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छोटे उद्योगों पर पड़ रही जीएसटी की मार

Date : 12-Jul-18

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भरत झुनझुनवाला

मध्यमार्गी अर्थशास्त्रियों की मानें, तो जीएसटी पूरी तरह सफल है। इससे करदाताओं की संख्या में लगभग 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इससे अंतरराज्यीय व्यापार सरल हो गया है और दीर्घकाल में इसके अच्छे प्रभाव सामने आएंगे। प्रश्न है कि जीएसटी लागू होने के बाद अर्थव्यवस्था में गति आने के बजाय ढिलाई क्यों आ रही है? वर्ष 2016-17 में हमारी जीडीपी विकास दर 7.1 प्रतिशत थी, जो 2017-18 में घटकर 6.7 प्रतिशत हो गई है। आने वाले वर्ष में इसके दोबारा बढऩे के आसार बताए जा रहे हैं, पर यह अनुमान की बात है। मेरी समझ से इस विषय की कुंजी जीएसटी के छोटे और बड़े उद्योगों पर अलग-अलग प्रभाव में है। देश में छोटे उद्योगों की विशेष भूमिका है। इनके द्वारा ही अधिकतर रोजगार पैदा किए जाते हैं। ये छोटे उद्योग ही हमारी जनता की उद्यमिता के विकास की लैबरेटरी हैं। धीरूभाई अंबानी जैसे बड़े उद्यमी ने छोटे उद्योग लगाकर ही शुरुआत की थी। यदि उन्हें छोटे उद्योग लगाने का अवसर न मिलता तो वे शायद बड़े उद्यमी भी न बन पाते।

हमारी सोच थी कि छोटे उद्योगों को टैक्स में छूट दी जाती है क्योंकि वे अर्थव्यवस्था में रोजगार पैदा करते हैं और उद्यमिता का विकास करते हैं। जीएसटी में छोटे और बड़े उद्योगों को एक ही साथ रख दिया गया है। सभी पर टैक्स की दर एक समान है। छोटे उद्योगों की उत्पादन लागत ज्यादा आती है। एक समान दर से टैक्स का भुगतान करने के कारण वे बड़े उद्योगों के सामने टिक नहीं पा रहे हैं। पहले छोटे शहरों में छोटे-छोटे बिस्कुट निर्माताओं की फैक्ट्रियां होती थीं। वर्तमान में ये मृतप्राय हो गई हैं। दरअसल, जीएसटी के चलते बड़े बिस्कुट निर्माताओं के लिए अपने माल को एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाना आसान हो गया है। छोटे उद्योगों के लिए टैक्स में छूट समाप्त कर दी गई है। इसलिए ये समाप्त हो रहे हैं। छोटे उद्योगों के समाप्त होने से रोजगार कम हुए हैं, छोटे उद्यमियों की आय कम हुई है और बाजार में कुल मांग में भी अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है। यही कारण है कि बड़े उद्योग भी मोटे तौर पर दबाव में हैं।

बड़े उद्योगों पर दो परस्पर विरोधी प्रभाव पड़ रहे हैं। एक तरफ छोटी बिस्कुट कंपनियों के बंद हो जाने से उनके माल की मांग बढ़ी है। दूसरी तरफ उन्हीं छोटी बिस्कुट कंपनियों के बंद होने से बिस्कुट की कुल मांग में गिरावट आई है। इस तरह एक तरफ बड़ी कंपनियों के प्रॉफिट में वृद्धि हो रही है। दूसरी तरफ हमारी जीडीपी विकास दर में गिरावट आई है। यूं समझें कि अर्थव्यवस्था एक थाली के समान है। उसमें बड़े उद्योगों की एक रोटी रखी हुई है। जीएसटी लागू होने के बाद थाली छोटी हो गई लेकिन बड़े उद्योगों की रोटी कुछ बड़ी हो गई। इस प्रकार हमारे सामने जीडीपी की विकास दर में गिरावट तथा बड़े उद्योगों के मुनाफे में वृद्धि साथ-साथ दिख रही है। जुलाई 2017 में जीएसटी की वसूली 94 हजार करोड़ हुई थी। जून 2018 में यह 96 हजार करोड़ रही है। पूर्व में देखें तो वर्ष 2006 तथा 2014 तक के 9 वर्षों में केंद्र सरकार का राजस्व 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा था। जीएसटी लागू होने के बाद उसमें वृद्धि शून्यप्राय हो गई है जो कि जीएसटी के अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव का प्रमाण है। लेकिन ये अर्ध-मृत छोटे उद्योग जीएसटी के रिटर्न फाइल कर रहे हैं। जीएसटी के रिटर्न फाइल करने वालों में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जीएसटी में छोटे उद्यमियों के लिए कंपाउंडिंग स्कीम लागू की गई है, लेकिन यह स्कीम भी छोटे उद्यमियों के लिए अभिशाप बन गई है। कारण यह कि छोटे उद्योगों द्वारा जो अपने इनपुट या कच्चे माल पर जीएसटी अदा किया जाता है, उसका उन्हें रिफंड नहीं मिलता है। वे यदि बड़ी कंपनी को माल सप्लाई करते हैं तो उनके द्वारा जो शून्यप्राय एक प्रतिशत का जीएसटी अदा किया जाता है वह भी रिफंड नहीं होता है। इस प्रकार छोटे उद्योगों के ऊपर जो कच्चे माल पर दिया गया जीएसटी है, वह एक अतिरिक्त बोझ बन गया है। इसलिए कंपाउंडिंग स्कीम के अंतर्गत छोटे उद्योगों पर टैक्स का भार वास्तव में बढ़ गया है।

जीएसटी की इस दुर्दशा का मूल कारण यह है कि उसके सिद्धांत को डिजिटल इकॉनमी के मकडज़ाल में डाल दिया गया है। जीएसटी का मूल सिद्धांत यह था कि राज्यों तथा केंद्र सरकारों द्वारा अलग-अलग वसूल किए गए एक्साइज ड्यूटी तथा सेल टैक्स को एक ही व्यवस्था में शमिल करने से टैक्स की अदायगी आसान हो जाएगी और अर्थव्यवस्था में सरलता आएगी। वह सिद्धांत ठीक था। लेकिन सरकार ने जीएसटी की छाया में डिजिटल इकॉनमी को बढ़ाने का निर्णय लिया। जीएसटी को कागजी कार्यवाही में जकड़ दिया गया। जो लाभ हुआ उससे ज्यादा नुकसान कागजी मकडज़ाल के कारण हुआ। यही कारण है कि जीएसटी का प्रभाव नकारात्मक हो गया है।

मध्यमार्गी अर्थशास्त्रियों द्वारा कहा जा रहा है कि दीर्घकाल में जीएसटी लाभप्रद होगा। लेकिन वे भूल रहे हैं कि महान अर्थशास्त्री कीन्स ने कहा था कि 'इन द लांग रन वी ऑल आर डेडÓ यानी दीर्घकाल में हम सब मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए दीर्घकाल के चक्कर को छोड़कर जीएसटी के जो वर्तमान दुष्प्रभाव हैं, उन पर सरकार को तत्काल कार्य करना चाहिए अन्यथा आने वाले समय में कठिनाई बढ़ सकती है। एक उपाय है कि छोटे उद्योग को इनपुट पर अदा की गई जीएसटी का रिफंड दिया जाए। ऐसा करने से वे बड़े उद्योगों के सामने खड़े हो सकेंगे और उनको दी गई राहत वास्तव में कारगर होगी। छोटे उद्योगों के एक बार फिर उठ खड़ा होने से अर्थव्यवस्था में गति आ सकती है।