Bilaspur High Court : नदियों के भविष्य पर हाई कोर्ट सख्त, संरक्षण के लिए राज्य स्तरीय समिति बनाने का आदेश
Bilaspur High Court
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने प्रदेश की नदियों की बिगड़ती हालत पर गहरी चिंता जताते हुए राज्य शासन को अहम निर्देश दिए हैं। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए एक राज्य स्तरीय कमेटी गठित करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह कार्य केवल सरकारी विभागों पर नहीं छोड़ा जा सकता, इसमें जनभागीदारी और सामाजिक जागरूकता भी अनिवार्य है।
डिवीजन बेंच ने निर्देश दिया है कि प्रस्तावित समिति में विभिन्न विभागों के अधिकारियों के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों और पर्यावरण प्रेमियों को भी शामिल (Bilaspur High Court) किया जाए, ताकि जमीनी स्तर पर प्रभावी कार्ययोजना तैयार की जा सके।
नदियों के संरक्षण से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि शासन द्वारा प्रस्तुत की जा रही जानकारियों के बावजूद प्रदेश की कई छोटी-बड़ी नदियों के संरक्षण को लेकर ठोस और परिणामकारी कार्रवाई नजर नहीं आ रही है। इसी कारण एक समग्र राज्य स्तरीय तंत्र की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
अरपा, लीलागर, सोनपन और तिपान नदी पर मांगी रिपोर्ट
हाई कोर्ट ने अरपा नदी के उद्गम स्थल और उसके आसपास स्थित निजी भूमि के अधिग्रहण व भू-अर्जन की स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश (Bilaspur High Court) दिए हैं। इसके साथ ही कोरबा की लीलागर नदी, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले की सोनपन और तिपान नदी के संरक्षण एवं पुनर्जीवन के लिए अब तक किए गए कार्यों की जानकारी शपथ पत्र के साथ प्रस्तुत करने को कहा गया है।
अरपा अर्पण महाभियान सहित अन्य याचिकाओं की एकसाथ सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि नदियों के उद्गम स्थलों पर अतिक्रमण, खेती और प्रदूषण सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं, जिन पर तत्काल प्रभावी रोक जरूरी है।
जनसहभागिता पर कोर्ट का जोर
सुनवाई के दौरान जब राज्य स्तरीय समिति में मुख्य सचिव को शामिल करने का सुझाव सामने आया, तब याचिकाकर्ता अधिवक्ता अरविंद शुक्ला ने स्थानीय विशेषज्ञों और पर्यावरण से जुड़े लोगों को प्राथमिकता देने की मांग (Bilaspur High Court) रखी।
इस पर डिवीजन बेंच ने सहमति जताते हुए कहा कि नदियों का संरक्षण केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी है। हाई कोर्ट ने जनहित याचिका की अगली सुनवाई के लिए 16 मार्च 2026 की तिथि तय की है और तब तक राज्य सरकार से ठोस कार्ययोजना प्रस्तुत करने की अपेक्षा जताई है।
