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भ्रष्टाचार पर घमंड-1

Date : 12-Sep-18

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गिरीश पंकज

 ( कल का शेष )
 मैंने मुसकराते हुए कहा, अगर भ्रष्टाचार करने के लिए कोई पद्मश्री होती तो वह सबसे पहले आपको मिल जाती!
 मेरी इस बात पर वह भी मुस्करा कर बोले,  अरे यह आपको कैसे पता चला कि मैं इन दिनों पद्मश्री के लिए जुगाड़ जमा रहा हूं?
 मैंने चौंकते हुए कहा, आपको किस काम के लिए पद्मश्री मिलेगी ?
वह बोले, मैं भले ही सरकारी नौकरी में हूं लेकिन समाज सेवा का काम भी करता रहता हूं । मैं कविताएं करता हूं । मेरी एक हजार कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं। हालांकि अंदर की बात यह है कि उसमें मेरी कविताएं कम हैं। मेरे अधीनस्थ बाबू की लिखी कविताएं अधिक है । उसको मैंने पटा कर रखा है कि तुम मेरे लिए कविताएं लिखो, मैं तुमको बड़ा बाबू बनवा दूँगा। कविराओं के एवज में कुछ पैसे भी देता हूँ। इस लालच में बाबू अच्छी-अच्छी कविताएं लिखकर मुझको देता रहता है।और उसे  मैं अपने नाम से  प्रकाशित करवाता हूं । उसी कविताओं के बल पर मेरा काफी नाम हो गया है । अब इसका फायदा उठाना चाहता हूं ।जुगाड़ में हूं कि एक हजार कविताओं के लिखने के कारण मुझे पद्मश्री मिल जाए। और जिस तरह से जुगाड़ के कारण अनेक लोग पद्मश्री झटक लेते हैं, मुझे भी बड़ी उम्मीद है कि पद्मश्री मिल ही जाएगी।
मैंने उन्हें बधाई दी और कहा कि आप ऐसे दुर्लभ व्यक्ति हैं जो अपने गलत कामों को भी गर्व से बताते हैं ।
वह बोले, जब प्यार किया तो डरना क्या। करते हैं तो करते हैं । कौन नहीं करता? ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार की नदी बह रही है ।हर कोई उस में डुबकी लगा रहा है, तो हम कहे खाली पीली ईमानदारी का राग अलापते रहे? तो हम भी डुबकी लगा रहे हैं और मालामाल हो रहे हैं ।आप सरकारी नौकरी में नहीं है इसलिए आपको पता नहीं कि सरकारी व्यक्ति जो होता है अगर वह ठान ले तो रेत से भी तेल निकाल सकता है। कुछ लोग ऐसा करने से डरते हैं। लेकिन हम बड़े हिम्मती हैं इसलिए हिम्मत के साथ गड़बड़- घोटाले करते रहते हैं।  और इस बात का मुझे घमंड है कि अब तक शान जी रहे हैं । और एक दिन शान से रिटायर होंगे और शान के साथ इस दुनिया से चले जाएंगे ।
लेकिन आपके भ्रष्टाचार के कारण आपके बच्चे भी बिगड़ सकते हैं । कम -से -कम उनके सामने तो आप गर्व से न कहें कि मैं भ्रष्टाचार करता हूं।
 मेरी बात सुनकर छदामीराम कुछ सेकंड के लिए मौन हुए, फिर सोचते हुए बोले,  आपने अच्छी बात कही लेकिन वो क्या है कि भ्रष्टाचार अब हमारा डीएनए बन गया है। मेरे पिताजी भ्रष्टाचार करते थे । मेरे दादा जी भी।  वह अखंड भ्रष्टाचारी थे। आजादी की लड़ाई के दौरान जब स्वतंत्रता सेनानी देश के लिए लड़ रहे थे तब वह राशन की कालाबाजारी कर रहे थे। उसी के कारण पकड़ में आ गए और जेल हो गई । लेकिन जब छूटे तो  स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र हासिल कर लिया। उसका लाभ हम लोगों को मिल रहा है। तो उनकी भ्रष्टाचार की परंपरा अब तक चली आ रही है । पिताजी ने भी  रिश्वत देकर नौकरी हथिया ली। अफसर बन गए। खूब कमाई की। फिर मुझे भी नौकरी दिलवा दी।  अब हम कमाई कर रहे हैं । हमारे दो बच्चे हैं । इनको भी मैं लाइन से लगा दूंगा। फिर वे भी अपने बच्चे को लाइन से लगा देंगे। एक जो अच्छी परंपरा चल पड़ी है उसे बाधित करना ठीक नहीं है। और वैसे भी भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार बन चुका है। इसलिए इस पर शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है।  आप गर्व से कह सकते हैं कि हम भ्रष्टाचारी हैं। बलात्कारी तो नहीं हैं। भ्रष्टाचारी ही तो हैं। नोट पानी कमा रहे हैं।  ऐशोआराम से रह रहे हैं,  और क्या चाहिए।  ईमानदारी की चादर ओढ़ कर जीने से क्या मतलब ? इतिहास में हम अमर हो नहीं जाएंगे। कोई याद तो करेगा नहीं कि फलानेजी बहुत बड़े ईमानदार थे कितने ईमानदारों को यह देश याद रखता है इसलिए हमारा यह फंडा है कि जब तक जियो सुख से जियो और रिश्वतखोरी करके घी पीयो। मैंने भ्रष्टाचार पर घमंड करने वाले इस महामानव को नमन किया। सबको अपनी-अपनी खासियतों पर घमंड होता ही है।  छदमीराम को भी है।  और क्या कर सकते थे हम!! (समाप्त)