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कश्मीर: वही पुराना तरीका, इसे सिर्फ  भूगोल का हिस्सा समझना गलत है

Last Modified Aat : 05-Jul-18

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अनिल सिन्हा

मोदी सरकार के ताजा फैसले बताते हैं कि सरकार यह मान कर चल रही है कि कश्मीर की समस्या के हल का कोई रास्ता तुरंत खुलने वाला नहीं है।  इसका मतलब यही है कि समस्या से जुड़े पक्षों-हुर्रियत, राजनीतिक दल और पाकिस्तान- से कोई बातचीत नहीं होगी, कम से कम 2019 के लोक सभा चुनावों तक। यह भी तय है कि सत्ताधारी पार्टी इसे एक चुनावी मुद्दा बनाएगी।    

घाटी में आतंकवाद के ग्राफ से इसका अंदाजा मिलता है कि आतंकवाद में कमी बातचीत और लोकतंात्रिक तरीके से ही आती है। सख्ती पर लौटने का अर्थ है कि कश्मीर की समस्या हल करने की कोई रणनीति नई दिल्ली की सरकार बना नहीं पाई। अब तो यह कहना भी गलत नहीं होगा कि भाजपा ने  महबूबा मुफ्ती से जो गठबंधन किया था उसके पीछे भी बस फौरी कारण थे। वह  राज्यपाल शासन लगा कर कश्मीर में उलझे रहने से बचना चाहती थी। वह इसमें कामयाब भी रही क्योंकि महबूबा और उनकी पार्टी के बीच में रहने से भाजपा को आसानी हो गई। अनुभवी राज्यपाल एनएन वोहरा को वहां बनाए रखने के पीछे भी यही मकसद था। 

लेकिन भाजपा के कदम से कश्मीर में शांति बहाली को एक लंबे समय का नुकसान हो गया क्योंकि पीडीपी की विश्वसनीयता चली गई और भारत ने राज्य में एक और लोकतंात्रिक शक्ति की उपस्थिति खो दी।  

कश्मीर की समस्या हल करने में नई दिल्ली की नाकामयाबी नई नहीं है। इसके लिए कोई एक पार्टी जिम्मेदार नहीं है। इस मामले में पूरा राष्ट्र विफल है। अगर निष्पक्षता से देखें तो हम घूम-फिर कर वहीं खड़े हो जाते हैं जहंा  1953 में शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के समय थे। शेख की गिरफ्तारी के बाद से राज्य में नई दिल्ली वहां ऐसी सरकारें ही बिठाती रही है जो भ्रष्ट थीं और राज्य के लोगों का  भरोसा जीतने में अक्षम। नब्बे के दशक में कश्मीर उग्रवाद की गिरफ्त में आ गया और उसके बाद से सारा फोकस हिंसा को काबू करने पर है। लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि हिंसा लक्षण है, रोग नहीं। रोग है कश्मीरी अवाम में असंतोष और नई दिल्ली के न्याय में उसका भरोसा खत्म हो जाना असली बीमारी हैं।   सन् 1953 में जब शेख अब्दुल्ला को राज्य के प्रधानमंत्री के पद से हटाया गया था तो लगभग यही सवाल थे-राज्य की राजनीतिक स्थिति क्या हो और वह कितनी स्वायत्त हो। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल रहा है कि भारत भर में सांप्रदायिक सौहार्द का स्तर क्या है।  कश्मीरियों का मुख्यधारा में शामिल होना इसी पर निर्भर करता है।   

इन सवालों को सामने रख कर अगर हालात का जायजा लिया जाए तो एक निराशाजनक तस्वीर ही उभरती है। असल में, कश्मीर पर आज जो बहस हो रही है वह  गलत ऐतिहासिक तथ्यों आधारित है।  कश्मीर की कहानी में जिन्हें खलनायक बताया जा रहा है वे असल में नायक थे जिन्होंने मजहब के आधार पर हुए बंटवारे के समय एक मुस्लिम बहुल और देश की मुख्यधारा से अलग रहे प्रदेश को भारत का हिस्सा बनाने का अजूबा कर दिखाया।  

शेख अब्दुल्ला की राजनीति के चरित्र का अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि एक अगस्त, 1947 को जब महात्मा गांधी कश्मीर गए तो उन्होंने कहा कि कश्मीर पूरे देश को रोशनी दे सकता है। देश का कोई हिस्सा नहीं था जो दंगे और संाप्रदायिक तनाव में नहीं फंसा था।  लेकिन कश्मीर की घाटी में उस समय पूरे सौहाद्र्र का माहौल था। यह कश्मीर राज्य हिंदू सभा और मुस्लिम कांफ्रेंस जैसे सांप्रदायिक संगठनों के सक्रिय होने के बावजू था। घाटी शेख अब्दुल्ला के नेशनल कांफ्रेंस के असर में थी और किसी भी तरह के सांप्रदायिक तनाव से मुक्त थी।  

यहीं पर यह याद दिलाना जरूरी होगा कि सन् 1930 में जब हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग आजादी के आंदोलन से दूर भाग रहे थे और अंग्रेजों से अपने रिश्ते जोड़ रहे थे, शेख अब्दुल्ला कश्मीर में 1932 में बने मुस्लिम कांफ्रेंस को सेकुलर और प्रगतिशील राजनीति की ओर ले जाने में लगे थे। उन्होंने मुस्लिम कांफ्रेंस का नाम 1938 में नेशनल कांफ्रेस कर दिया और इसमें गैर-मुसलमानों को पद सौंपे। वह मोहम्मद अली जिन्ना के कट्टर विरोधी थे और उन्होंने लीग को घाटी में कभी उभरने नहीं दिया। इसका कारण यही था कि नेशनल कांफ्रेंस पर जवाहर लाल नेहरू तथा गांधी जी का काफी असर था। 

उसके उलट, आरएसएस और हिदू महासभा से जुड़ी कश्मीर राज्य हिंदू सभा महाराजा हरि सिंह के इशारों पर काम करती थी। संगठन ने मई 1947 में प्रस्ताव पारित कर जम्मू तथा कश्मीर को स्वतंत्र रखने के महाराजा के फैसले का समर्थन किया। बाद में, हिंदू सभा ने बदलते हालात को देख कर भारत में विलय का प्रस्ताव किया, लेकिन सापं्रदायिक माहौल को बिगाडऩे में लग गई। भारत से विलय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी वकालत में शेख अब्दुल्ला ने जबर्दस्त भूमिका निभाई। 

शेख की गिरफ्तारी नेहरू के समय की राजनीति और नौकरशाही की विफलता का नमूना है। भारतीय जनसंघ नेे राष्ट्रीय स्तर और उसकी सहयोगी पार्टी प्रजा परिषद ने राज्य में नेशनल कांफ्रेंस के खिलाफ अभियान चला रखा था। यह एक ओर कश्मीर की जनता में भारत में उभर रहे हिंदू राष्ट्रवाद को लेकर आशंकाएं पैदा कर रहा था और दूसरी ओर  नेहरू सरकार पर स्वायत्तता के वायदे से हटने के लिए दबाव बना रहा था। भूमि सुधार के  फैसलों से महाराजा और हिंदू जमींदार शेख के बुरी तरह खिलाफ थे। नेहरू जी दबाव में आ गए और कश्मीर को किए वायदे निभाने के बदले नौकरशाही के कहने पर चले और उन्होंने शेख को ही गिरफ्तार करने का आदेश दे डाला। 

कश्मीर ने पाकिस्तान के बदले भारत को इसलिए चुना था कि यह एक सेकुलर राष्ट्र था और उसे भरोसा था कि ं कश्मीरी अस्मिता की रक्षा इस प्रगतिशील राष्ट्र का हिस्सा बनने से ही हो सकती है। नई दिल्ली ने उन्हें फेल कर दिया। वह कश्मीर को सिर्फ भारत तथा पाकिस्तान के बीच का भूभाग मान कर चली। उसे समझना चाहिए कि कश्मीर सिर्फ भूगोल नहीं है, यह हजारों साल की संस्कृति है।