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प्रसंगवश : गांव, गरीब किसान पर भारी पड़ा तंत्र, मंत्र का पाखंड: यशवंत धोटे

Date : 08-Jul-18

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कल संपन्न हुए छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र में गांव, गरीब किसानों के समस्याओं पर तंत्र, मंत्र का पाखंड भारी पड़ गया। मीडिया की सुर्खियां बना तांत्रिक बनाम भाजपा कार्यकर्ता की खबरें ज्यादा छपी बनिस्बत गांव, गरीब, किसान के। इस कथित तांत्रिक ने विधानसभा को इसलिए बांध दिया है, कि अगली सरकार भाजपा की बने। इसके साथ ही विधानसभा का मानसून सत्र विपक्षी अविश्वास प्रस्ताव के ध्वस्त होने के साथ समाप्त हो गया। विधानसभा अनिश्चतकाल के लिए स्थगित हो गई। पांच दिवसीय इस सत्र में यदि अनूपूरक बजट के पास होने के महत्वपूर्ण घटनाक्रम को छोड़ दिया जाए तो सिवाय बातों के जमा खर्च के अलावा कुछ नही हुआ। पिछड़ते मानसून और पिछड़ती खेती को लेकर इस सत्र में किसी ने कुछ नही बोला। अलबत्ता सीडी, शराब, तंत्र-मंत्र, जादू-ूटोना, घेराव, प्रदर्शन, विधायक मारपीट कांड के मुद्दे चर्चा के केन्द्र में रहे। दरअसल मानसून काल का यह सत्र एक तरह से किसानों का होता हैं। प्रदेश में तो सूखा हंै ही सदन में सवालों का भी सूखा रहा। 90 विधायकों में एकाध किसी ने किसानों का मसला उठाया। किसान परेशान हैं। राज्य के 13 जिलों में सूखा है। बोनी नहीं हुई ,जहां हुई वहां वर्षा का इंतजार है। सेवा सहकारी समितियों में बीज निगम से दिए जाने वाले बीज नहीं पहुंच पाए। खाद का उचित भंडारण नहीं है। खेत, नदी, नाले, तालाब, पोखर सब सूखे हैं। फिर भी विधानसभा में खामोशी रही। विपक्ष खुद को किसानों की आवाज बताता है। यह सदन में कहीं नजर नहीं आया। सत्ता पक्ष भी खुद को किसानों का खैरख्वाह मानता है। लेकिन पक्ष विपक्ष की नूराकुश्ती में इस बार फिर किसान ठगा सा रह गया। सूबे के करीब 80 विधायक ग्रामीण क्षेत्र से आते हैं। वे खुद को किसान कहते हैं, लेकिन जब किसानों की आवाज उठाने की बारी आती है कोमा में चले जाते हैं। यह इस बात का परिचायक है कि विधायक जनता के प्रति  कितने गंभीर हैं ? सरकार भी मौजूदा कार्यकाल में विपक्ष की आवाज को लेकर कभी गंभीर नहीं रही। अब तक विपक्ष ने जितने भी मामले विधानसभा में उठाए नक्कारखाने की तूती साबित हुए। अलबत्ता सरकार किसानों से सीधा जुडऩे का दावा करती रही। गौरतलब है कि मानसून सत्र किसानों के मसले उठाने व राहत देने का एक तरह से संकल्प सत्र होता है। जिसे अविश्वास प्रस्ताव की बहस मे गुजार दिया गया। पूर्व के सत्रों में विधायक किसानों के मामले उठा कर काफी कुछ सरकार पर दबाव बनाने में सफल रहे हैं। किसानों को राहत भी मिलती रही। इस बार सिर्फ और सिर्फ राजनीति का खेल खेला गया। विपक्ष इसके माध्यम से जनता में अपना प्रभुतत्व स्थापित करने की कोशिश करता रहा । विपक्ष सदन में रह कर जितना जनता की आवाज बन सकता है, बाहर रह कर नहीं। विपक्ष का बार बार बहिर्गमन सत्ता पक्ष के लिए सुखद रहा । इस सत्र का अजूबा यह रहा कि गले में 10 किलो  की मालाए पहना तांत्रिक विधानसभा में कौतूहल का विषय बना रहा । चूंकि यह बीजेपी का कार्यकर्ता है लेकिन उसने दावा किया है कि उसने विधानसभा को बांध दिया और अगली सरकार बीजेपी की बनने जा रही है। यह वही सरकार है जिसने टोनही एक्ट पारित कराया है। जिसके तहत टोना-जादू, तंत्र-मंत्र की कोई भूमिका नहीं है। तांत्रिक विधानसभा परिसर में घूम-घूम कर भाजपा की चौथी पारी की जतन करते रहा। कमाल तो यह है कि वह तांत्रिक भाजपा का नेता है, जो राजनीति के साथ तंत्र-मंत्र करता है। भला इससे जनता को क्या लेना देना? तंत्र क्रिया व तांत्रिक से फारिग हुए ही थे कि विपक्षी दल कांग्रेस ने अपने तरकस से अविश्वास प्रस्ताव नामक ब्रह्मास्त्र छोडा़ जो निस्तेज रहा। विपक्ष घेरने में विफल रहा तो सत्ता पक्ष सवालों के जवाब के बजाय आंकड़ों का मायाजाल में विपक्ष को उलझाता रहा। कुल जमा यह है कि करोड़ों रुपए का पावस सत्र जनता के किसी काम का नहीं रहा। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पूर्णकालिक तीसरी विधानसभा का यह अंतिम सत्र सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के ध्वस्त होने के साथ समाप्त हो गया।