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मत समझो तुम एक बला है सेल्फी लेना बड़ी  कला है-2 

Last Modified Aat : 11-Jul-18

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गिरीश पंकज

कल का शेष 

मैंने पूछा मित्र, कुछ चित्रों में लोग प्रसन्न हो कर हाथ को आड़ा-तिरछा कर लेते हैं। मुँह  भी बिगाड़ लेते है।  क्या यह सत्य  है।

मित्र ने परम् ज्ञानियों की तरह मुस्कराते हुए कहा, यह सही है मित्र। सेल्फी लेते वक्त यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि सब जोर-जोर से चिल्लाएं, कुछ इस अंदाज में मानो कोई गड़ा हुआ खज़ाना  मिल गया है । इतनी जोर से खुशी का इजहार करें कि आसपास के लोग चौंक कर देखने लगें कि अचानक इन लोगों को क्या हो गया है।  हू-हू, हा-हा हुर्रे  जैसा कुछ भी करें मगर जोर से चीख़ें-चिल्लाएँ। ज्ञानी जन यही बताते हैं कि ऐसा करने से तस्वीर अच्छी तरह से बिगड़ती है। तो मित्रए सेल्फी लेने की कला धीरे.धीरे आती है । बड़ी साधना माँगती है। अगर आप इस कला में पारंगत नहीं हैं तो किसी भी नए लड़के या लड़की से सीख सकते हैं। आजकल लड़की अधिक स्मार्ट है या लड़का,  कहना बड़ा कठिन है।  वैसे इस बात का ध्यान रहे कि जिसने फटी जींस पहन रखी हैए उससे अधिक ज्ञान मिल सकता है।  वैसे तो सेल्फी के मामले में आजकल  सभी  विशेषज्ञ  होते हैं। ये लोग भयंकर किस्म के अति उत्साह के साथ आपको बता सकते हैं कि बाबाए सेल्फी ऐसे लो ।

मैंने कहा, तुम्हारी बाते सुन कर लगता है कि अब महाविद्यालयों में एक पाठ सेल्फी से संबंधित होना चाहिए। उसका नाम ही रहे सेल्फी-विज्ञान। सेल्फीलॉज़ी।  किसी अति विद्वान से बात करके सेल्फी-पुराण भी तैयार कराया जाए।

मेरी बात सुन कर मित्र खुश हो गया और बोला, यह तुमने सुंदर आइडिया दिया।   इस दिशा में कुछ काम होना चाहिए।  सेल्फीलॉज़ी के लिए एक साल का कोर्स भी शुरू किया जा सकता है।  इस में विस्तार के साथ जानकारी दी जानी चाहिए कि सेल्फी आखिर ली कैसे जाती है । कोर्स शुरू होने पर बड़ी-बड़ी मोबाइल कंपनियां कोर्स वालों से सम्पर्क में आएंगी और उनके मोबाइल सेट धड़ल्ले से बिकेंगे।  मोबाइल गुरु बताएंगे की मोबाइल कैमरे को दाएं हाथ से पकड़ें  या बाएं हाथ से पकड़ें । उसे घुमाकर रखें या सीधा रखें । सेल्फी को स्टिक के सहारे लेना ठीक रहेगा या हाथ में भी रख कर के अच्छी सेल्फी ली जा सकती है । अगर स्टिक है तो कोई बात नहीं अगर सिर्फ हाथ से लेना है तो उसे इस खूबसूरती के साथ पकड़े सबके चेहरे आ जाए। इसका ज्ञान दिया जाना अब पढ़ाई से भी अधिक अनिवार्य लगने लगा हैं।  क्योंकि राह चलते हम अनेक आत्माओं को एकल या सामूहिक सेल्फी लेते हुए देख सकते हैण्लगता हैए सेल्फी के दौरान वे अकेले में ही बहुत खुश नजऱ आते हैं। दीन-दुनिया की कोई फि़क्र नहीं।  वे  भावशून्य अवस्था में पहुँचकर एकल अभिनय में रत हो कर दुनिया को धन्य करते हैं। मित्र मेरी बातो से सहमत था उसने अति उत्साह के साथ कहा-सेल्फी पुराण तो मेरा होनहार बेटा भी लिख सकता है।  वह  दिन-रात सेल्फीबाज़ी में लगा रहता है।  उसका किसी काम में मन ही नहीं लगता। मैं कहता हूँ नौकरी खोज,  तो वह कहता है, पहले सेल्फी तो ले लूँ  बाबा। आजकल आड़ा-तिरछा चेहरा बना कर किसी  श्वीगो वीडियो जैसी किसी बकवास टाइप की साइट पर भी डाल कर कुछ पैसे कमाए जा सकते है।  आजकल फूहड़ता भी खूब पैसे दे जाती है।  कमाल का दौर है।   इसी चक्कर में मेरा, गनीमत है, उन्होंने उल्लू नहीं कहा -प_ा  दिन-रात लगा रहता है, सेल्फी, सेल्फी और सेल्फी बस। उसी से कहता हूँ कि  समय निकाल कर सेल्फी-पुराण लिख ले मेरे लाल। और हो जा मालामाल। शायद इसी बहाने तू दो-चार पैसे भी कमा लेगा।  इतना बोल कर मित्र तेजी के साथ घर की ओर बढ़ गए।