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मगहर दौरे से शुरू हुई अति-पिछड़ों को BJP से जोड़ने की दूसरी मुहिम

Last Modified Aat : 28-Jun-18

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PM मोदी के मगहर दौरे से शुरू हुई अति-पिछड़ों को BJP से जोड़ने की दूसरी मुहिम

 नई दिल्ली: यूपी के संतकबीर नगर में मगहर एक छोटा सा कस्बा है. हाईवे से बांए हाथ पर उतरने के बाद कुछ मील की दूरी पर संत कबीर की मजार और समाधि आ जाती है. कबीर की दोनों निशानियां एक ही परिसर में हैं, जहां इमली और दूसरे बड़े पेड़ों पर पक्षी चहचहाते रहते हैं. इस परिसर के बीच में एक दीवार है, जहां से मजार और समाधि की हदबंदी हो जाती है, लेकिन दीवार के बीच एक दरवाजा भी है, जहां से कबीर के विचार दोनों धर्मों के बीच आना-जाना करते हैं.

इस सांस्कृतिक पहचान के अलावा मगहर की यह पहचान भी है कि वह पूर्वी उत्तर प्रदेश के घनघोर गरीबी वाले इलाके में पड़ता है, जहां बड़ी संख्या में कबीरपंथी रहते हैं. आधुनिक राजनैतिक भाषा में कहें तो कबीरपंथ के ज्यादातर अनुयायी अति-पिछड़ा वर्ग और दलित समुदाय की जातियों से आते हैं. यह पारंपरिक रूप से कांग्रेस के वोटर हुआ करते थे, लेकिन कोई ढाई दशक से ये बहुजन समाज पार्टी के ज्यादा करीब पहुंच गए हैं. आज कबीर जयंती के मौके पर मगहर पहुंच कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ महान क्रांतिकारी और प्रगतिशील संत को श्रद्धांजलि दी, बल्कि एक नए किस्म के वोटर को पार्टी के साथ जुड़ने की दावत दी.

इसी तरह मोदी के विरोध में बसपा, सपा और कांग्रेस को मिला वोट भी 2014 और 2017 में तकरीबन एक सा रहा. अगर सामाजिक ढांचे के हिसाब से देखें तो अगड़ा, पिछड़ा और अति-पिछड़ों की बड़ी संख्या मोदी के पीछे लामबंद हुई. ये जो अति-पिछड़े बीजेपी के साथ आए, उसका श्रेय मोदी और अमित शाह की रणनीति को जाता है. इनमें से बहुत से वोटर बसपा और सपा से टूटकर भाजपा की तरफ आए और अब तक बने हुए हैं. नाई, कुशवाहा, दर्जी, कुम्हार, लुहार, निषाद जैसी कई अति पिछड़ी जातियां विशुद्ध रूप से पीएम मोदी के नाम पर बीजेपी से जुड़ीं और अब तक साथ हैं.

लेकिन मुस्लिम, यादव और दलित स्पष्ट तौर पर न सिर्फ बीजेपी से दूर हैं, बल्कि वे दूसरे खेमे से और मजबूती से चिपक गए हैं. इन प्रमुख जातियों को मिलाकर दूसरे खेमे का वोट 45 फीसदी से अधिक हो जाता है.

विनिंग मार्जिन वाले चार-पांच फीसदी वोटर
इस जबरदस्त खेमेबंदी को रोकने के दो ही उपाय हैं, पहला- महागठबंधन होने ही न दिया जाए और दूसरा कि उस पाले के चार से पांच फीसद वोट किसी तरह अपनी तरफ कर लिए जाएं. संत कबीर को याद करने के बहाने पीएम मोदी ने उसी चार-पांच फीसदी वोटर को रिझाने की मुहिम शुरू की है, जो पार्टी को विनिंग मार्जिन दे सकता है. इस मुहिम में पीएम मोदी को खुद इसलिए कूदना पड़ा, क्योंकि गोरखपुर जैसी बीजेपी की गढ़ सीट पर सपा ने अपना निषाद प्रत्याशी जिता लिया. निषादों ने लोकसभा और विधानसभा में बीजेपी को वोट किया था. लेकिन ये उपचुनाव वोट में दरार दिखा गया. संत कबीर के नाम पर बीजेपी न सिर्फ अति-पिछड़ों, बल्कि गैर जाटव दलितों को भी अपने साथ लाने की कोशिश करेगी. यह कोशिश इसलिए ज्यादा भावनात्मक अपील पैदा कर सकती है, क्योंकि यूपी की राजनीति में इससे पहले किसी ने कबीरपंथ को सीधे वोटर समूह के तौर पर नहीं देखा. कबीरपंथियों का दायरा सिर्फ यूपी तक ही सीमित नहीं है, वे मध्य प्रदेश में भी हैं और हिंदी पट्टी के कई राज्यों में हैं. अगर बीजेपी ने उनकी जातियों की अस्मिता को दलित अस्मिता से काटकर कबीरपंथी अस्मिता से जोड़ लिया, तो यह उसके लिए बड़ी कामयाबी होगी.

बीएसपी को झटका
इसका सीधा झटका बीएसपी को लगेगा, जो सीटों के लिहाज से भले ही कहीं की न रह गई हो, लेकिन वोटों के हिसाब से यूपी की दूसरी और देश की तीसरे नंबर की पार्टी है. लेकिन इस प्लान को अमल में लाने के लिए बीजेपी को मोदी के नाम और शाह के प्लान के साथ ही कबीरपंथियों को नैसर्गिक नेतृत्व भी चाहिए होगा. बीजेपी अगर बीएसपी से कुछ नेता तोड़ भी लाती है, तो वे बीजेपी में आकर नेता नहीं बन जाएंगे. अब बीजेपी को देखना होगा कि क्या उसके पास संघ की पाठशाला से निकले कबीरपंथी चेहरे हैं या नहीं. अगर हैं तो उन्होंने चुनाव से पहले बड़ा नेता दिखाना होगा. जो उन्होंने विद्रोही दलित चेतना से हिंदूवादी दलित चेतना की तरफ मोड़ सकें. लेकिन क्या यह काम एक छिमाही में किया जा सकता है, क्योंकि लोकसभा चुनाव में अब दिन ही कितने बचे हैं.