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संत जी के बिगड़ैल भक्त

Last Modified Aat : 12-Jul-18

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 संत जी के बिगड़ैल भक्त 

गिरीश पंकज

संत जी ने जो-जो सिखाया, उनके चेले वही सब नहीं सीख सके, कमाल है। संत ने मूर्ति-पूजा का विरोध किया और उनके जाने के बाद उनके भक्तों ने सबसे पहले संत जी की ही मूर्ति बना डाली, फिर उन्हीं की मूर्ति के नीचे खड़े होकर संत जी का गुणगान कुछ इस अंदाज में करने लगे,  हमारे संत बड़े महान थे । उन्होंने हमेशा मूर्ति पूजा का विरोध किया। बोलिए हमारे संत की जय। कार्यक्रम के बाद सभी जन उनकी मूर्ति को प्रणाम करते हैं और कुछ लोग तो अब उनको देवता समझकर पूजने भी लगे हैं। जबकि संत जी ने साफ-साफ कह दिया था कि मुझे देवतागिरी पर विश्वास नहीं है। मैं देवताओं को मानता ही नहीं । मूर्ति को नहीं पूजता, तुम लोग भी इस गोरखधंधे में मत पडऩा लेकिन भक्तों को कौन समझाए। संत की मूर्ति बना दी गई । अब उसमें किसी देवता के भी दर्शन करने लगे। अद्भुत है मेरा देश।

संत ने कहा था, बेटे बुरा मत देखना। बुरा मत सुनना और बुरा बिल्कुल मत बोलना और करना भी मत ।  लेकिन भक्त भक्त होते हैं । वे संत बनने का लफड़ा नहीं पालते।  भक्त बनकर संतुष्ट हो लेते हैं। क्योंकि दुकान भक्त बनने पर ही चलती है । संत बनने पर जीवन बड़ा कठिन हो जाता है।  इसलिए भक्तों ने जितना बुरा हो सकता था,  उतना किया। जितना बुरा-बुरा हो सकता था, बोलते भी रहे। उस दिन संतजी के परम भक्त हमें मिल गए ।मुंह से उनके दारू की सुगंध आ रही थी। मैंने जानबूझकर बदबू नहीं लिखा, क्योंकि ऐसा लिखने से भक्तगण नाराज हो जाते हैं । वे  दारू को दारू नहीं मानते। उसको एक अच्छा पेय कहते हैं । ऐसा पेय जिस का पान करते ही मनुष्य धरती से सीधे स्वर्ग लोक पहुंच जाता है। मदिरा दीन- दुनिया के चक्कर से मुक्त कर देती है । उनके संत ने कभी कहा था,  हमें दीन-दुनिया से मुक्ति पानी है । हमें स्वर्ग लोक का ध्यान करना है । इतना बोलकर संत जी तो स्वर्ग लोक चले गए लेकिन कभी-कभी जब भक्तों का मन करता है कि वे भी स्वर्ग लोक का विचरण करें इसलिए मदिरापान करने लगते हैं और सीधे स्वर्ग की अनुभूति से गुजरते हैं भक्तगण मदिरा में सुगंध ही देखते हैं, दुर्गंध नहीं। वह तो हम जैसे निकृष्ट और पापी टाइप के लोग हैं जो मदिरा से घृणा करते हैं । वरना तो इस देश में सरकारें तक मदिरा प्रेमी होती है। जितनी मदिरा बिकेगी, उतनी आय होगी । तो ऐसे ऐसे भक्त हैं जो मदिरापान को संत जी का आदेश ही समझते हैं क्योंकि संत जी ने कहा था भक्तों अपने सत्कर्मों से तुम्हें स्वर्ग लोक मिलेगा। तुम दीन-दुनिया से निश्चिंत हो जाओगे। और भक्तों ने महसूस भी किया कि जब जब उन्होंने मदिरापान किया,  दुनिया से मुक्त हो गए। कभी सड़क पर पड़े रहे तो कभी नाली शरणम गच्छामि हो गए।

संत जी ने कहा था, बेटा, सबको क्षमा करो ।तुम्हारी जो निंदा करें, उसे भी माफ करने की आदत डालो। सब से प्रेम रखो ।यही मनुष्य योनि की सार्थकता है", लेकिन संत के उपदेश को इस कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देने वाले उनके भक्त मौका पढ़ते ही ल_ लेकर टूट पड़ते हैं और लोगों से पंगे लेते रहते हैं। किसी ने कोई थोड़ी सी भी गलत बात की तो उस पर पिल पड़ते हैं । फिर जब संत जी की जयंती आने पर मंच पर खड़े हो कर फरमाएंगे,  मनुष्य को सहनशील होना चाहिए। उसे मनुष्य मात्र से प्रेम करना चाहिए। हमारे संत जी ने हमें यही सिखाया इसीलिए हम लोग उन्हीं के बताए रास्ते पर चल रहे हैं । बोलिए संत महाराज की जय!