छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ राज्य चिकित्सा सेवा निगम लिमिटेड (CGMSC) की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना (Bilaspur High Court Decision) ठोका है। मामले की सुनवाई Bilaspur High Court में रमेश सिन्हा और रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने की। अदालत ने इसे सार्वजनिक निविदा प्रक्रिया में समान अवसर के सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन माना।
दरअसल, CGMSC ने 23 सितंबर 2025 को जिला जशपुर के पत्थलगांव ब्लॉक में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से 50 बिस्तरों वाले अस्पताल के निर्माण कार्य के लिए ई-निविदा आमंत्रित की थी। इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 400.98 लाख रुपये तय की गई थी। निविदा प्रक्रिया में याचिकाकर्ता ने सभी शर्तों का पालन करते हुए अनुमानित लागत से 9.9 प्रतिशत कम दर की बोली लगाई थी, जो वित्तीय रूप से राज्य के लिए सबसे लाभकारी थी।
इसके बावजूद CGMSC ने कम दर वाली बोली को नजरअंदाज करते हुए अधिक दर वाली निविदा को स्वीकृति दे दी। इस कार्रवाई को चुनौती (Bilaspur High Court Decision) देते हुए दुर्गा मेडिकल, घरघोड़ा (जिला रायगढ़) निवासी नटवर लाल अग्रवाल ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में आरोप लगाया गया कि उसकी वित्तीय बोली को बिना ठोस आधार के न तो खोला गया और न ही उस पर विचार किया गया।
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि उसी अवधि में उसने विभाग की एक अन्य निविदा में समान दस्तावेजों के साथ भाग लिया था, जिसे तकनीकी रूप से वैध माना गया। ऐसे में मौजूदा निविदा में दस्तावेजों को लेकर उठाया गया सवाल पूरी तरह मनमाना और भ्रामक प्रतीत होता है।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि निविदा मामलों में न्यायिक समीक्षा भले ही सीमित हो, लेकिन यह देखना आवश्यक है कि निर्णय प्रक्रिया मनमानी, भेदभाव और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं (Bilaspur High Court Decision) से मुक्त हो। इस मामले में सबसे कम बोली लगाने वाले वैध ठेकेदार को बाहर करना निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और समान अवसर के सिद्धांत के खिलाफ है।
हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि अनुबंध पहले ही दिया जा चुका है और कार्य प्रगति पर है। ऐसे में जनहित को देखते हुए निविदा को रद्द करना उचित नहीं होगा। इसी संतुलन के तहत कोर्ट ने CGMSC को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को क्षतिपूर्ति के रूप में एक लाख रुपये का भुगतान करे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि चार सप्ताह के भीतर यह राशि नहीं चुकाई जाती है, तो उस पर छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। इस फैसले को सरकारी निविदाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए एक कड़ा संदेश माना जा रहा है।

