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डण्डे से भेंड़ हाँकिए, लोकतंत्र को नही, लेखक : अनिल द्विवेदी

Date : 02-Jul-18

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संदर्भ : पुलिस द्वारा विधायक की पिटाई मामला

अनिल द्विवेदी

देश में राजनीति की सबसे बडी नर्सरी कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश में राजगददी का हस्तांतरण हुए जुम्मा—जुम्मा कुछ ही दिन हुए थे. अखिलेश यादव जब यूपी के मुख्यमंत्री बने तो मेरठ में भाजपा विधायक के साथ एक आइपीएस ने दुव्र्यवहार कर दिया। हालांकि शिकायतें और भी थी परंतु ताजा घटना को आधार बनाते हुए सूबे के मुखिया ने आदेश जारी किया कि विधायक जहां भी होंगे, अफसर उन्हें खड़े होकर सम्मान देंगे और दूसरा, किसी भी सरकारी कार्यक्रम में प्रोटोकॉल के मामले में एमएलए, आइएएस-आइपीएस से सर्वोपरि होगा।

राजनीति की नर्सरी में से एक है बिहार। वहां जब लालू यादव मुख्यमंत्री थे तब अपने निवास पर आने वाले अफसरों के लिए कुर्सियां यदा-कदा ही रखवाते थे अन्यथा उनकी नजरों में विधायक ही इस इज्जत का हकदार होता था। एक नजर में हम इसे भर्राशाही मान सकते हैं पर याद रखिए, ये नौकरशाह हैं और विधायक जनता का प्रतिनिधि। अपने अजीत जोगी साहब जब मुख्यमंत्री थे तो एक दिन अपने बंगले में अफसरों की बैठक कर रहे थे। अचानक बिलासपुर का एक कट्टर समर्थक-विधायक उनके पास पहुंचा तो जोगीजी ने बाजू वाली सीट पर बैठने का इशारा कर दिया। सीट पर एक वरिष्ठ आइएएस विराजमान थे। परिस्थति को भांपते हुए उन्होंने तुरंत उस नेता के लिए सीट खाली कर दी।

एक कवि ने कभी लिखा था : भाषा में भदेष हूँ, कायर इतना कि उत्तर प्रदेश हूँ। राजनीतिक कीमियापन का गवाह बनी एक तस्वीर आज भी इंटरनेट पर मौजूद है। यह दर्शाती है कि किस तरह एक आईपीएस, जमीन पर बैठकर मुख्यमंत्री को जूते पहना रहा है! बिहार के एक युवा राजनेता ने दबंगई दिखाते हुए आइपीएस की पत्नी को घर पर कैद कर महीनों बलात्कार किया था। ऐसे कई किस्सागो सुनने-देखने को मिलते हैं। अभी कर्नाटक में ममता दीदी ने किस तरह पुलिस महानिदेशक को सबके सामने फटकारा था, पूरे देश ने देखा था।

मैं स्वयं इन विचारों को अपना ऐलान नही समझता। ना ही किसी को नीचा या ऊँचा बताना चाहता। छत्तीसगढ़ राज्य नया-नया बना और अफसरों का बंटवारा हुआ तो एक पूर्व मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ के मंत्री से कटाक्ष करते हुए कहा था कि चाँदी की खेप मुबारक हो! इशारा स्पष्ट था कि हमने सोने सी कीमत वाले अफसर रखे हैं, कचरा आपको भेज दिया। हालांकि वे गलत थे। अठारह साल के छत्तीसगढ़ ने तरक्की की जो छलाँगें लगाई हैं, उन्हें देखकर उस नेता को अपनी सोच और फैसले पर पछतावा हो रहा होगा।

मैं फिर से लिख रहा हूँ कि छत्तीसगढ़ अराजकता के मामले में यदि बिहार या यूपी नही बन सका तो सिर्फ इसलिए क्योंकि दूरदर्शी और मेहनती अफसरों ने अपनी सीमाएं नहीं लाँघी। सिर्फ परिणाम पर ध्यान दिया। मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह या उदार मंत्रियों ने भी उनके सम्मान या अधिकार में कोई कमी नही होने दी। सभी अनावश्यक हस्तक्षेप से बचते आए हैं। जबकि प्रशासन को मजबूत करने के लिए राज्य सरकार ने कई फैसले एैसे भी किए जिसके चलते जनप्रतिनिधियों के अधिकार कम करके अफसरों को मजबूत कर दिया गया। फिर भी सभी ने उदारमना से स्वीकार किया।

यह विश्वास भी निभ्रांत नहीं है कि भोले-भाले, सीधे-सरल छत्तीसगढिय़ा ने भी कभी अपनी मर्यादा नही लाँघी, फिर चाहे उसकी पीठ पर पुलिस के बेंत पड़े हों या किसी आइएएस ने गेटआउट' कह दिया हो? इतनी विनम्रता या सहनशीलता किसी और राज्य के नागरिक रखते होंगे क्या? यदि नही तो सिंघमों को छत्तीसगढ़ की इस तासीर का सम्मान करना चाहिए। आइएएस सुनील कुमार, पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढाँड, आइएएस सोनमणि बोरा या रायपुर के वर्तमान कलेक्टर ओ.पी. चौधरी जैसे अफसर भी नौकरशाही के खुशनुमां चेहरे हैं।

ये इतने सम्मानीय और हरदिल अजीज रहे या हैं कि जब इनके स्थानांतरण होते तो उसे रूकवाने जनता और विधायक सडक़ों पर आ जाते थे। आइपीएसों में कल्लूरी साहब, आईजी दीपांशु काबरा, आईजी जी.बी. सिंग, राजीव श्रीवास्तव जी, संजय राणा, मयंक श्रीवास्तव, संजीव शुक्ला, लाल उम्मेद सिंह जैसे अफसरों में भी डण्डे का रूतबा कभी नजर नही आया। आज भी सैकड़ों दिलों पर राज़ कर रहे हैं।

विश्वरंजन साहब पुलिस महानिदेशक थे। उनका विदाई समारोह हुआ तो मुझ जैसे कइयों की आंखें भर आई थीं। पुलिस महानिदेशक ए.एन. उपाध्याय साहब ने सबसे ज्यादा समय तक डीजीपी रहने का रिकॉर्ड बनाया है। प्रशासनिक मजबूरियों को छोड़ दें तो उनकी कार्यशैली, फैसले या व्यवहार को लेकर किसी को कोई गिला-शिकवा या शक-शुबहा नही है। तो जिन्हें सिंघम बनने का शौक है, उन्हें भूलना नही चाहिए कि सालों पहले बस्तर में जो प्रशासनिक अराजकता थी, उसी का नतीजा है नक्सलवाद। आपने डण्डा चलाया, उन्होंने बंदूक उठा ली। अब लड़ते रहिए उनसे। नुकसान तो लोकतंत्र का हो रहा है। लम्हों ने खता की थी-सदियों ने सजा पाई, इसलिए सीमाओं का अतिरेक ना करिए। जवाबदेही के मामले में विधायक अफसर से ज्यादा गंभीर और डरा हुआ होता है क्योंकि जनता हर पांच साल में उसका हिसाब करती है। महासमुंद की तरह ही अन्य जिलों में भी विवाद हुए हैं पर पब्लिक कभी इतना उग्र नही हुई, क्योंकि कहीं ना कहीं ये सब राजनीति से प्रेरित लगे रहे।

महासमुंद के ताजा विवाद के पूर्व भी विधायक डॉ. विमल चोपडा के खिलाफ दो दर्जन से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं लेकिन जनता ने तटस्थ भाव अपनाए रखा। पर इस बार बात बेटियों की सुरक्षा से जुड़ी थी। आंदोलन, धरना, भूख हड़ताल, यह तो नागरिकों का अधिकार है। महासमुंद की जनता इसी का प्रयोग कर रही थी। अगर कोई और कारण था या है तो पुलिस कप्तान साहब को खुलासा करना चाहिए ताकि हम तराजू के पलड़ों पर तौल सकें कि कौन ज्यादा ईमानदार है? अन्यथा इस बात पर मुहर लग चुकी है कि प्रधानमंत्री जी का बेटी बचाओ' के नारे को खोखला करने में पुलिस ही दीमक बन रही है। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )