नक्सल प्रभावित क्षेत्र में हुए बड़े एंटी नक्सल ऑपरेशन में अहम भूमिका निभाने वाले तीन पुलिस जवानों की आउट ऑफ टर्न प्रमोशन से जुड़ी याचिका पर बिलासपुर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश (Bilaspur High Court) पारित किया है। मामले की सुनवाई करते हुए सिंगल बेंच ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को याचिकाकर्ताओं के अभ्यावेदन पर नियमानुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए दो महीने की समय-सीमा तय की है।
यह आदेश न्यायमूर्ति पीपी साहू की एकलपीठ द्वारा पारित किया गया। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता जवानों का मामला अभी सक्षम प्राधिकारी के समक्ष लंबित है और उस पर अब तक अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। ऐसे में न्यायालय ने सीधे प्रमोशन का आदेश देने के बजाय, नियमानुसार निष्पक्ष और समयबद्ध निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।
याचिका दायर करने वाले जवानों में दीपक नायक, अग्नु राम कोर्राम और संगीत भास्कर (Bilaspur High Court) शामिल हैं, जो वर्तमान में कांकेर जिले में पदस्थ हैं। याचिका के अनुसार, ये तीनों जवान 15 और 16 अप्रैल 2024 को बीएसएफ के साथ संयुक्त रूप से चलाए गए एंटी नक्सल ऑपरेशन का हिस्सा थे। यह ऑपरेशन कांकेर जिले के कालपर–हापाटोला–छेटेबेठिया क्षेत्र में हुआ था, जहां सुरक्षाबलों की 40 से 50 सशस्त्र माओवादियों के साथ भीषण मुठभेड़ हुई थी।
इस कार्रवाई में सुरक्षाबलों ने बड़ी सफलता हासिल करते हुए 29 सशस्त्र नक्सलियों को मार गिराया था, जिनमें 15 पुरुष और 14 महिला नक्सली शामिल थे। ऑपरेशन के दौरान भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद भी बरामद किया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस अभियान में उन्होंने भी जान जोखिम में डालकर साहसिक भूमिका निभाई थी।
जवानों ने कोर्ट को बताया कि इस सफल एंटी नक्सल ऑपरेशन में कुल 187 पुलिसकर्मी शामिल थे, लेकिन राज्य सरकार द्वारा केवल 54 पुलिसकर्मियों को ही पुलिस विनियम 70(क) के तहत आउट ऑफ टर्न प्रमोशन का लाभ दिया गया। शेष जवानों को इससे वंचित रखा गया, जो समान परिस्थितियों में ऑपरेशन का हिस्सा थे। याचिकाकर्ताओं ने इसे भेदभावपूर्ण कार्रवाई बताया है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि जवानों ने 25 जून 2025 को पुलिस महानिरीक्षक, बस्तर रेंज के समक्ष अपना अभ्यावेदन (Bilaspur High Court) प्रस्तुत किया था, लेकिन काफी समय बीत जाने के बावजूद उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। इसी के चलते उन्हें हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस महानिदेशक को याचिकाकर्ताओं के अभ्यावेदन पर पुलिस विनियम 70(क) के तहत कानून सम्मत, निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ निर्णय लेना होगा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह पूरी प्रक्रिया दो महीने के भीतर पूरी की जाए, ताकि जवानों को अनावश्यक रूप से और प्रतीक्षा न करनी पड़े।

