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छह साल का होगा कूलिंग पीरियड

Date : 09-Aug-18

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नयी दिल्ली।  उच्चतम न्यायालय ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) और राज्य क्रिकेट संघों को बड़ी राहत देते हुये गुरूवार को 'एक राज्य एक मतÓ और पदाधिकारियों के लिये 'कूलिंगÓ अवधि की सिफारिश को खारिज करते हुये भारतीय बोर्ड के नये संविधान को मंजूरी दे दी। उच्चतम न्यायालय ने बीसीसीआई में संवैधानिक और आधारभूत सुधारों के लिये लोढा समिति की नियुक्ति की थी जिसने एक राज्य एक वोट नीति और पदाधिकारियों के लिये एक कार्यकाल के बाद कूलिंग अवधि की सिफारिशें की थीं जिसका अधिकतर राज्य संघों ने पुरजोर विरोध किया था। यदि ये सिफारिशें लागू हो जातीं तो देश के क्रिकेट प्रशासन में क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाता। 

लोढा समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिये उच्चतम न्यायालय ने प्रशासकों की समिति गठित की थी जिसने बीसीसीआई के नये संविधान का मसौदा तैयार किया था। लेकिन सर्वोच्च अदालत ने इन दो महत्वपूर्ण सिफारिशों को दरकिनार करते हुये बीसीसीआई के नये संविधान को अपनी मंजूरी दे दी है। प्रशासकों की समिति (सीओए) के अध्यक्ष विनोद राय ने इस फैसले का स्वागत किया है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने बोर्ड के लिये तैयार किये गये संविधान के मसौदे को कुछ बदलावों के साथ मंजूरी दे दी। अदालत ने साथ ही बीसीसीआई के राज्य सदस्यों को बड़ी राहत देते हुये एक राज्य एक मत की सिफारिश को रद्द कर दिया है और मुंबई, सौराष्ट्र, वडोदरा, गुजरात, विदर्भ, महाराष्ट्र क्रिकेट संघों को स्थायी सदस्यता प्रदान कर दी है। लोढा समिति ने अपनी सिफारिशों में इन क्रिकेट संघों को अपने अपने राज्यों में रोटेशन के आधार पर चलाने की सिफारिश की थी। मुख्य न्यायाधीश ने तमिलनाडु सोसायटी के रजिस्ट्रार जनरल को चार सप्ताह के भीतर नये संशोधित बीसीसीआई संविधान मसौदे को रिकार्ड करने के लिये निर्देश भी दिये हैं। खंडपीठ में न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूण भी शामिल थे।

लोढा समिति ने रेलवे स्पोट्र्स प्रमोशन बोर्ड, सर्विसेज़ स्पोट्र्स काउंसिल बोर्ड, इंडियन यूनिवर्सिटीज़, नेशनल क्रिकेट क्लब कोलकाता और क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया की पूर्ण सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की थी लेकिन खंडपीठ ने रेलवे, सेना और यूनिवर्सिटीज़ की स्थायी सदस्यता को भी बरकरार रखने का फैसला किया।

सर्वोच्च अदालत ने बीसीसीआई के पदाधिकारियों के लिये 'कूलिंग ऑफÓ या दो कार्यकालों के बीच में अंतर की समयावधि के नियम में भी बदलाव किये हैं। संशोधित नियम के अनुसार बोर्ड का कोई शीर्ष पदाधिकारी अब एक के बजाय लगातार दो कार्यकाल यानि छह वर्षों तक पद पर बना रह सकता है। वह बीसीसीआई या राज्य अथवा दोनों को मिलाकर तीन तीन साल का दो कार्यकाल गुजार सकता है। अदालत ने साथ ही क्रिकेट संघों को आदेश दिये हैं कि वे 30 दिनों के भीतर बीसीसीआई के संविधान को लागू करें। इसके लिये अदालत ने सीओए को भी निर्देश दिये हैं कि वह इस प्रक्रिया की निगरानी करे। राज्य संघों को नियम उल्लंघन करने की स्थिति में सज़ा के लिये भी चेताया गया है।

उल्लेखनीय है कि पांच जुलाई को अपने फैसले में सभी राज्य क्रिकेट संघों को शीर्ष अदालत ने अगले आदेश तक चुनाव कराने से रोक लगायी थी। वहीं पिछली सुनवाई मेंं तमिलनाडु क्रिकेट संघ(टीएनसीए) ने बीसीसीआई एवं राज्य सघों के पदाधिकारियों के लिये कूलिंग ऑफ का विरोध किया था। टीएनसीए ने साथ ही आर एम लोढा समिति के पदाधिकारियों के लिये 70 वर्ष की आयु तक पद पर रहने की सिफारिश का भी विरोध किया था। हालांकि अदालत ने पदाधिकारियों के लिये 70 वर्ष की आयु निर्धारित करने के नियम को बरकरार रखा है। सर्वोच्च अदालत ने इससे पहले बीसीसीआई के पदाधिकारियों और राज्य क्रिकेट संघों को भारतीय बोर्ड के नये संविधान के लिये अपनी सलाह देने के लिये भी कहा था जो लोढा समिति की सिफारिशों की दिशा में हों। लोढा समिति ने बीसीसीआई में आधारभूत ढांचें में बदलाव के लिये अपनी सिफारिशें अदालत के सामने रखी थीं जिनमें से पहले एक राज्य एक मत के नियम सहित अधिकतर पर अदालत ने अपनी सहमति जताई थी। हालांकि बाद में कई नियमों का विरोध हुआ जिसमें से एक राज्य एक मत नियम मुख्य था क्योंकि महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों के ही अकेले ही तीन-तीन क्रिकेट संघ हैं जिनकी टीमें रणजी सहित घरेलू टूर्नामेंटों में खेलती हैं।