भाटापारा जिले से जुड़े दंपति (Bilaspur High Court Divorce Verdict) का है। दोनों का विवाह 2 जून 2003 को हुआ था। वर्ष 2008 में पत्नी ने पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया था, जिसमें बाद में पति को बरी कर दिया गया। इसके बाद दोनों वर्ष 2010 से 2017 तक साथ रहे। इसी अवधि के बाद पति ने पारिवारिक न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे फैमिली कोर्ट ने मंजूर कर लिया था।
हाई कोर्ट ने सुनवाई के बाद कहा कि पति द्वारा लगाए गए आरोप अत्यधिक विलंब से किए गए हैं और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(1)(d) के तहत इस तरह की देरी तलाक के आधार को कमजोर (Bilaspur High Court Divorce Verdict) करती है। कोर्ट ने माना कि लंबे समय तक साथ रहना वैवाहिक संबंधों को निभाने की सहमति दर्शाता है। इन टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने परिवार न्यायालय का फैसला रद्द कर दिया और पत्नी को राहत दी है।

