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संपादकीय : प्रकृति से खिलवाड़ का दुष परिणाम

Date : 06-Sep-18

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संपादकीय : प्रकृति से खिलवाड़ का दुष परिणाम
इस साल मानसून लगभग पूरे देश में कहर बरपा रहा है। केरल में आई भारी बाढ़ से जो जन माल की छति हुई है अपूर्णिय है। केरल के बाद मध्यप्रदेश, दिल्ली, बिहार और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में भी अतिवृष्टि के कारण भारी छति पहुंची है। जाते-जाते भी मानूसन कहर ढा रहा है। अब तक भारी वर्षा के कारण देश में लगभग ढेड़ हजार लोग काल का ग्रास बन गए है वहीं हजारों करोड़ रूपए की संपत्ति को नुकसान पहुंचा है। दरअसल यह प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ही नतीजा है जो कभी सूखा तो कभी बाढ के रूप में सामने आता है। सरकार आपदा प्रबंधन की बाते तो बढ़-चढ़कर करती है लेकिन इसे कभी गंभीरता से नहीं लेती। अक्सर देखा गया है कि प्राकृतिक आपदा टूटने के बाद ही प्यास लगने पर कुंआ खोदने वाली कहावत चरितार्थ की जाती है। बाढ की समस्या से निपटने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेई ने देश की सभी नदियों को जोडऩे की जो परिकल्पना की थी। उसे साकार करने के लिए सरकार ने कोई पहल नहीं की। यही वजह है कि हर साल बाढ के कारण देश को भारी जान और माल के नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। जलवायु परिर्वतन का मुख्य कारण दिनों दिन बढ़ता वायु प्रदूषण है। जिसे रोकने के लिए कोई कारगर पहल नहीं की जा रही है। वायु प्रदूषण के कारण ही कृत्रिम बादल बनते है जो कहर बनकर टूटते है। अभी भी समय है कि हम प्रकृति से खिलवाड़ बंद करें और प्रदूषण की रोकथाम कर पर्यावरण संरक्षण के लिए अधिकाधिक वृक्षारोपण करे। अन्यथा भविष्य में इस देश को कुदरत के कहर का इसी तरह सामना करना पड़ेगा और इसके लिए आने वाली पीढि़ हमें कभी माफ नहीं करेगी। अब जबकि हर साल यह हर दूसरे साल सूखा पडऩा या फिर अतिवृष्टि के कारण बाढ की स्थिति निर्मित होना इस देश की नियती बन चूकी है तो सरकार को चाहिए कि वह आपदा प्रबंधन के लिए भी एक ठोस नीति निर्धारित करें। अन्यथा प्रकृति विनाश लीला को रोक पाना असंभव की हद तक कठिन हो जाएगा।