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 कल बरस रहा था सावन

Date : 11-Aug-18

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कल बरस रहा था सावन तेरे रेशमी अहसास का, संदली साँसों की छुअन का, महकते जज़्बात का भीग रही थी मैं रूह तक तेरे शाने पर सिर रख उतर रही थी तेरी धड़कनो तक खुली आँखों से बुन रही थी मखमली ख्वाब ख्वाब.....भूल गई थी कि अक्सर रह जाते है पलकों की कोर में सिमटकर या अश्कों में ढलकर आज फिर बरस रहा है सावन तेरी यादों का मेरी आँखों से दबी हसरतों की डाल पर अनकहे जज़्बातों ने डाल दिया है झूला आओ न, एक बार फिर तुम्हारे शाने पर सिर रख झूल लूँ ख्वाब को कुछ पल के लिए ही सही हकीकत कर लूँ इस सावन फिर तुम्हारे साथ भीग लूँ।

पूजा बंसल