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परउपदेश कुशल बहुतेरे -2

Date : 10-Sep-18

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 मित्र ने मुँह बिचकाते हुए कहा, नहीं, मैं इस बात को नहीं मानता।
मैंने कहा, इसी चक्कर में तो अपना भारत कभी-कभी दु:खी हो जाता है। वो क्या कहते हैं कि यहीं मार खा जाता है अपना इंडिया। तो आप जैसी सोच से भरे होने के कारण ही तो उस गांव में दूध का तालाब नहीं बन पाया था। 
मैंने मित्र को एक बोध कथा सुनाई  कि एक  गांव की पंचायत ने तय किया कि वे गाँव मे दूध का एक तालाब बनाएंगे।  हर घर से एक-एक व्यक्ति एक- एक लोटा दूध लेकर आएगा और सुबह होने के पहले तालाब में उसे डाल देगा ।  सभी ने यह सोचा कि बाकी लोग तो दूध डालेंगे ही, अगर मैं  एक लोटा पानी डाल दूंगा तो क्या फर्क पड़ेगा ? और सभी ने भोर होने से पहले एक -एक लोटा पानी तालाब में डाल दिया और घर चले गए । सुबह पंचायतवाले जब तालाब देखने आए  तो उन्हें दूध की जगह पानी -ही - पानी नजर आया। पंचायत ने सिर पीट लिया।
 हमारी कथा सुनकर मित्र जी  गंभीर हो कर बोले, ओह, उन लोगों को ऐसा नहीं करना चाहिए था।
हमने कहा, यही बात कचरे के मामले में लागू होती है। सब यही सोचने लगेंगे कि हर कोई सफाई करता है, एक मेरे गंदगी फैलाने से क्या होगा  तो सोचिए न कि क्या होगा!
उस दिन भी मित्र जी एकदम सुबह-सुबह उठे। 
घर का कचरा जल्दी-जल्दी एक झिल्ली में डाला और दूसरे घर के किनारे फेंक दिया। 
लेकिन वहां खड़े जागरूक कुत्ते से रहा न गया। 
उसने झिल्ली मुँह में दबाई और उसे दूसरे घर के सामने फेंक दिया ।
 दूसरे कुत्ते ने वह झिल्ली उठाई और तीसरे घर के आगे फेंक दी। इस तरह कचरे की झिल्ली  कुत्तों का खेल हो गई। 
एक इधर से मारता...
तो दूसरा उधर से।... 
यह मनोरम दृश्य देख कर मित्र जी गदगद हो गए। प्रसन्न होकर अपने आपसे ही कहने लगे, "धन्य हूं मैं कि इन कुत्तों के मनोरंजन के काम आ रहा हूं। आजकल कोई किसी के काम आ जाए, यह बड़ी बात है।  मुझे अब रोजाना इसी तरह एक झिल्ली कुत्तों के लिए निकालनी चाहिए ताकि बेचारे अपना मन बहला सकें। 
मित्र जी ने श्वानों का ख्याल रखा। 
उधर कुछ श्वान भी आपस में चर्चा करने लगे। 
एक बोला, यह आदमी कितना अच्छा है ना। रोज हमारे लिए फुटबॉल फेंक देता है, जिससे हम लोगों का मनोरंजन होता है।
दूसरा कुछ समझदार किस्म का कुत्ता था, वह बोला, यह फुटबॉल नहीं है, बे । इस के भीतर कचरा भरा हुआ है। चल, फाड़ कर देखते हैं । कुत्तों ने झिल्ली की छाती फाड़ दी तो कचरा सड़क पर बिखर गया।  कुत्ते कचरे से खेलने लगे। कचरा देख कर कुछ सूअर भी वहां पहुँच गए।  यह देख मित्र को बड़ा गुस्सा आया। वह कुत्तों के पीछे डंडा लेकर दौड़ा। 
कुत्ते भाग खड़े हुए। सूअर भी। 
मित्र बड़बड़ाया, कुत्ते कहीं के।  सूअर कहीं के।  कुछ भी तमीज नहीं है।  मैंने कचरा झिल्ली  में रखा था, इन्होंने फाड़ कर कचरे का कचरा कर दिया। कहीं हमारा वह उपदेशक मित्र देखेगा तो मेरी खिंचाई कर देगा।आखिर बेचारे कुत्ते हैं न, उनको क्या मालूम कि झिल्ली के पीछे  क्या है, झिल्ली केपीछे ।  इतना बोल कर मित्र जी 'Óचोली के पीछे क्या हैÓÓ वाला गाना गाते हुए घर के भीतर घुस गए। 
ठंडे दिमाग से सोचने लगे, अरे, गलती तो मेरी है । मुझे कचरे की झिल्ली  को इस तरह सड़क  पर नहीं फेंकना चाहिए था।  कचरा संग्रह करने वाले सफाई मित्र तो रोज घर के सामने से गुजरते हैं।  उनको दे देना ही ठीक रहेगा ।  इतना बोल कर मित्र ने अपने आप को संबोधित करते हुए कग,  
अरे, मैं तो चमत्कार हो गया हूँ। देखते ही देखते कुछ-कुछ  समझदार हो गया हूं।