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दुनिया में बढ़ती भूख की चुनौती

Last Modified Aat : 07-Jul-18

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  • भूखमरी हमारे लिए एक सामाजिक कलंक है

प्रभुनाथ शुक्ल

घर के ठंडे चूल्हे पर खाली पतीली है, बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन सी नशीली है, मशहूर शायर अदम  गोंडवी की भूख से सराबोर यह शेर हमें सोचने पर मजबूर करता है। जबकि सपने बेंच कर सिंहासन हासिल करने वाली जमात सिर्फ भाषण बेंचती है। भारत और दुनिया भर में भूख आम समस्या बन गयी है। राजनीति गरीबी और भूखमरी मिटाने में सालों से लगी है, लेकिन भूखे लोगों की भूख नहीं मिट पायी। जरा सोचिए हम जिनकी मु_ी भर भूख नहीं मिटा पाते वह हमें सत्ता सौंपते हैं। हम उनकी भूख-प्यास और दूसरी सामाजिक समस्याएं मिटाने के बजाय उन्हीं को मिटाने पर तूले हैं। हमारे लोकतंत्र की कितनी अजीब बिडंबना है। दुनिया में एक तिहाई अनाज यानी 1.3 बिलियन टन खचरा बन जाता है। यह ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है। वैश्विक स्तर की बात करें तो भोजन न मिलने की वजह से 87 मिलियन लोग भूखें सो जाते हैं। जिसकी वजह से वैश्विक अर्थव्यस्था को 750 अरब डालर का नुकसान होता है। यह स्वीटजरलैंड की जीडीपी के बराबर है।

पूर्व क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने पिछले दिनों सोशलमीडिया यानी ट्वीटर पर एक वीडियो डाला जिसमें कैरेबियन देश हैती से जुड़ी तस्वीर थी। यहां के लोग आज भी मिट्टी की रोटियां निगलने को मजबूर हैं। जबकि पूरी दुनिया में भोजन की बर्बादी जारी है। निश्चित तौर पर यह मानवीयता को शर्मसार करने वाली स्थिति है। क्योंकि हमारे समाज की एक जमात भूखी और नंगी है जबकि हमारे कुत्ते वातानुकूलित बंगलों और कारों में आराम फरमा रहे हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक समाराहों में अधिक मात्रा में भोजन बर्बाद हो रहा है जबकि हमारे समाज का एक हिस्सा मिट्टी की रोटी निगलने को बेवस है। पंच सितारा होटलों में काफी मात्रा में अन्न की बर्बादी होती है। तीन साल पूर्व यानी 2015 में आयी एक रिपोर्ट पर गौर करें तो देश में 30 करोड़ से भी अधिक लोग बेहद गरीब हैं। दुनिया भर में भूखमरी की त्रासदी के शिकार लोगों की आबादी में एक चैथाई हिस्सा भारत का है। तकरीबन 20 करोड़ लोगों को जरुरत के मुताबित पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता। 40 फीसदी बच्चों का वनज निर्धारित मानकों से बेहद कम है। देश के स्कूलों में दोपहर भोजन योजना, खाद्य सुरक्षा गांरटी, अंत्योदन, बीपीएल और दूसरी योजनाओं के बाद यह स्थिति कम होने के बजाय बढ़ रही है। जिसकी वजह व्यवस्थागत खामियां और अन्न की बढ़ती बर्बादी है। इसके पीछे सामाजिक और आर्थिक असंतुल मूल है। दुनिया की यह कैसी विचित्र तस्वीर है, समझना मुश्किल है। एक ओर हम साम्राज्य विस्तार और आणविक युद्ध की तरफ बढ़ रहें हैं जबकि दूसरी तरफ हम विश्व की 28 फीसदी भू-भाग पर रहने वाली आबाद भूखी है। जिसकी मूल वजह राज सत्ता का खोखला समाजवाद है। यह सिर्फ हैती की नहीं प्रगतिशील मुल्कों की आम समस्या है। सरकारें और सत्ता सीमा विस्तार में लगी हैं। वैश्विक स्तर पर सामाजिक संतुलन बिगड़ रहा है। जातीय और कबिलाई संघर्षों की वजह से हालात बेहद बुरे हो चले हैं। पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था का केंद्र्रीय करण इस समस्या को और अधिक बढ़ा रहा है। जिसकी वजह से आर्थिक असंतुलन और भूखमरी की समस्या पैदा हो रही है।

हैती कैरेबिया का तीसरा सबसे बड़ा और गरीब देश है। इसे पहाड़ों का देश भी कहा जाता है। भूखमरी और गरीबी यहां की दीर्घकालिक समस्या है। इसे अनाथ बच्चों का भी देश कहा जाता है। यहां की 60 फीसदी आबादी साक्षर है। हैती की 80 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है। कभी इस पर अमेरिका का कब्जा था, लेकिन अब यह स्वतंत्र देश है। यहां 30 लाख लोगों के पास आज भी भोजन उपलब्ध नहीं है। संयुक्तराष्ट संघ की ग्लोबल हंगर रिपोर्ट के मुताबित दुनिया के 119 देशों में भारत स्थिति सेंचुरी यानी 100 वें नम्बर पर है। भारत में भूख और कुपोषण की वजह से हर साल पांच साल आयु वर्ग के 10 लाख बच्चों की मौत हो जाती है। सरकारें 70 सालों से देश से गरीबी मिटा रही हैं, लेकिन गरीब भले न मिट पायी हो, लेकिन गरीब जरुर मिट और समिट गए। शर्म की बात है कि भारत में तकरीबन सात लााख परिवार भीख मांग कर अपना जीवन यापन करते हैं। गांव में रहने वालों लोगों में 40 फीसदी की औसत आय 10 हजार रुपये मासिक से भी कम है। 51 फीसदी लोगों की आजीविका दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है। इस तरह के लोगों के पास कोई नियमित आय नहीं है। यह आधुनिक भारत की बेहद जमीनी और भयावह तस्वीर है।

भारत में पांच साल उम्र के 50 फीसदी बच्चों की मौत भूखमरी और कुपोषण से होती है। जबकि पांच करोड़ से अधिक लोग भूखों पेट सोने को मजबूर हैं। आस्टेलिया जितना गेंहू उत्पादन होता है, भारत में उससे अधिक यानीं 2 करोड़ 10 लाख टन बर्बाद किया जाता है। जरा सोचिए भविष्य में यह संकट और कितनी गहरी होगी। 2030 तक भारत की आबादी 145 करोड़ तक पहुंचने की संभावना जतायी गयी है। उस स्थिति में यह समस्या और अधिक बढ़ जाएगी। भारत में 21 मिलियन टन भोजन हर साल खराब होता है। यहां 250 करोड़ का भोजन हर रोज बर्बाद होता है। उत्पादित फल और सबिज्यों का 40 फीसदी हिस्सा यातायात के अभाव में मंडिय़ों तक नहीं पहुंच पाता, जिसकी वजह से वह खराब हो जाता है। मांगलिक और सांस्कृतिक समाराहों के अलावा दूसरे आयोजनों में हर साल 25 से 30 फीसदी भोजन बर्बाद हो जाता है। कानून के बाद भी इस पर कोई नियंत्रण नहीं लग पा रहा। देश में हर साल औसतन 25 करोड़ टन से अधिक अन्न उत्पादन होता है। जबकि साल भर में एक भारतीय 6 से 11 किलोंग्राम से अधिक भोजन निगलता है।