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देश पर आज भी अंग्रेजियत हावी है

Date : 12-Sep-18

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  • अंग्रेजी के दो-चार शब्द बोल देना बुद्धिमत्ता की पहचान बन गई है
भरत मिश्र प्राची
 जहां गुड मार्निंग से सूर्योदय होता हो, गुड इवनिंग से सूर्यास्त, निशा की गोद में सोया-सोयो इंसान बुदबुदाता हो गुड नाईट-गुड नाईट। किसी के पैर पर पैर पड़ जाये तो सॉरी,  गुस्सा आने पर नॉनसेंस, गेट आऊट, इडियट आदि-आदि की ध्वनि  मुख से बार - बार निकलती हो । कैसे कोई कह सकता है, यह वही  देश हैं जिस देश की 90 प्रतिशत जनता हिन्दी जानती समझती एवं बोलती है। जिस देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। कितना अच्छा लगता है जब कोई अपनी भाषा में बात करता है। देश हो विदेश अपनी भाषा अपने लोगों को अपनी ओर खींच ही लेती है। भाषा में अपने होने की पहचान छिपी होती है। हर राष्ट्र की अपनी एक भाषा होती है, जो राष्ट्रभाषा कहलाती है, जिसमें उसका गौरव ,उसकी अस्मिता सबकुछ समाई होती है। राष्ट्रभाषा से ही राष्ट्र की पहचान होती है। जिसमें सम्पूर्ण राष्ट्र बात करता है। जिसमें पूरे देश का स्वाभिमान झलकता है। पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोये जाने की असीम शक्ति राष्ट्रभाषा में ही छिपी रहती है। इसके बिना राष्ट्र गूंगा, बहरा सा लगने लगता है जहां कोई भी अपनी हुकुमत आसानी से कायम कर सकता है। जिस राष्ट्र की राष्ट्रभाषा नहीं उसकी राष्ट्रीय पहचान कभी भी नहीं बन पाती ।   
स्वतंत्रता उपरान्त देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी संवैधानिक रुप से बन तो गई परन्तु 70 वर्ष बाद भी वह इस देश की राजभाषा के  सिवाय सही मायने में राष्ट्रभाषा आज तक नहीं बन पाई। आज भी यहां इस भाषा पर सात समुंदर पार की भाषा अंग्रेजी पूर्णरूपेण हावी है। संसद, विधान सभा, शिक्षा एवं सरकारी, निजी कार्यालयों में इसके जारी प्रभाव को आसानी से देखा जा सकता है। आम प्रयोग एवं बोलचाल में आज भी अंग्रेजी के प्रभाव को देखा जा सकता है। यह प्रभाव हमारी जनभाषाओं पर भी पड़ा है। जनभाषा जो माता की गोद से मिली है, जिसमें जन्मभूमि की पहचान समाई है, वह भी आज बनावटीपन, दिखावा के परिेवेश में उलझकर अपने अस्तीव को दिन प्रति दिन खोती जा रही है। स्वाधीन भारत में अंग्रेजियत प्रभाव एवं स्वार्थपूर्ण राजनीति के कारण न तो हिन्दी राष्ट्रभाषा बन सकी न जनभाषा भावी पीढ़ी की धरोहर बन सकी। 
अंग्रेजी स्कूलों का बढ़ता दायरा एवं दिखावे के परिवेश से जुड़ी अंग्रेजी मानसिकता आज तक स्वाधीन भारत के स्वरुप को उजागर नहीं कर पाई। आज भी स्वतंत्र भारत का एक हिन्दी अधिकारी अपने आप को हिन्दी ऑफिसर कहलाना ज्यादा बेहतर मानता ही नहीं, बच्चों को अंग्रजी स्कूल में पढ़ता है, उसे पूर्णरूपेण अंग्रेजीयत संस्कृृति में डालने का भरपूर प्रयास करता है। देश का जनप्रतिनिधि संसद एवं विधान सभा में हिन्दी के वजाय अंग्रेजी झाड़ता है,  इस तरह की मानसिकता वाले हिन्दी अधिकारी से जो हिन्दी की रोटी खाकर अंग्रेजी का गुणगान करता है, ऐसे जनप्रतिनिधि से जो देश की संप्रभुता एवं अस्तीत्व की रक्षा का संकल्प लेकर निज भाषा को तज पराई भाषा का आदर करते है, राष्ट्रभाषा का विकास कैसे संभव हो सकेगा विचार किया जा सकता है।
प्रतिवर्ष जैसे-जैसे हिन्दी दिवस की तिथि नजदीक आती है, हिन्दी के प्रति चारों तरफ उमड़ता प्यार दिखाई देने लगता है। जगह-जगह हिन्दी को अपनाने के लिये रंग-बिरंगे संदेशात्मक पैमाने नजर आने लगते हैं। प्रतियोगिताओं का दौर चल पड़ता है। भाषण-गोष्ठियां, कवि सम्मेलन आदि-आदि अनेक गतिविधियां इस दौरान सक्रिय हो उठती है। पुरस्कारों की लड़ी लग जाती है। कहीं सप्ताह तो कहीं पखवाड़ा! पूरा देश हिन्दीमय लगने लगता है। पर जैसे ही हिन्दी दिवस की विदाई होती है, हिन्दी की आगामी हिन्दी दिवस तक के लिये विदाई हो जाती है। सबकुछ पूर्वत: यथावत् स्थिति में सामान्य गति से संचालित होने लगता है। जबकि आज हम विश्व में हिन्दी की बात करते नजर आ रहे हैं। इस कड़ी में द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन के तत्काल आयोजित दौर को देखा जा सकता है। देश से अनेक लोग इस सम्मेलन के आधार पर हिन्दी के नाम विश्व यात्रा लाभ भी करके स्वदेश लौट आये हैं। पर हिन्दी के हालात पर नजर डालें तो वह वहीं है जहां इसे आयोजनों से पूर्व छोड़ा गया। 
प्रतिवर्ष होने वाले हिन्दी आयोजनों की सफलता का राज 70 वर्ष के उपरान्त भी अंग्रेजी के वर्चस्व के रूप में विद्यमान हैं।यह बात यहीं तक सीमित नहीं है। सरकारी कार्यालय हो या निजी आवास, किसी अधिकारी का कार्यालय हो या घर, प्राय: हर जगह दीवारों पर चमचमाते अंग्रेजी के सुनहरे पट तथा गर्द खाते राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में लगे टूटे-फूटे पुराने पट आज भी दिख जायेंगे। जो हिन्दी के प्रति दोहरेपन की जी रही जिन्दगी के आभास आसानी से दे जाते हैं। इसी कारण आम आदमी यहां का अपनी संस्कृति व सभ्यता से कोसों दूर होता जा रहा है। अनुशासन नाम की कोई चीज ही नहीं रह गई है। आज यहां अंग्रेजी के दो-चार शब्द बोल देना बुद्धिमत्ता की पहचान बन गई है। अंग्रेजी आती हो या नहीं, इसे कोई मतलब नहीं। अंग्रेजी का अखबार मंगाना फैशन सा हो गया है। घर के सामने अंग्रेजी में ही सूचना एवं नाम की पट्टिका प्राय: देखी जा सकती है। हिन्दी में दिये गये संदेश भी रोमन लिपि में भेजे जाते हैं। इस तरह के दोहरेपन की स्थिति ने हिन्दी के विकास को लचीलापन बनाकर रख दिया है। तुष्टिकरण की नीति से हिन्दी हमारी दोहरी मानसिकता का शिकार हो चुकी है। देश पर आज भी अंग्रेजियत हावी है।
राष्ट्रभाषा राष्ट्र की आत्मा होती है। जब सभी भारतवासी दोहरी मानसिकता को छोड़कर राष्ट्रभाषा हिन्दी को अपने जीवन में अपनाने की सही मायने में प्रक्रिया अपनायेगें तभी हिन्दी का राष्ट्रीय स्वरूप उजागर हो सकेगा। राष्ट्रहित में राष्ट्रभाषा हिन्दी को संसद से लेकर विधानसभा, सरकारी से लेकर समस्त निजी कार्यालयों तक अपनाना एवं अपनी दिनचर्या में उतारना बहुत जरूरी है, जिससे देश की पहचान बन सके। (संवाद)