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दृष्टिहीन पोते की जिंदगी में शिक्षा की रोशनी लाने हाथ थामे ज्ञान केंद्रों तक रोज जाती है दादी

Date : 07-Aug-18

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आज भी हाथ पकड बूढ़ी दादी कालेज ले जाती है और क्लास पुरी होने के बाद एक दुसरे का हाथ थामे घर वापस आते है दृष्टिहीन होने के बावजूद भी दुष्यंत में अपने परिवार के लिए कुछ करने का हौसला देखकर दादी ने भी उसकी पढाई में कमी नही की है। आज भी हाथ पकडकर कालेज ले जाती है और क्लास पुरी होने के बाद दादी और पोता एक दुसरे का हाथ थामे घर वापस आते है।दुष्यंत ने बीए से स्नातक कर लिया, अब उसे रोजगार की तलास है मगर रोजगार नही मिलने से परेशान । दुश्यंत ने 10 वी में 73 प्रतिशत 12वीं में 69 प्रतिशत और 57 प्रतिशत के साथ स्नातक कर लिया है।

कोण्डागांव (नवप्रदेश)

शासन की योजनाओं पर तब उंगलियां उठती है जब हितग्रहियों तक उसका लाभ न पहुंच सके व लाख दावे करने के बावजूद हितग्राही अपने मूलभूत सुविधाओं व  शासन से मिलने वाले लाभ को पाने भटकता रहे।  बेहतर होगा जिन विभागों से सरकारी योजनाएं गांव के अंतिम व्यक्ति तक जानी है पहले उस विभाग में बैठे सरकारी नुमाइन्दे अपनी जिम्मेदारियों को समझ केवल योजनाओ पर खाना पूर्ति न कर वास्तविक  जरूरतमंद तक योजनाओ का लाभ पहुंचाने की कोशिस करे।

अगर विभागीय अधिकारियों कर्मचारियों की मंशा साफ़ होती तो 70 वर्षिय बूढ़ी काया को अपने दृष्टिहीन पोते को पढ़ाने-लिखाने उसकी काबिलियत को  निखारने में शायद इतनी जहोद्दत नही करनी पड़ती। आज उसने कठिनाइयों परेशानियों का सामना करतेअपने दृष्टिहीन पोते को स्नातक करवा दिया, लेकिन बूढ़ी दादी को अपने पोते की परेशानी और लाचारी से ज्यादा सिस्टम की नाकामी व बहरे पन से नाराजगी है, जिसने लाख फ़रियाद के बावजूद किसी प्रकार से मदद नही पहुंचाई जो साबित करता है कि अधिकारी केवल शासकीय योजनाओं के खाना पूर्ति तक ही सिमट कर रह गए है। जिले में दर्जनों एनजीओ सक्रिय दिखते है सामाजिक संस्थाओं की लंबी कतार है,लेकिन लगता है सिर्फ सरकारी योजनाओ का लाभ औऱ सुर्खिया बटोरने के लिए।शहर में ही रह रही एक  मजबूर व जरूरतमंद  परिवार पर किसी की नजर नही गई या विभागों की तरह समाज सेवियों ने भी देख कर अनदेखा कर दिया। मगर बूढ़ी दादी का हौंसला नही टूटा है चार सदस्यी अत्यंत गरीब परिवार में आर्थिक स्थिति ठीक नही होने के चलते एक भाई ने पढा़ई छोड़ी तो बहन भी आर्थिक तंगी की वजह पढ़ाई से वंचित  हो रही है । 14 वर्ष के भाई व एक छोटी बहन की जिम्मेदारी भी बूढ़े कांधो पर है। दुष्यंत की माता का निधन 2009 में तो पिता भी 2017 में साथ छोड कर चल बसे, पिता के मौत के बाद से परिवार चलाना मुश्किल हो गया नेत्रहीन पोते के साथ परिवार को दादी ने अपने वृद्धा पेशंन से व सरकारी योजना से मिल रहे चावल से जैसे तैसे संभाल लिया। अब हालात बहुत खराब है । 60 डीसमील कृषि भुमी तो है मगर उसे  कमाने वाला कोई नही है ।

दुष्यंत की अपनी 12 वीं तक की पढाई समाज कल्याण विभाग की मदद से पुरी हो सकी  लेकिन आगे कालेंज के लिए विभाग से कोई मदद नही मिलने के चलते  स्वयं के पेशंन व दादी के  पेंशन से अभावों के बीच पुरी कर ली है। कई बार  नौकरी पाने  आवेदन किया मगर दुश्यंत का कहना है की हर जगह कम्प्युटर की डिग्री मांगते है। जो मेरे पास नही है , कम्प्युटर कोर्स भी करना चाहता हु मगर यंहा नेत्रहीनों के लिए कम्प्युटर र्कोस का कोई सेन्टर नही है। 

शासन प्रशासन से नही मिल रही मदद भले ही नेत्रहीन मुखबधिर विकलांगो के लिए  सरकार ने दर्जनों योजनाये बनायी हो मगर उसका कितना लाभ मिलता है ये दुश्यंत के संघर्ष को देख कर समझा जा सकता है। शासन प्रशासन के आला अधिकारियों से लेकर विधायक मंत्री तक से मदद की गुहार लगा चुका दुश्यंत की इच्छा  अब प्रधान मंत्री से मिल अपनी  व्यथा सुनाने की है। जिससे अब वह अपने परिवार का सहारा बन सके अपनी बूढ़ी दादी के सपनो को सच होता देख सके।