nav Pradesh logo

जीएसटी राज का एक साल, आखिरकार बदल ही गई परोक्ष कर व्यवस्था

Date : 06-Jul-18

News image
News image
<

उपेन्द्र प्रसाद

वस्तु सेवा कर (जीएसटी) का एक साल पूरा हो गया है और यह इसकी समीक्षा करने का सही वक्त है। यह भारत के इतिहास का सबसे व्यापक कर सुधार था और इसकी पूरी संभावना थी कि इसके कारण व्यापार और व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है और उसके कारण उपभोक्ताओं को भी परेशानी हो सकती है। नई कर व्यवस्था से महंगाई घटेगी या बढ़ेगी, इसे लेकर भी दो मत थे और इस पर भी विवाद था कि इसके राजनैतिक नतीजे क्या होंगे। चूंकि इसके कारण होने वाली शुरुआती परेशानियों से सरकार की लोकप्रियता ही घटती, इसलिए इसके राजनैतिक नतीजे का आकलन सत्तारूढ़ पार्टी की चुनावी हार-जीत से ही की जा सकती है।

जहां तक इसके राजनैतिक नतीजों की बात है, तो इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। सत्तारूढ़ पार्टी भारतीय जनता पार्टी इस बीच चुनाव जीती भी और कुछ जगह हारी भी, लेकिन उसकी हार जीत इसके कारण प्रभावित नहीं हुई। इस कर व्यवस्था के कारण गुजरात के व्यापारियों को भी भारी कष्ट हुआ था। चूंकि गुजरात उद्योग और व्यापार का देश में एक बहुत बड़ा केन्द्र है, इसलिए वहां इसके कारण भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान होने की संभावना थी। वहां की मुख्य विपक्षी कांग्रेस ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कहकर इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की, लेकिन गुजरात के शहरी क्षेत्रों में भाजपा को पिछले 2012 से भी बड़ी सफलता मिली। उसकी सीटें घटी, लेकिन वह गांवों में उसके खिलाफ असंतोष के कारण घटी, न कि जीएसटी के खिलाफ उपजे असंतोष के कारण।

जाहिर है, देश में कोई राजनैतिक तूफान लाने में जीएसटी विफल रहा। इसका कारण यह था कि एक अवधारणा के रूप में देश इसे स्वीकार कर चुका है। जो वर्ग इसके कारण प्रभावित हो रहा था, उसे भी पता था कि यह अंतत: भले के लिए ही है और इसके कारण कर प्रशासन में भ्रष्टाचार समाप्त होने या कम होने का लाभ उन्हें ही मिलेगा। इसलिए वे अपनी परेशानियों को बर्दाश्त करते रहे, हालांकि इस कर व्यवस्था के कारण उनको तत्काल फायदा भी मिल कर रहा था। दर्जनों करों को समाप्त कर एक कर के दायरे में उनको लाया गया था, जाहिर है, इससे अच्छी बात उनके लिए क्या हो सकती थी। माल की आवाजाही और भंडारण में उनको सहूलियतें हो रही थीं। कायदे से अनेक वस्तुओ की कीमतें घट जानी थी और घटी कीमतों का लाभ व्यापारियों को उपभोक्ताओं तक पहुंचाना था, लेकिन अनेक मामले में वे मुनाफा कमाते दिखाई पड़े।

उपभोक्ताओं के लिए जीएसटी एक कोई घटना ही नहीं साबित हुई। इसके कारण कीमतों पर कोई ऐसा प्रभाव नहीं पड़ा, जिससे उपभोक्ताओं को कोई सदमा पहुंचता हो। बाजार में कीमतों का बढऩा तो लगा ही रहता है और घटने की उम्मीद उपभोक्ता शायद ही करता है, इसलिए वे इस कर व्यवस्था को लेकर कोई बड़ा स्टेक होल्डर थे ही नहीं। हां, सरकार का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ था। इस व्यवस्था के तहत एक आशंका कम राजस्व की उगाही की थी, क्योंकि अनेक करों को समाप्त कर सरकार ने एक कर की व्यवस्था कर दी थी। यदि किसी वस्तु पर अनेक करों का कुल प्रभाव 36 प्रतिशत पड़ रहा था, तो हो सकता है कि इस व्यवस्था के तहत 18 फीसदी ही सरकार को मिले। इसलिए इस व्यवस्था का सही ढंग से पालन कराकर ही सरकार अपना राजस्व बढ़ा सकती थी। कुल मिलाकर राजस्व उगाही में कमी नहीं हुई और इसके कारण सरकार अनेक वस्तुओं पर लगने वाले कर को कम करने में सफल रही।

एक व्यवस्था को बदलकर दूसरी व्यवस्था को तैयार करना भारी कठिनाई का काम होता हो और जब वह देश भारत हो, जहां 1 अरब 30 करोड़ से भी ज्यादा की आबादी हो और जिसकी नौकरशाही अक्षमता, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के लिए जानी जाती हो, वहां तो इस बदलाव के कारण बाजार में भारी ''खून खराबेÓÓ की आशंका थी। परेशानियां हुईं। कुछ व्यापारियों को तो भारी परेशानियां हुई, क्योंकि हमारे देश में व्यापारियों का एक ऐसा वर्ग भी है, जो बिना कोई रिकॉर्ड रखे एक रजिस्टर की सहायता से अपना व्यापार चलाते हैं और नई व्यवस्था के तहत उनको डिजिटल होना पड़ा। जो आसानी से डिजिटल हो गए, उन्हें बहुत आसानी हुई और जो टेक्नालॉजी के अनुकूल अपने को नहीं कर पाए, वे कराहते हुए देखे गए।

सरकार के लिए भी इसे अमल में लाना आसान नहीं था, क्योकि इस नई व्यवस्था के कारण भारत जैसे देश में क्या क्या परेशानियां हो सकती है, इसका पूर्वानुमान भी सही ढग़ से नहीं लगाया जा सकता था। यही कारण है कि इस व्यवस्था को लागू करने के बाद एक साल के अंदर 376 बार इसमें बदलाव करने पड़े। यानी यदि इस व्यवस्था को सुचारू रूप से अमली जामा पहनाने में सरकार को 365 दिनों मे 376 बार या तो नियम मे बदलाव करने पड़े, या मामले को स्पष्ट करना पड़ा या सर्कुलर जारी करना पड़ा। जहां तक व्यापार पर पडऩे वाले इसके असर का सवाल है, तो पहली तिमाही में काफी खराब असर पड़ा। खासकर उपभोक्ता सेक्टर सबसे ज्यादा तबाह हुआ। वहां लेनदेन काफी कम हुए। उसका एक कारण यह नहीं व्यवस्था तो थी ही, दूसरा कारण पिछले वित्तीय साल के पहली तिमाही में एक जुलाइ्र्र के पहले उपभोक्ताओ ने रिकॉर्ड खरीद कर ली थी। व्यापारी भी नई व्यवस्था के आने के पहले पुरानी व्यवस्था के तहत ही अपने स्टॉक खाली करने के लिए तरह तरह की स्कीम ला रहे थे। पहले तिमाही में हुई रिकॉर्ड खरीददारी के बाद वित्तीय साल की दूसरी तिमाही, जो जीएसटी व्यवस्था की पहली तिमाही थी, में उपभोक्ता बाजार कमजोर रहा।

व्यापारियो को डिजिटल होने में परेशानी तो हो ही रही थी, उसके साथ ही जीएसटी नेटवर्क में भी काफी खामियां आ रही थीं। अभी जीएसटी नेटवर्क व्यापारियों के सिरदर्द का एक बड़ा कारण है। पहले उन्हे अनेक बार रिटन्र्स दाखिल करने पड़ते थे। धीरे धीरे सरकार ने वह संख्या कम की। उन्हे राहत मिली, लेकिन टैक्स जमा करने का उनका खर्च भी बढ़ता गया। पर समय बीतने के साथ उनकी यह समस्या भी कम होती जा रही है।