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 संपादकीय:  आर्थिक आधार पर आरक्षण की कवायद

Date : 07-Aug-18

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आखिरकार सरकार ने देर से ही सही लेकिन इस बात की आवश्यकता महसूस की है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने से ही सामाजिक असमानता दूर होगी। एक लंबे समय से आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग की जा रही थी। किंतु वह नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रही गई थी। इस बीच जाति आधार पर आरक्षण की मांग लेकर हरियाणा में जाटों ने और गुजरात में पटेलों ने हिंसक आंदोलन किया। महाराष्ट्र के मराठा भी आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलित है। आगे चलकर और भी कई जातियां जो आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम है और राजनीति में भी जिनका अच्छा खासा दखल है वे भी आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन का रास्ता अपना सकती है। निश्चित रूप से जाति आधार पर आरक्षण का दायरा बढ़ाने से असंतोष उपजेगा। वैसे भी अब सरकारी नौकरियों का एक तरह से अकाल पड़ चुका है। ऐसे में जाति आधार पर आरक्षण बढ़ाना पहले से आरक्षित जातियों के साथ एक तरह से अन्याय ही कहा जाएगा। गौरतलब है कि आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार ने अब आर्थिक आधार पर 15 से 18 प्रतिशत तक आरक्षण देने की कवायद की है जिसमें सभी जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की जाएगी। किंतु इसके लिए भी सरकार को संविधान में संशोधन करना पड़ेगा। वर्तमान में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय की गई है। सरकार इसके लिए सर्वदलीय बैठक बुलाकर सभी दलों की राय लेगी। उसके बाद ही इस दिशा में आगे बढ़ेगी। सरकार ने स्पष्ट किया है कि एससी, एसटी और पिछड़ावर्ग को जो आरक्षण मिला हुआ है उसे छेड़े बिना ही आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाएगा। बहरहाल इस पर अभी सरकार विचार ही कर रही है। अधिकृत रूप से इसकी कोई घोषणा अभी नहीं की गई है। विपक्ष का आरोप है कि चुनावी साल में आर्थिक आधार पर आरक्षण का जुमला उछाला जा रहा है। अब देखना होगा कि क्या सरकार सचमुच आर्थिक आधार पर आरक्षण के लिए संकल्पित है या असंतुष्ट अगड़े वर्ग को अपने पाले में करने के लिए शिगुफेबाजी कर रही है। वास्तव में होना तो यह चाहिए कि आर्थिक आधार पर सभी जातियों को आरक्षण दिया जाए तभी सभी के साथ सभी के विकास का उद्देश्य पूरा हो पाएगा।