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जरा इनका भी पसीना सूंघेंं

Last Modified Aat : 28-Jun-18

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कनक तिवारी
ऐसा नहीं है कि पुलिस व्यवस्था केवल खलनायकी है। तमाम विवशताओं के बावजूद भारतीय पुलिस बल में अपना रेकार्ड अच्छा रखने का हौसला है। कनिष्ठ पुलिसकर्मियों में अब भी ऐसे हैं जो अपने कर्तव्य के प्रति मुस्तैद हैं। उनकी आर्थिक स्थितियां चिन्तनीय हैं। अपराधियों की दुनिया अमीर, सुविधासम्पन्न, आधुनिकतम हथियारों और अधुनातन संचार माध्यमों से लैस होती गई है। उसके मुकाबले पुलिसिया इंतजाम के संवेदन स्थल आरक्षी केन्द्र इक्कीसवीं शताब्दी में भी खपरैल की छत के नीचे अपनी बदहाली में जी रहे हैं। पुलिस बल की कमी है। उनकी सेवा शर्तों में परिवर्तन की मांगें अब तक अनुत्तरित हैं। एक औसत पुलिस हवलदार या सिपाही की डॉक्टरी जांच कराई जाए तो वह कुपोषण का भी शिकार पाया जाएगा। जिस पोलिस कर्मी को खतरनाक मुजरिमों को अपनी जान जोखिम में डालकर पकडऩा हो, देश जानता भी है कि वह खाता क्या है? वह कैसे सरकारी क्वार्टरों में रहता है? उसकी सेवा शर्तें क्या हैं? उसे कितना ओवरटाइम करना होता है? उसकी त्वचा बुढ़ापे के पहले ही सिकुड़ क्यों जाती है? पुलिस बल के कनिष्ठ पक्ष का एक मानवीय चेहरा भी है जिसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। इससे आईपीएस अधिकारियों को कोई छूट नहीं दी जा सकती। उनका राजसी वैभव, मंत्रियों से उनकी परस्पर निकटता, घूस खाने की उनकी अपरिमिति पाचनशक्ति, जिम्मेदारियों को कनिष्ठ अधिकारियों पर डाल देने के लिए उपलब्ध श्रेष्ठि वर्ग द्वारा रचे गए कानून सब कुछ उनके पास उपलब्ध हैं।
कोई यह क्यों नहीं जानना चाहता कि देश की नवयुवतियां एक ओर शिक्षक और वकील से उनकी आमदनी की अनिश्चितता को लेकर ब्याह नहीं करना चाहतीं तो दूसरी ओर पुलिस वालों से भी उनकी छवि को लेकर खौफ खाती हैं कि वे शराब जरूर पीते होंगे। गालियां देना तो उनके स्वराज्य का जन्मसिद्ध अधिकार होगा। मारपीट भी अक्सर करते ही होंगे। पुलिस की मानसिकता में कुंठा से उपजी निर्वीर्य हिंसा का प्रवेश इतिहास की ताजा घटना है। वकीलों, डॉक्टरों, व्यापारियों जैसे वर्गों पर निर्मम लाठी प्रहार की घटनाएं टेलीविजन पर देखने को मिलती रहती हैं।
पुलिस बल को संविधान का शिक्षण नहीं दिया जाता है। लोकतंत्र, नागरिक और मानव अधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी, शांतिपूर्ण आन्दोलन का जन-अधिकार जैसे विषयों से पुलिस बल का लेना देना है। उसे अंगरेजी बुद्धि राज के केचुल से निकाला जाना चाहिए। देश में मणिपुर इतिहास में कोई पचास वर्ष आगे इस अर्थ में है कि यदि पुलिसिया आदतों की यही बानगी रही तो बाकी प्रदेशों में भी सशस्त्र पुलिस बल का कोई अधिनियम ऐसी ही राजनीतिक बुद्धि की कोई सरकार रचेगी। तब जनता के सारे संगठन मिल कर अपान लुब जैसा कोई जन आन्दोलन खड़ा करेंगे।
भारतीय पुलिस सेवा के कई अधिकारियों के जेहन में इस बेहद जरूरी सेवा संस्था की भूमिका को लेकर गम्भीर सोच रहा है। के.पी.एस. गिल, रुस्तमजी, किरण बेदी जैसे ढेरों अधिकारी हुए हैं जिन्होंने पुलिस की जनकल्याणकारी भागीदारी को लेकर तरह तरह के उपक्रम किए हैं। जनता के वर्गों से प्रत्यक्ष सम्वाद किया है और सरकारों को रिपोर्टे भी सौंपी हैं। पुलिस के कई अधिकारी संवेदनशील कवि और समाजशास्त्र के विचारक भी रहे हैं। पुलिस सेवा की चरित्र हत्या कर उसका मनोबल गिराया जाना समाज के हित में नहीं है। इस सेवा के बिना कानूनसम्मत सिविल समाज की कल्पना साकार नहीं की जा सकती। चोरों, लुटेरों, डाकुओं, नकबजनों के बढ़ते सैलाब में पुलिस की लाठी ही रक्षक भूमिका में है। व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। पुलिस की दरक गई छबि को सुधारने की चिन्ता होनी चाहिए। पुलिस-नेता और पुलिस-उद्योगपति तथा पुलिस-अपराधी जैसी युतियां लोकदृष्टि में नहीं दीखनी चाहिए। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को अपनी आत्मा के अन्दर झांककर देखने के साथ साथ कनिष्ठ पुलिसकर्मियों की सेवा शर्तों में भी कमियां बीननी चाहिए। वरिष्ठ अधिकारी अपने कर्तव्यों, जिम्मेदारियों और जवाबदेही का दायरा बढ़ाएं और 'मरी बछिया बाम्हन के नाम' कहते हर दुर्घटना को आरक्षी केन्द्र के प्रभारियों के सिर पर न दे मारें। सरकारी, गैर सरकारी पार्टियों, पिकनिकों, मंत्रियों की सभाओं, महफिलबाजियों, हवाई दौरों वगैरह के आकर्षण नुकसानदेह होते हैं। पुलिस बल के शस्त्रों और संचार साधनों में आधुनिकता की तत्काल जरूरत को टाला नहीं जा सकता।
नागरिक-पुलिस संवाद की निरंतरता कायम रखी जानी चाहिए। नागरिकों में प्रेस स्वयमेव शामिल है क्योंकि वह लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। पुलिस की भूमिका को लेकर अकादेमिक स्तर पर शोध को बढ़ावा मिलना चाहिए। पुलिस की जिन्दगी के चारों ओर उगी लोहे की अभेद्य दीवार नागरिकों के लिए गिराई जानी चाहिए। पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाए। आई0ए0एस0 लॉबी की आई0पी0एस0 लॉबी पर वरीयता की थ्योरी को तहस नहस किया जाए। दंड प्रक्रिया संहिता में पुलिस के क्षेत्राधिकारों और जवाबदेही को लेकर संशोधन करने पर विचार किया जाए।
 देश के सभी राज्यों में पुलिस बल के गठन, कार्य, भूमिका, व्यवस्था को लेकर एक तुलनात्मक अध्ययन के बाद श्वेतपत्र प्रकाशित किया जाए जिससे इस सेवा की भूमिका को लेकर एकरूपता कायम रह सके। अब तक केन्द्र और राज्य सरकारों के पास जितने भी आयोगों और समितियों की रिपोर्टें धूल खाती पड़ी हों, उन्हें दीमकों से बचाया जाए और निर्णयों के हवाले किया जाए।