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घटते विदेशी मुद्रा भंडार से भारत के लिए मुश्किलें बढ़ीं

Last Modified Aat : 04-Jul-18

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जयंतीलाल भंडारी

बीते 30 जून को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 410 अरब डॉलर से भी कम रह गया। महीना भर पहले यह 425 अरब डॉलर के स्तर पर था। विदेशी मुद्रा कोष के तेजी से घटने के कुछ कारण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमत और विभिन्न वस्तुओं के तेजी से बढ़ते आयात के कारण देश में डॉलर की मांग बढ़ गई है। निर्यात की धीमी बढ़ोतरी और विदेशी निवेशकों द्वारा नए निवेश की कमी के कारण भी डॉलर की आवक कम हो गई है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध की शुरुआत से चीनी मुद्रा युआन सहित दुनिया के सभी उभरते देशों की मुद्राओं की कीमत डॉलर के मुकाबले घट गई है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमत विदेशी मुद्रा कोष में गिरावट का प्रमुख कारण है। पिछले एक सप्ताह में ही कच्चा तेल 72 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 77 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। यही वह प्रमुख कारण है, जिससे 28 जून को रुपए की कीमत अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई और एक डॉलर 69 रुपए का हो गया।

हाल में अमेरिका ने भारत, चीन सहित सभी देशों को ईरान से कच्चे तेल का आयात 4 नवंबर तक बंद करने को कहा है और इस तिथि के बाद वहां से तेल मंगानेवाले देशों के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है। भारत में इराक और सऊदी अरब के बाद सबसे ज्यादा कच्चा तेल ईरान से मंगाया जाता है। ईरान भारत द्वारा यूरोपीय बैंकों के माध्यम से यूरो में भुगतान स्वीकार करता है। डॉलर की तुलना में यूरो में भुगतान भारत के लिए अच्छा है। ईरान से होनेवाला कच्चे तेल का आयात सस्ती ढुलाई के कारण भी भारत के लिए फायदेमंद है। स्पष्ट है कि ईरान से कच्चे तेल का आयात बंद होने पर नई चिंताएं सामने होंगी। हालांकि 22 जून को ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में आयोजित 13 तेल उत्पादक देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) की अहम बैठक में कच्चे तेल के उत्पादन में आगामी जुलाई 2018 से लगभग 10 लाख बैरल प्रतिदिन (बीपीडी) तक, यूं कहें कि वैश्विक आपूर्ति में एक प्रतिशत इजाफा करने का निर्णय लिया है। लेकिन इस बढ़ोतरी से तेल की कीमतों में मामूली कमी ही आएगी।

ट्रेड वॉर से चिंतित विदेशी निवेशक इन दिनों भारतीय बाजार में निवेश करके जोखिम नहीं लेना चाहते और वे अधिक सुरक्षित अमेरिकी डॉलर और बॉण्ड में अपना निवेश कर रहे हैं। डॉलर में लगातार आ रही मजबूती और अमेरिका में 10 साल के सरकारी बॉण्ड पर प्राप्ति 3 प्रतिशत की ऊंचाई पर पहुंच गई है। ऐसे में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भारत सहित सारे उभरते बाजारों में अपना नया निवेश नहीं लगा रहे हैं और मौजूदा निवेश को तेजी से निकालते दिखा रहे हैं। इस वर्ष जनवरी से अब तक विदेशी निवेशकों ने भारत से करीब सात अरब डॉलर की नेट निकासी की है। 25 जून को प्रकाशित एमएससीआई सूचकांक के अनुसार, भारत के प्रति वैश्विक फंडों का आकर्षण वर्ष 2013 के बाद सबसे निचले स्तर पर है। 2015 तक भारत विदेशी निवेशकों की आंख का तारा था, जब उभरते बाजारों में होनेवाले हर 100 डॉलर निवेश में से 16 डॉलर भारत को मिले। लेकिन अभी यह निवेश गिरकर 9.5 डॉलर रह गया है। ऐसे में भारतीय बाजार से विदेशी पूंजी की निकासी रुकने की उम्मीद कम ही है।

देश में डॉलर की जरूरत बढ़ते विदेश व्यापार घाटे के कारण भी बढ़ी है। पिछले वित्त वर्ष 2017-18 में देश ने निर्यात के 300 अरब डॉलर के लक्ष्य को छू लिया, लेकिन निर्यात की तुलना में आयात डेढ़ गुना बढ़ा। नतीजा यह कि 2017-18 के लिए व्यापार घाटा 2016-17 के 108.50 अरब डॉलर से बढ़कर 156.83 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले चार साल में सबसे ज्यादा है। देश-दुनिया के आर्थिक और वित्तीय संगठनों की रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि रुपए के मूल्य में लगातार गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का कारण बन गई है। पिछले चार वर्षों से भारत के लिए वैश्विक हालात के सकारात्मक रहने से रुपया मजबूत रहा है। कम ब्याज दरोंवाले दौर में इस तरफ विदेशी फंड का प्रवाह बढऩे से देश के चालू खाते के घाटा पाटने में मदद मिली और कच्चे तेल की कम कीमतें भी इसको काबू करने में मददगार बनीं। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल रहे ये पहलू अभी कमजोर पड़े हैं। ऐसे में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को भारत की ओर लुभाने और डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत संभालने के लिए जरूरी है कि सरकार आयात नियंत्रित करने और निर्यात बढ़ाने पर जोर दे। हाल में भारतीय निर्यातक संगठनों के महासंघ (एफआईईओ) ने कहा है कि सरकार द्वारा निर्यातकों को दी जा रही रियायतें निर्यात की बढ़ती चुनौतियों का सामना करने के लिहाज से कम हैं। भारत को चीन के साथ-साथ दक्षिण कोरिया और जापान का गठजोड़ बनाने की डगर पर आगे बढऩा होगा। ऐसा गठजोड़ तेल उत्पादक देशों से मोलभाव करके तेल की कीमतें भी कुछ कम करा सकता है। रुपए की कीमत में किसी और बड़ी गिरावट से बचने के लिए हाल ही में प्रकाशित बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच की रिपोर्ट पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक को प्रवासी भारतीय बॉण्ड जारी करके 30 से 35 अरब डॉलर जुटाने चाहिए। ऐसे प्रभावी कदमों से डॉलर के मुकाबले रुपए की घटती हुई कीमत पर निश्चित रूप से कुछ रोक लगाई जा सकेगी और विदेशी मुद्रा भंडार का उपयुक्त स्तर भी बनाए रखा जा सकेगा।