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भ्रष्टाचार पर घमंड-1

Date : 11-Sep-18

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गिरीश पंकज 
उनको अपने भ्रष्ट होने पर बड़ा घमंड है ।  उस दिन वह अपनी मित्रमंडली में सबको बड़े शान से बता रहे थे कि मैंने कैसे-कैसे और कितने कितने छोटे- बड़े घोटाले किए। मजे की बात यह है कि  लज्जा का कोई भाव नही, उल्टे गर्व का भाव था भाई।  संसार में ऐसे कम लोग ही होते हैं जो अपने भ्रष्ट आचरण पर भी गर्व करें । और यह ऐसा इसलिए भी संभव होता है कि भगवान भी दुनिया में तरह-तरह के नमूनों को बनाकर भेजता है । सभी एक जैसे हो जाएंगे तो मजा क्या रहेगा। इसलिए भगवान अपनी ओर से हर व्यक्ति के आचरण में कुछ मौलिक विशेषताएं डाल देता है ।
 सीधे साधे लोग होते हैं , कुछ खुराफाती होते हैं,  कुछ निपट मूर्ख होते हैं। कुछ महान ज्ञानी होते हैं। कुछ सदाचार वाले होते हैं। कुछ कदाचार वाले होते हैं। कुछ सदाचारी अपने कदाचार पर शर्मिंदा भी हो लेते हैं । कुछ समलेंगिक होते हैं । कुछ बलात्कारी होते हैं । कुछ चमत्कारी होते हैं।  कुछ शिकारी होते हैं । कुछ बलिहारी होते हैं लेकिन यहाँ मैं जिस छदामीराम की बात कर रहा हूं, वह कभी शर्मिंदा होते ही नहीं ।उनके पिताश्री भी शर्मिंदा नहीं हुए, तो यह क्या खाक शर्मिंदा होंगे । 
यह तो डंके की चोट पर एलान करते हैं कि "हां, हम भ्रष्टाचारी हैं,  व्यभिचारी हैं। हमारा क्या उत्खनन कर लोगे?
 उस दिन छदामी राम जब अपने मित्रों के बीच आत्मप्रशंसा में रत दिखाई दिए तो हम भी ठहर कर उनकी बात सुनने लगे । 
फिर हमने भी उनसे प्रश्न किया,  "आपको डर नहीं लगता  कि आप खुलेआम अपने भ्रष्टाचार के बारे में लोगों को बता देते हैं ?
मेरी बात सुनकर वह हँस पड़े और बोले, हम भ्रष्टाचार से बड़ी मोहब्बत करते हैं।  किसी शायर की दो पंक्ति सुनिए कि
 मैं सबके सामने इस बात का इजहार करता हूं
मैं तुमसे प्यार करता था मैं तुमसे प्यार करता हूं 
...तो भ्रष्टाचार से मुझे बड़ा प्यार है । आई लव यू भ्रष्टाचार !! दरअसल इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण है । बचपन से मुझे अचार बहुत पसंद था । माँ तरह-तरह के अचार बनाती थी।  नींबू के, आम के अचार । उनको खाते-खाते अचार दिमाग में ऐसा बैठा कि मत पूछो।  बड़ा हुआ तो अचार खाने नहीं मिला। लेकिन खाना तो था । इसीलिए भ्रष्टाचार की ओर मेरा झुकाव हुआ । और इस नए आचार का स्वाद ऐसा लगा कि मैं भ्रष्टाचारमय हो चुका हूं। 
 आपको डर नहीं लगता कि पकड़े जाएंगे?  मेरी  बात सुन कर  छदामी राम जोर से हँस पड़े । इतनी जोर से कि आसपास के लोग उन्हें देखने लगे।
 तब वह  धीरे से बोले,   सैंया भए कोतवाल तो फिर डर काहे का ? अरे, अपनी एप्रोच ऊपर तक है। ऊपर तक मतलब समझ रहे हैं न! भगवान तक नहीं, सरकार में बैठे हुए धरती के भगवानों तक। इसलिए हमारा बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय। और हम इतनी सफाई से अपना खेल करते हैं कि बाएं हाथ को भी पता नहीं चल पाता कि मैंने दाएं हाथ से कोई रिश्वत ली है ।
 इस सफाई से काम करता हूं। लाखों रुपए की रिश्वत ली लेकिन कभी भी किसी को पता नहीं चला। और पैसों का मैंने क्या किया, इसके बारे में भी कोई नहीं जानता । मैंने बेनामी संपत्ति बनाई है और जिन-जिन के नाम पर बनाई है वे सब मेरे विश्वास पात्र हैं ।
 इसलिए मैं चिंता नहीं करता। और सच बात तो यह है कि भ्रष्टाचार करने के लिए कलेजा चाहिए । जैसे बलात्कारी लोग हिम्मत के साथ बलात्कार करते हैं, भले ही बाद में पकड़े जाते हैं यह अलग बात है । लेकिन उनमें हिम्मत है।  मैं भी ईमानदारी के साथ बलात्कार करता हूं । क्योंकि मुझ में हिम्मत है । वैसे मुझे पता है कि कभी पकड़ में नहीं आऊंगा। अरे, आज तक पकड़ में नहीं आया, तो अब क्या खाक आऊंगा ! वैसे भी अब तो सेवानिवृत्त होने वाला हूं।
(शेष  कल का अंक में )