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जलवायु परिवर्तन भविष्य के लिए बहुत बड़ा खतरा

Last Modified Aat : 30-Jun-18

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शशांक द्विवेदी
दुनिया के जलवायु ढांचे में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। बेमौसम आंधी.तूफान और बरसात से हजारों लोगों की जान जा रही है। ऋतु चक्रों में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर काफी बातें हो रही हैंए सम्मेलन.सेमिनार आदि आयोजित हो रहे हैं। लेकिन ठोस धरातल पर हालात से निपटने का कोई बड़ा प्रयास नहीं दिख रहा। जिस तरह क्लाइमेट चेंज अनाजों और अन्य खाद्य पदार्थों की पैदावार को प्रभावित कर रहा हैए उससे आने वाले समय में स्थितियां भयावह हो सकती हैं। जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें सामान्य आदमी की पहुंच से दूर हो जाएंगी और गृहयुद्ध व विभिन्न देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहां कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है। पर्यावरण का सवाल जब तक तापमान में बढ़ोतरी से भविष्य में आने वाले खतरों तक सीमित रहाए तब तक विकासशील देशों का इसकी ओर उतना ध्यान नहीं गया। पर अब पानी सिर से ऊपर जा रहा है।
जलवायु चक्र गड़बड़ाने से किसान तय नहीं कर पा रहे हैं कि कब बुवाई करें और कब फसल काटें। तापमान में इसी तरह बढ़ोतरी जारी रही तो खाद्यान्न उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट जाएगाए जिससे पूरे विश्व में खाद्यान्नों की भारी कमी हो जाएगी। एक नई अमेरिकी स्टडी में दावा किया गया है कि तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा साल 2030 तक अफ्रीका में गृहयुद्ध के खतरे को 55 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है। यानी महज अगले 12 वर्षों में अफ्रीकी देशों का संकट कहीं ज्यादा गहरा हो सकता है। यह स्टडी यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के अर्थशास्त्री मार्शल बर्क द्वारा की गई है। इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बनी स्थितियों में अकेले अफ्रीका के सब.सहारा इलाके में युद्ध भड़कने से 3 लाख 90 हजार मौतें हो सकती हैं। इन युद्धों के बहुत विनाशकारी होने की आशंका है।
दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन की बढ़ती दर ने पर्यावरण और खासकर जैव विविधता को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त हुई जीवजातियों के बराबर है। जलवायु में तीव्र गति से होने वाले परिवर्तन से 50 प्रतिशत जैव विविधता पर संकट है। अगर तापमान में 1ण्5 से 2ण्5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो 25 प्रतिशत प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी। अंतरराष्ट्रीय संस्था वल्र्ड वाइल्ड फिनिशिंग ऑर्गनाइजेशन ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि 2030 तक घने जंगलों का 60 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाएगा। वनों के कटान से वातावरण में कार्बन अधिशोषण में आने वाली कमी वनस्पतियों व प्राकृतिक रूप से स्थापित जैव विविधता के लिए खतरा उत्पन्न करेगी। मौसम के मिजाज में होने वाला परिवर्तन ऐसा ही एक खतरा है। इसके परिणामस्वरूप हमारे देश के पश्चिमी घाट के जीव.जंतुओं की अनेक प्रजातियां विलोप के कगार पर पहुंच चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र की पहल पर जलवायु परिवर्तन को लेकर गठित अंतर सरकारी पैनल आईपीसीसी की रिपोर्ट में भी इसी तरह की चेतावनी दी गई थी। जलवायु परिवर्तन दृ प्रभावए अनुकूलन और जोखिमष् शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पहले से ही सभी महाद्वीपों और महासागरों में विस्तृत रूप ले चुका है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया को बाढ़ और गर्मी के कारण मृत्युए सूखा तथा खाद्य की कमी का सामना करना पड़ सकता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले और मुख्यतरू मानसून पर निर्भर भारत जैसे देशों के लिए यह काफी खतरनाक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से दक्षिण एशिया में गेहूं की पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा हैए साथ ही वैश्विक खाद्य उत्पादन भी धीरे.धीरे घट रहा है। एक खास बात यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही हैए बल्कि उनकी पौष्टिकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
एशिया में तटीय और शहरी इलाकों में बाढ़ की घटनाओं से बुनियादी ढांचेए आजीविका और बस्तियों को काफी नुकसान हो सकता है। खासकर मुंबईए कोलकाताए ढाका जैसे शहरों पर खतरे की आशंका बढ़ रही है। पिछले दिनों पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी जलवायु परिवर्तन पर इंडियन नेटवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज असेसमेंट की रिपोर्ट जारी करते हुए चेताया था कि यदि पृथ्वी के औसत तापमान का बढऩा इसी प्रकार जारी रहा तो आगामी वर्षों में भारत को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे। इसका सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था पर पड़ेगा। पिछले दो सालों में देश के कई इलाकों में बेमौसम बरसात और सूखे की वजह से किसानों की बड़ी आबादी बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही है। पिछले साल आई बेमौसम बारिश ने कई राज्यों की 50 लाख हेक्टेयर भूमि में खड़ी फसल बर्बाद कर दी थी। मौसम के बिगड़े हुए मिजाज ने देश भर में समस्या पैदा कर दी है। यह सब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की वजह से हो रहा है। जलवायु परिवर्तन संपूर्ण मानवता के लिए बड़ा खतरा है। इस समस्या से निपटने के लिए वैकल्पिक ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की जरूरत है। हम सौर ऊर्जा को बड़े पैमाने पर अपना सकते हैं। लेकिन वैकल्पिक ऊर्जा का उपयोग तभी बढ़ेगाए जब इसका उत्पादन बढ़े। इसके लिए पूरे विश्व को एकजुट होकर आगे बढऩा होगा। देश के प्राकृतिक संसाधनों के सतर्क दोहन और पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकारी प्रयास के साथ ही जनता की सकारात्मक भागीदारी भी जरूरी है। इस संबंध में जन.जागरूकता फैलाने का काम लगातार करने होगा। पर्यावरण संरक्षण का सवाल पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व से जुड़ा है। इसकी उपेक्षा करना खुद को खारिज करने जैसा ही है।