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सुधा भारद्वाज और मीडिया

Date : 09-Jul-18

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कनक तिवारी

सुधा भारद्वाज को लेकर, एक विवादित खबर अर्णव गोस्वामी के रिपब्लिक टी.वी. के कारण कुछ लोगों ने पोस्ट की है सुधा भारद्वाज के बारे में। मैं शुरू से बता दूं सुधा और मेरा बहुत पुराना परिचय है। दुर्ग जिले में राजहरा में श्रमिक आंदोलन के बहुत बड़े नेता शंकर गुहा नियोगी आपातकाल के दिनों में मेरे बहुत करीब आए। मैं लगातार उनकी मदद करता रहा और उनकी यूनियन की, उनकी सहकारी समितियों की। नियोगी से घरोबा जैसा हो गया था। उनकी हत्या कर दी गई । इसका दुख आज तक हम लोगों को है। उन्हीं दिनों सुधा भारद्वाज, अनूप सिंह, विनायक सेन, जनकलाल ठाकुर और बहुत से और मित्र वहां मिले। सबसे आत्मीय परिचय हुआ परिवार की तरह।

सुधा मेरे साथ वकालत में भी मेरे ऑफिस में जूनियर रहीं। हमने कई मुकदमे साथ में किए। मेरे एक और जूनियर हे गालिब द्विवेदी बंटी ने एक दिलचस्प टिप्पणी की 'Óजैसे हम लोग आपकी डांट से डरते थे वैसे ही सुधा दीदी भी डरती थीं। बहुत सी फाइलों के बीच में काम करते करते थककर सोफे पर कुछ देर सो जाती थीं और कहती थीं देखना सर आएंगे तो डांट पड़ेगी कि यह काम नहीं किया। वह काम नहीं किया। वी लव यू सर हम सबका सौभाग्य है कि हमें आपका साथ एवं आपका सानिध्य प्राप्त हुआ है। बस्तर में टाटा और एस्सार स्टील के मामलों को लेकर हमने जनहित याचिका दायर की। बहुत से और मुकदमे हैं। जस्टिस राजेंद्र सच्चर और वकील कन्नाबिरन, राजेंद्र सायल, विनायक सेन और सुधा भारद्वाज के कारण मैं कई बार पीयूसीएल के कार्यक्रमों में गया हूं। मैं विनायक सेन का वकील रहा हूं। उन्हें नक्सलवादी कहा गया। बहुत मुश्किल से उनकी सुप्रीम कोर्ट में जमानत हुई। कुछ और वकील, पत्रकार, छात्र पिछले वर्ष आंध्रप्रदेश से तेलंगाना से छत्तीसगढ़ में गिरफ्तार किए गए। उनके मामले की भी मैंने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में पैरवी की है। जिसे नक्सलवादी साहित्य कहते हैं उसमें से बहुत सा तो सरकारी अधिनियम के तहत छपता है। उसे कोई जप्त नहीं कर सकता। मामलों में पुलिस उल्टा कहती रहती है। जनसुरक्षा विशेष अधिनियम में डॉक्टरों को, कलाकारों को, लेखकों को दर्जियों को पकड़ लिया जाता है। छत्तीसगढ़ में सरकार के प्रोत्साहन से तथाकथित सलवा जुडूम नाम का कांग्रेस प्रायोजित आंदोलन चला था। उसकी हम सब ने मुखालफत की थी। अदालत तक गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने उस सलवा जुडूम के पूरे सरंजाम को ध्वस्त कर दिया। नंदिनी सुंदर ने इस संबंध में महत्वपूर्ण काम किया है । मेधा पाटकर ने भी, अरुंधती राय ने, सुधा भारद्वाज ने, बहुत लोगों ने। ब्रह्मदेव शर्मा जी से कई मामलों में इसी तरह के मामलों में सक्रिय संबंध हम लोगों का रहा है। सुधा चाहती तो बहुत अच्छा जीवन व्यतीत कर सकती थी। चाहती तो बहुत से शहरी लोग जिस तरह आंदोलन करते हैं। शोहरत भी पाती दौलत भी पाती। और फिर भी गरीबों की नेता बनी रहती। लेकिन उन्होंने वैभव और शहरी ठाटबाट की जिंदगी को छोड़ दिया। उन्होंने गरीबी से अपनी जिंदगी जो तारीफ के काबिल है चलाई है। यहां से दिल्ली चली गईं अपने निजी कारणों से। कुछ पारिवारिक कारण भी थे। उन्होंने एक बच्ची को गोद लिया है। उसका जीवन संवार रही हैं। उसके पहले से बहुत बीमार चल रहा हूं। बहुत भावुक होकर मैंने फोन किया था। लिखा था। मेरी छोटी बहन की तरह काश छत्तीसगढ़ से नहीं जाती। सुधा भारद्वाज की तरह के उदाहरण हिंदुस्तान में उंगलियों पर गिने जाएंगे। इससे ज्यादा मैं क्या कहूं।

सुधा भारद्वाज की अर्णव गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी द्वारा या दूसरों के द्वारा यदि कोई चरित्र हत्या की कोशिश की जा रही है। तो कुछ बातें और बताऊंगा। कुछ अरसा पहले मैंने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस और कुछ जजों से सुधा को लेकर खुद बात की थी। उन्होंने भी बात की थी। वे चाहते थे कि सुधा छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में जज बनने के लिए अपनी स्वीकृति दे दें। सुधा ने विनम्रतापूर्वक इनकार किया। मैंने सुधा से पूछा भी था तो हंस कर टाल गई। उसने कहा आप जानते हैं यह काम मैं नहीं कर पाऊंगी। मुझे जो काम करना है। वह मैं ठीक से कर रही हूं। मैं भी जानता था। वह इस काम के लिए नहीं बनी है। फिर भी उनकी योग्यता और क्षमता को देखकर मैंने सिफारिश करने की कोशिश जरूर की थी।

सुधा एक आडंबररहित सीधा सादा जीवन जीती रही हैं। उनमें दुख और कष्ट को सहने की बहुत ताकत है। यूनियन में संगठन में मतभेद भी होते थे। बहुत से मामलों को सुलझाने में मैं खुद भी शरीक रहा हूं। बहुत अंतरंग बातें मुझे बहुत सी बहुत मित्रों के बारे में मालूम है। कुल मिलाकर सब एक परिधि के अंदर रहते थे। उसके बाहर नहीं जाते थे। जैसे बर्तन आपस में रसोई में टकरा जाते होंगे। लेकिन एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ते। ऐसे हमारे बहुत से साथियों के बारे में भ्रम फैलाया जा रहा है। वह खराब किस्म के घटिया लोग हैं। मैं तो कांग्रेस पार्टी का पदाधिकारी रहकर भी कांग्रेस की सत्ता के जमाने में नियोगी के कंधे से कंधा मिलाकर काम बात करता था। मुझे किसी का भय नहीं था। कांग्रेस पार्टी ने भी कभी मुझे काम करने से नहीं रोका। यह ईमानदार लोगों का एक संगठन है पारदर्शी लोगों का। जब से यह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बिकाऊ हो गया है, घटिया हो गया है, सड़ा हो गया है। तब से इस तरह की हरकतें वह कर रहा है।

मेरे एक और जूनियर रहे महेंद्र दुबे ने यह लाजावाब जानकारी दी है—मजदूर बस्ती में रहने वाली सुधा 1978 की आईआईटी कानपुर की टॉपर है...जन्म से अमेरिकन सिटीजन थी...और इंगलैंड में उनकी प्राइमरी एजुकेशन हुई है...इस बैक ग्राउंड का शख्स मजदूरों के साथ उनकी बस्ती में रहते बिना दूध की चाय और भात सब्जी पर गुजारा कर रहा है। सुधा की मां कृष्णा भारद्वाज जेएनयू में इकोनामिक्स डिपार्टमेंट की डीन हुआ करती थी, बेहतरीन क्लासिकल सिंगर थी और अमत्र्य सेन के समकालीन भी थी। आज भी सुधा की मां की याद में हर साल जेएनयू में कृष्णा मेमोरियल लेक्चर होता है जिसमें देश के नामचीन स्कालर शरीक होते हैं। आईआईटी से टॉपर होकर निकलने के बाद भी सुधा को कैरियर खींच न सका और अपने वामपंथी रुझान के कारण वो 80 के दशक में छत्तीसगढ़ के करिश्माई यूनियन लीडर शंकर गुहा नियोगी के संपर्क में आयीं और फिर उन्होंने छत्तीसगढ़ को अपना कार्यक्षेत्र ही बना लिया। पिछले 35 साल से अधिक समय से छत्तीसगढ़ में मजदूर, किसान और गरीबों की लड़ाई सड़क और कोर्ट में लड़ते लड़ते इन्होंने अपनी मां के पीएफ का पैसा तक उड़ा दिया। उनकी मां ने दिल्ली में एक मकान खरीद रखा था जो आजकल उनके नाम पर है मगर बस नाम पर ही है,मकान किराए पर चढ़ाया हुआ है जिसका किराया मजदूर यूनियन के खाते में जमा करने का फरमान उन्होंने किरायेदार को दिया हुआ है।