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 रो पड़ा आसमान, झुक गयीं डालियाँ

Date : 19-Aug-18

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रो पड़ा आसमान, झुक गयीं डालियाँ चाँद भी छुप गया, सोई परछाइयाँ। बह रही अश्रुधार, रुँध गयी आवाज़ छा रही चहुँ ओर कैसी तनहाइयाँ। वो गीत, वो गज़ल हो गये खामोश दे गये वो जहां को अपनी रुबाइयाँ। राजनीतिज्ञ, कवि, वक्ता, पत्रकार थे शांत और सरल, न थीं रुसवाइयाँ। कर्म धर्म से थे अटल अचल अडिग प्रेरणा वो बने जब आईं कठिनाइयाँ। न रुके न थके, न झुके वो कभी जला एकता का दीप, बुझाई चिंगारियाँ। यादों में रहेंगे अटल युग पुरुष न रहे वो मगर जी उठी वादियाँ।

नीरजा मेहता