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संपादकीय :  नैतिक पतन की पराकाष्ठा पार

Date : 03-Jul-18

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जिस देश में नारी को शक्ति के रूप में पूजने की परंपरा रही हो वहां महिलाओं पर लगातार हो रहे अत्याचार को देखकर यही कहा जा सकता है कि नैतिक पतन की पराकाष्ठा पार हो गई है। आज की पीढ़ी में संस्कारों का अभाव है और वे पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण करके खुद को माडर्न सिद्ध करना चाहते है। देश में लगातार बढ़ती रेप की घटनाओं से यह बात साफ हो गई है कि समाज तेजी से पतन की ओर अग्रसर होने लगा है। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान के साथ ही यह भी जरूरी है कि इस दिशा में समाज जागरूक बने। सुधार की शुरूआत हर घर से हो। बच्चों को अच्छे संस्कार दिए जाए और नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाए ताकि वे संस्कारवान बन सके। पाश्चात्य संस्कृति के दुष्परिणाम सर्वविदित है। इसमें फिल्मों का भी बड़ा योगदान है। फिल्म निर्माता अपनी तिजोरी भरने के लिए फुहड़ और अश्लील फिल्में दर्शकों को परोसते है। सामाजिक मूल्यों को तहस-नहस करने वाले टीवी धारावाहिकों की भी भरमार हो गई है। यही नहीं बल्कि पोर्न साइट भी सर्वसुलभ है। हिंसा और अश्लीलता फैलाकर जो लोग मोटी कमाई कर रहे है वे समाज के नैतिक पतन के सबसे बड़े गुनहगार है। अब समय आ गया है कि ऐसे लोगों पर भी सरकार का डंडा चले तभी समाज को पतन में जाने से रोका जा सकेगा और महिलाओं पर हो रहे अत्याचार की घटनाओं में कमी आने की उम्मीद बंधेगी।