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आजादी का आन्दोलन और हिन्दू महासभा

Last Modified Aat : 27-Jun-18

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कनक तिवारी

6 जुलाई डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जन्मदिन है। प्रख्यात शिक्षाशास्त्री, सांसद, संविधानविद, देशभक्त और हिन्दूवादी नेता के रूप में उनका महत्व और यश इतिहास में दर्ज रहेगा। उनकी सेवाओं का मूल्यांकन इतिहास करेगा ही। उनके राजनीतिक वंशज पौने तीन सौ की संख्या के पार संसद में पहुंच गए हैं। पहले आम चुनाव में डाक्टर मुखर्जी की पार्टी के केवल तीन सांसद लोकसभा पहुंचे थे। उनकी विचारधारा, समझ और बौद्धिक प्रतिबद्धता को लेकर बहस की गुंजाइश हर समय रही है। कई मामलों पर, जैसे सम्भावित चीनी आक्रमण पर, उन्होंने देश का ध्यान लगभग भविष्यवाणी की शक्ल में खींचा था। इन स्थितियों में या कोई किताब ने मुखर्जी को लेकर संसदीय लोकतंत्र में सवाल उछाले तो जिज्ञासाएं उन्हें जांच के कटघरे में खड़ा करती हैं।

1997 में हरीशचन्द्र और पद्मिनी लिखित ''डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी: समकालीन दृष्टि में'' नामक किताब प्रकाशित हुई। इसमें हीरेन मुखर्जी जैसे अपवादों को छोड़कर संघ परिवार के बुद्धिजीवियों और नेताओं के लेख और संस्मरण हैं। के.आर. मल्कानी के लेख को 'लोकसभा के रिकॉर्ड से' लेना बताया गया है कि ''एक समय यह सुझाव आया कि बंगाल को स्वतंत्र राज्य बना दिया जाए।......पर डाक्टर मुखर्जी ने नहीं होने दिया।.....कुछ वर्ष बाद नेहरू ने कहा कि मुखर्जी विभाजन के लिए सहमत हो गए थे तो मुखर्जी ने उत्तर दिया, ''आपने भारत का विभाजन किया है, और मैंने पाकिस्तान को विभाजित कर दिया।'' भूमिका में बलराज मधोक लिखते हैं, ''डाक्टर मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग उठाकर पाकिस्तान का विभाजन करवाया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खंडित भारत के लिए बचा लिया।'' ग्रंथ के प्रेरक केदारनाथ साहनी लिखते हैं, ''देश का विभाजन अनिवार्य जैसा हो गया, तब डाक्टर मुखर्जी ने सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं के हितों की उपेक्षा न हो। उन्होंने बंगाल के विभाजन के लिए जोरदार प्रयास किया। उससे मुस्लिम लीग का पूरा प्रांत हड़पने का मंसूबा सफल नहीं हो सका।'' आधा बंगाल और आधा पंजाब कैसे बचे के लिए मुखर्जी ने कई बार लिखकर और मिलकर गांधी से मदद मांगी थी।

श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 13 मई 1947 को गांधी से बंगाल के एकीकरण को लेकर जिरह की। गांधी ने पूछा मुखर्जी बंगाल के एकीकरण के क्यों खिलाफ हैं? मुखर्जी ने उत्तर दिया भले ही सुहरावर्दी इस थ्योरी के छद्म लेखक हैं, लेकिन यह ब्रिटिश हुकूमत की सूझ है। गांधी ने व्यंग्य किया क्या थ्योरी के लेखक की वजह से ही मुखर्जी को आपत्ति है। गांधी के अनुरोध पर मुखर्जी ने कहा कि बंगाल का हो चुका विभाजन एक सत्य है। गांधी ने फिर टोका। यदि पश्चिम और पूर्वी बंगाल के लोग पारस्परिक सहमति व्यक्त करेंगे, तब ही बंगाल का एकीकरण होगा, अन्यथा नहीं। मुखर्जी ने गांधी से पूछा था ''यदि हिन्दुओं का बहुमत भारत और मुसलमानों का बहुमत पाकिस्तान के साथ जाना चाहेगा, तब क्या होगा?ÓÓ महात्मा का उत्तर था, ''बंगाल का विभाजन होगा। विभाजन बंगाल के लोगों की पारस्परिक सहमति से होगा, ब्रिटिश हुकूमत द्वारा नहीं।

1942 का 'भारत छोड़ो' आन्दोलन आज़ादी के गायन की भैरवी है। आन्दोलन ने देश को झकझोर दिया। हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग ने 1942 के आन्दोलन में खलनायक की भूमिका की। 'कांग्रेस का इतिहास' में पट्टाभि सीतारमैया लिखते हैं, ''गांधीजी और उनके साथियों की गिरफ्तारी के अवसर पर सावरकर ने हिन्दुओं को सलाह दी कि कांग्रेस आन्दोलन में किसी प्रकार की मदद नहीं करें'। जीवन भर वे राष्ट्रवाद के स्थान पर हिन्दुत्व और हिन्दू साम्प्रदायिकता का प्रचार करते रहे हैं। कांग्रेस नेताओं के जेल जाने के बाद मुस्लिम बहुल प्रांतों में मंत्रिमंडल बनाने उन्होंने अलग अलग कारणों से हिन्दुओं को भाग लेने प्रोत्साहित किया। इन मामलों में मुस्लिम लीग की नीति का अनुसरण कर रहे थे। लीग की तरह तात्कालिक उद्देश्य की अधिक परवाह थी। आज़ादी के बजाय साम्प्रदायिक लाभ का अधिक ध्यान था। ब्रिटेन के विरुद्ध लडऩे के बजाय उसके साथ मिलकर काम करना अधिक पसन्द था।'' यह हिन्दू महासभा के अध्यक्ष का फतवा था।

संस्मरण-ग्रंथ की प्रस्तावना में बलराज मधोक लिखते हैं, ''उनके (मुखर्जी) द्वारा 26 जुलाई 1942 को बंगाल के गवर्नर सर जॉन हर्बर्ट और 12 अगस्त 1942 को वायसराय लार्ड लिनलिथगो को लिखे पत्र राष्ट्रवादी भारत की भावनाओं और आकांक्षाओं का सही चित्रण करते हैं।'' ये पत्र मुखर्जी की 'डायरी' में प्रकाशित हैं। ' भारत छोड़ो Ó आन्दोलन के कालजयी आह्वान के कुछ पहले, 26 जुलाई को लिखे उसी पत्र में मुखर्जी ने बंगाल के गवर्नर को लिखा था ''मुझे आपको उस सम्भावित स्थिति का बयान करने दीजिए जो प्रदेश में कांग्रेस द्वारा चालू किए गए व्यापक आन्दोलन के कारण उत्पन्न हो सकती है। जो 6विश्व8 युद्ध के दौरान जनभावनाएं भड़काता है जिससे कि आंतरिक गड़बड़ी या असुरक्षा उत्पन्न हो। उसका मुकाबला फिलहाल काम कर रही सरकार द्वारा दृढ़तापूर्वक किया जाना चाहिए।'' मधोक के अनुसार ऐसा पत्र ''राष्ट्रवादी भारत की भावनाओं और आकांक्षाओंÓÓ का सही चित्रण करता है?

जिन्ना और हिन्दू महासभा का लक्ष्य कांग्रेसी आन्दोलन को कमजोर करना था। पट्टाभि सीतारमैया  रहस्योद्घाटन करते हैं, ''हिन्दू महासभा सिंध में मुस्लिम लीग के साथ साझा सरकार में थी। सिंध विधानसभा ने पाकिस्तान की मांग करते प्रस्ताव पारित किया। हिन्दू महासभा के मंत्रियों ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा नहीं दिया। केवल रिकार्ड पर विरोध किया।'' यह चरित्र है हिन्दू महासभा का जिसके कार्यकारी अध्यक्ष मुखर्जी थे। 1942 के आन्दोलन से ब्रिटिश शासन की चूलों के हिलने की बात ब्रिटेन के सम्राट किंग जॉर्ज छठवें की जीवनकथा के लेखक जे. डब्ल्यू. व्हीलर बैनेट लिखते हैं, ''1942 के उपद्रवों का दमन हो गया था। यह प्रकट हो चुका था कि अंग्रेजों की शक्ति और प्रतिष्ठा अभी ऊंची थी, परन्तु निश्चित रूप से वे खतरे में पड़ गए थे। यह प्रकट हो चुका था कि लोगों के समूह को आसानी से उत्तेजित किया जा सकता था। देश के बड़े बड़े हिस्सों में व्यवस्थित शासन का संचालन असम्भव हो गया था।'' यह भी लिखा था ''भारत में हमारा शासन गलत बात है और यह भारत के लिए कभी भी अच्छा नहीं था।'' यह तस्वीर है हिन्दू महासभा के उस इरादे की जो श्यामाप्रसाद मुखर्जी के कार्यकारी अध्यक्ष रहने की अवधि में भी पकती रही थी।