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रचनाएँ

 कहा था न बहुत बार भूल जाती हूँ

कहा था न बहुत बार भूल जाती हूँ

कहा था न बहुत बार भूल जाती हूँ सब कुछ तेरे जाने के बाद तेरे आने के बाद भी पर इस बार बहुत याद आये तुम आने से पहले भी  जाने के बाद भी। नीलिमा शर्मा

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 दुनिया की भीड़ से जब भी फुर्सत मिले

दुनिया की भीड़ से जब भी फुर्सत मिले

दुनिया की भीड़ से जब भी फुर्सत मिले  दो पल पास मेरे बैठना तब तुम्हे समझाएंगे हम कैसे होता है तेरे बगैर मेरा किश्तों में मुस्कुराना...!!निशा रावल

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 व्यवस्थाओं का जन्म घोर

व्यवस्थाओं का जन्म घोर

व्यवस्थाओं का जन्म घोर अव्यवस्थाओं से ही तो होता आया है कुछ थोड़ा पतित  पर नही घृणित बस ..बीज व्यवस्थाओं के अव्यवस्थाओं में ही जानो करो संघर्ष तो निश्चित ही होगा उत्कर्ष ऐसे ही बनती है संसार की श्रेष्ठतम व्यवस्थाएं। मधुलिका शुक्ला

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 ओ अनंत पथ के मुसाफिर

ओ अनंत पथ के मुसाफिर

ओ अनंत पथ के मुसाफिर, जाना कहाँ रूकना कहाँ पल भर का साथ सबका, अपना - पराया कौन यहाँ .. साथ चलते ,हँसके मिलके साथ सब ही जायेगे  कौन जाने किस दिशा में कब विदा हो जायेगें .. बांट ले तू दर्द सबके स्नेह की गठरी बांध ले  तेरे लंबे...

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तब मैं कहीं और होती हूँ

तब मैं कहीं और होती हूँ

तब मैं कहीं और होती हूँ सुनो जब तुम मुझ से बात करते हो न मैं उस लम्हें को  क़ैद कर लेती हूँ मैं उसमें जीने लगती हूँ  मरने लगती हूँ मंजि़ल -ए-ख़ुश्बू मुझे आगे बढऩे को कहती है और मैं उसमें डूबने लगती हूँ अचानक वो लम्हा मेरी मु_ी...

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दल बदलू अवसरवादी सारे

दल बदलू अवसरवादी सारे

दल बदलू अवसरवादी सारे सक्रिय हो रहे हैं जनता से कर झूंठे वादे देखो कैसे फूल रहे हैं सभी जीत का दम भरेंगे कोई किसी से नहीं डरेंगे अपनी बढाई खूब करेंगे लाव लश्कर साथ चलेंगे नेताजी के घर है रौनक जैसे आये कोई त्यौहार चाय नाश्ते से सजती है...

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दल बदलू अवसरवादी सारे

दल बदलू अवसरवादी सारे

दल बदलू अवसरवादी सारे सक्रिय हो रहे हैं जनता से कर झूंठे वादे देखो कैसे फूल रहे हैं सभी जीत का दम भरेंगे कोई किसी से नहीं डरेंगे अपनी बढाई खूब करेंगे लाव लश्कर साथ चलेंगे नेताजी के घर है रौनक जैसे आये कोई त्यौहार चाय नाश्ते से सजती है...

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 मेरी आंखों में नमी भरने लगीं

मेरी आंखों में नमी भरने लगीं

जि़न्दगी को जि़न्दगी छलने लगी मेरी आँखों में नमी भरने लगी । मुफलिसी के दिन नहीं बीते अभी देखकर कि़स्मत मुझे हँसने लगी। जब कभी अच्छे दिनों की बात हो क्यूँ मुसीबत साँप बन डँसने लगी। हौसले बढऩे लगे जब रोज़ तो खुद ब खुद मंजि़ल मुझे मिलने लगी। या...

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 तुमसे मिलकर हर दिन सुहाना लगता

तुमसे मिलकर हर दिन सुहाना लगता

तुमसे मिलकर हर दिन सुहाना लगता है तेरी रहमतों का यह दिल दीवाना लगता है सुकून मयस्सर नहीं है दीदारे यार के बाद आजकल. लफ्ज़ों का मेरे अंदाज शायराना लगता है। सीमा भाटिया 

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 उसकी निगाहों से पढ़कर ही लिख

उसकी निगाहों से पढ़कर ही लिख

उसकी निगाहों से पढ़कर ही लिख देती हूँ मैं टेड़े मेढे से अक्षर और वो पगला इतना भोला है कि वाह वाह करने लग जाता है उसको अभी तक पता नही लगा कि मैं नकल मार रही हूँ। नजरों में से उसकी...!! रितु शर्मा

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तीजा के है करू करेला

तीजा के है करू करेला

तीजा के है करू करेला , मायके के है प्यार ,भूख प्यास भी लगे नही जब अपन होथे पास,तीजा के उपास मा मायके के होथे आशीर्वाद l

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 चंद ख्वाब तारों से थे मै भी

चंद ख्वाब तारों से थे मै भी

चंद ख्वाब तारों से थे मै भी परियों की रानी थी मैने भी नानी दादी के मुँह से सुनी कहानी थी रेत हाथ लग गई हकीकत महल बना जब पानी में रौद-रौद मिट्टी को तब से अपनी किस्मत सानी थी---!! नीरू श्रीवास्तव 

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 सवर्णों के मान-सम्मान की

सवर्णों के मान-सम्मान की

सवर्णों के मान-सम्मान की कीमत पर दलित वोटों की रोटी सेंकने वाले, एससी-एसटी एक्ट पर उच्चतम न्यायालय को ठेंगा दिखाने वाले, आरक्षण को हमेशा बनाये रखने की कसम खाने वाले अब एक अरब हिंदु जनसंख्या को 18 करोड़ मुसलमानों का भय दिखा रहे हैं । 18 करोड़ एक अरब से...

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जब तराजू इंसाफ का

जब तराजू इंसाफ का

जब तराजू इंसाफ का उस ऊपरवाले के हाथ है घबराना मत मेरे दोस्तों, वो मज़लूमो के साथ है मुश्किलें मांगती माफी मुश्किल-कुशा के बन्दों से मौला का हो करम मुश्किलों की क्या औकात है दिन रहते नही एक से, उस पर जब भरोसा है आफ़ात उसी ने दी उसने ही...

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 दिन के हर सफ़हे को

दिन के हर सफ़हे को

दिन के हर सफ़हे को पलट पलट के देखा  सारी शाम को खरोंच खरोंच के देखा सारी रात को उधेड़ कर रख दिया हैरत मैं हूँ तुम कहीं नहीं मिले नाराज़ हो क्या ?कल्पना पाण्डेय 

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दरमियां दिल के  है दूरी, तो

दरमियां दिल के है दूरी, तो

दरमियां दिल के है दूरी, तो कम करने चले आओ इनायत ना सही हम पर , रहम करने चले आओ सितम वो धूप बारिश के , बड़ी मुश्किल से झेले है सितंबर आ गया तुम भी ,सितम करने चले आओ।एक कवि विवेक चौहान

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 तीजा लेगे बर आही

तीजा लेगे बर आही

तीजा लेगे बर आही भइया सोर-संदेशा आगे, बड़े फजर ले कौंवा आके कांव-कांव नरियागे, साल भर ले रद्दा जोहत हौं ये भादो महीना के पोरा पटक के जाबो मइके जोरन सबो जोरागे। कवि सुशील भोले

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 प्रयत्न करने से कभी न

प्रयत्न करने से कभी न

प्रयत्न करने से कभी न चूकें..! हिम्मत नहीं तो प्रतिष्ठा नहीं, विरोधी नहीं तो प्रगति नहीं..! जो पानी में भीगेगा वो सिर्फ लिबास बदल सकता है लेकिन जो पसीने में भीगता है वो इतिहास बदल सकता है. सपना दुबे आचारी

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 सहेज लेती हूं  फेसबुक

सहेज लेती हूं फेसबुक

सहेज लेती हूं  फेसबुक पर हर अनकहें एहसास को लफ्जो की चादर मे लपेट कर ये वो जिंदगी की हमसफर डायरी है जो ताउम्र मेरी यादों को संजोए हुए है. हर दिन रूबरू कराती है मुझे मेरी अविस्मरणीय यादों से. अनमोल यादों की धरोहर जतन से संजोए हुए है। किरन...

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 नेकी तेरे बन्दों को जब लगने लग

 नेकी तेरे बन्दों को जब लगने लग

नेकी तेरे बन्दों को जब लगने लगे बदी ईमान धरम छोड़ तब इंसानियत चली ओ बेरहम तू मुझ पर कोई रहम न कर ईमान से जिन्दा हूँ मै और मेरी रहबरी! नीरू  श्रीवास्तव

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 इश्क से रोशन है कायनात मेरी

 इश्क से रोशन है कायनात मेरी

चिरागे इश्क से रोशन है कायनात मेरी, मोहब्बत के हंसी लम्हों सी है हयात मेरी, इबादत के रूहानी रिश्तों का मैं नामावर, तभी तो शेर ओ सुखन की है ये जमात मेरी ! कुलदीप मिश्रा

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 आहिस्ता से बदलने लगा है

 आहिस्ता से बदलने लगा है

बदहाल इस चमन का कोई तो इलाज होगा, मेरे वतन में यारो कभी तो सुराज होगा। कितनी मदद मिलेंगी अमीरों के द्वारा हमको, सबसे बड़ा जहां में ख़ुदा ही नवाज़ होगा। आहिस्ता से बदलने लगा है हमारा कल्चर, घर अपने भी, भविष्य में क्या क्या रिवाज़ होगा। गो उनकी बेवफ़ाई...

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 सुनने की नाकाम कोशिश

 सुनने की नाकाम कोशिश

 खामोश सी आहिस्ता आहिस्ता सरकती गहरी काली रात... मौन नीरवता के साम्राज्य में बरसों के पसरे पड़े सन्नाटे में लिपटी गहरी काली रात.... पत्तों के फड़़कने पर धड़कती छाती से साँसें रोककर आहट को सुनने की नाकाम कोशिश करती गहरी काली रात... थरथराते होंठ कंपकंपाता बदन विद्युत सी सिहरन में...

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यूं जलाओ तुम बहाना

यूं जलाओ तुम बहाना

न दिल को यूँ जलाओ तुम बहाना छोड़ दो आँसू, ये बेगानों की दुनिया है यहाँ अपने नहीं मिलते। न ख़ुद को अब सताओ तुम लगाकर दिल किसी से यूँ, यहाँ नफऱत के कीचड़ में कमल दिल के नहीं खिलते। अंजना सिंह सेंगर

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 रात को ढूँढता रहा

 रात को ढूँढता रहा

प्रात: सूरज सुनहरे वस्त्रों में आकर दरवाज़े पर जब दस्तक दिया तो रात धीरे से सितारों को समेटने लगी और चाँद को भी तोड़कर अपने झोले में डाली अंधेरे की चटाई लपेटकर बगल में दबाई और दबे पाँव पीछे के दरवाज़े से नीचे की ओर खिसक ली । सूरज जश्न...

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 ख्वाब कितने अधूरे थे ख़ुश 

 ख्वाब कितने अधूरे थे ख़ुश 

ख्वाब कितने अधूरे थे ख़ुश हूँ ये सब अपने थे जो कुछ है वो सब मेरे थे जो नही है वो बस सपने थे मेरा होना ही सब तेरे थे अब नही हो वो दफऩ थे। प्रीति श्रीवास्तव

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हो काश यह की कोई 

हो काश यह की कोई 

हो काश यह की कोई आस कुछ ऐसे संवर जाए , मेरी किस्मत तेरी बद्दुआओ से आगे निकल जाए आफरीन हो जाए मेरी जिंदगी का कोना-कोना, मेरी जिद है कि अब मेरी दास्तान बदल जाए।  नमन भल्ला  

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किसी भी शख्स को 

किसी भी शख्स को 

किसी भी शख्स को शख्सियत बनने के लिए सर्वप्रथम विचार और फिर उस विचार को कार्यान्वित करना पड़ता है ... ऐसे ही महान थे प्तअटल जी ... विचार और कर्म का अनोखा संगम ..... नि:शब्द हूँ... शत-शत नमन। तनु युग भारद्वाज

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आज फिर एक तारा

आज फिर एक तारा

आज फिर एक तारा टूट गया। एक अपना फिर से छूट गया। आँसू बह रहे निरंतर आँखों से भाग्य ये कैसे हम से रूठ गया। संध्या चतुर्वेदी

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 रो पड़ा आसमान,  झुक गयीं डालियाँ

 रो पड़ा आसमान, झुक गयीं डालियाँ

रो पड़ा आसमान, झुक गयीं डालियाँ चाँद भी छुप गया, सोई परछाइयाँ। बह रही अश्रुधार, रुँध गयी आवाज़ छा रही चहुँ ओर कैसी तनहाइयाँ। वो गीत, वो गज़ल हो गये खामोश दे गये वो जहां को अपनी रुबाइयाँ। राजनीतिज्ञ, कवि, वक्ता, पत्रकार थे शांत और सरल, न थीं रुसवाइयाँ। कर्म...

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नि:शब्द हूँ आज

नि:शब्द हूँ आज

नि:शब्द हूँ आज, शत शत नमन,अपने नाम की तरह अटल,सदा हमारे दिलों में राज करते रहेंगे, कल तक जो था जमीं का सितारा, आज फ़लक भी गुमां करता होगा।  किरन शोभाप्रीत

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मौत खड़ी सर पर मेरे 

मौत खड़ी सर पर मेरे 

मौत खड़ी सर पर मेरे इंतजार में..थी ना झुकेगा ध्वज मेरा 15 अगस्त के मौके पर तू ठहर इंतजार कर लहराने दे बुलंद इसे मैं एक दिन और लड़ूंगा मौत तेरे से मंजूर नही है कभी मुझे झुके तिंरगा स्वतंत्रता के मौके पे? कोटि कोटि नमन। भारत रत्न वाजपेयी जी।...

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 एक द्रौपदी ने जन्म लिया

 एक द्रौपदी ने जन्म लिया

एक द्रौपदी ने जन्म लिया न जाने कितने दुर्योधन पैदा हो गये दु:शासन आज भी साड़ी खीचने मे जुटा हैं राजसभा आज भी जमी धृतराष्ट आज भी अंधा है बैठे है धर्मग्य मठाधीष हैं वही भीष्म पितामह, विदुर, व्यास सत्ता के मद मे चूर कौरव तिलमिला रहे हैं पांडव शश्त्रहीन,शब्दहीन...

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 कल बरस रहा था सावन

 कल बरस रहा था सावन

कल बरस रहा था सावन तेरे रेशमी अहसास का, संदली साँसों की छुअन का, महकते जज़्बात का भीग रही थी मैं रूह तक तेरे शाने पर सिर रख उतर रही थी तेरी धड़कनो तक खुली आँखों से बुन रही थी मखमली ख्वाब ख्वाब.....भूल गई थी कि अक्सर रह जाते है...

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  कभी है ओज की कविता 

  कभी है ओज की कविता 

कभी है ओज की कविता कभी है हास के मुक्तक। कभी श्रंगार की गज़़लें कभी परिहास के मुक्तक। चुराया जा रहा है आजकल कविता के मंचों पर- कभी हरिओम की कविता कभी विश्वास के मुक्तक।  राहुल कुम्भकार

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 किरदार निभाता है मानव

 किरदार निभाता है मानव

किरदार निभाता है मानव इस अद्भुत नाटकशाला में, अमिय पिलाता कभी स्वयं को कभी निमग्न गरल-प्याला में। विश्वास-छलावा, मिलन-विरह, पाप-पुण्य औ वन्दन-क्रन्दन- अनुभव के मनके गूँथ रहा, नित जिजीविषा की माला में। शुभा शुक्ला मिश्रा 

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 झील के झीने आंचल

 झील के झीने आंचल

झील के झीने आंचल में बिखरी तेरी रौ है नभ के तारे सी. भिगो दे एकबार जो तू अपनी चांदनी मे. नीरस अमावस यह जीवन पुलकित हो जाए पूनम सी। कुमुद रंजन झा

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 उसूले इश्क में उन 

 उसूले इश्क में उन 

उसूले इश्क में उन बेवफाओं का क्या कहिए,वादा किया था अजल तक साथ निभायेंगे अब हिज्र में तड़पता छोड़कर मुझे, मेरे अरमानों की खाक पर जश्ने जीस्त मनायेंगे।  डेज़ी जायसवाल

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 काँग्रेस अगर अपने घोषणा 

 काँग्रेस अगर अपने घोषणा 

काँग्रेस अगर अपने घोषणा पत्र मे इतना बोल दे कि हमारी सरकार आने पर अम्बानी , अडानी के व्यापार बन्द कर देंगे तो मै उनके साथ? सनद् रहे 2014 के पहले ये दोनो दस जनपथ पर भीख माँगते थे? अम्बर दानी

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 दूर तक नज़ऱों में पहले

 दूर तक नज़ऱों में पहले

दूर तक नज़ऱों में पहले -आसमाँ ऐसा न था, दिल जला सौ मर्तबा लेकिन -धुआँ ऐसा न था, जब कभी भी हम मिले -थे आइने से रूबरू अश्क से इस कद्र दर्दे-खूँ-चकाँ ऐसा न था। वंदना मोदी गोयल

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 बारिश कैसी लगती है 

 बारिश कैसी लगती है 

बारिश कैसी लगती है उनसे पूछो जिनके घर पन्नी के बने होते है। चारों तरफ से पानी घुसता है कही बैठने की जगह नही होती है सारा सामान एक पट्टे पे ईंटे से ऊँचा करके रखा होता है। कंचन श्रीवास्तव

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 साजि़शें बारिशों की भी अजीब 

 साजि़शें बारिशों की भी अजीब 

साजि़शें बारिशों की भी अजीब होती हैं ! किसी को राहत तो बर्बादी किसी की होती है ! महल हँसते हैं जश्न भी मनाते बरसने पर इसके! बिखरकर झोपडियाँ सभी गज़़ल दम तोड़ देती हैं।  सविता वर्मा गज़़ल

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 तुम्हारी याद आती है 

 तुम्हारी याद आती है 

तुम्हारी याद आती है तो आँखें भीग जाती हैं दर्द इतना मिलता है कि साँसें भीग जाती हैं तेरे एहसास की खुशबू दिल में मेरे है यारां तेरा जिक्र करती हूँ तो बातें भीग जाती हैं। कात्यायनी सिंह

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 तुझे गर देख लूं मैं

 तुझे गर देख लूं मैं

तुझे गर देख लूं मैं तो खुदाई भूल जाता हूँ गिले शिकवे शिकायत सब दुहाई भूल जाता हूँ मुझें मालूम है तेरा मिरा मिलना नही मुमकिन मगऱ फिर भी मसाफ़त की जुदाई भूल जाता हूँ। कवि जतिन फैजाबादी

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रिश्ते अंकुरित होते हैं

रिश्ते अंकुरित होते हैं

रिश्ते अंकुरित होते हैं प्रेम से, जिन्दा रहते हैं स्नेह-संवाद से, महसूस होते हैं संवेदनाओं से, निभाये जाते हैं दिल की गहराईयों से, मुरझा जाते हैं गलतफहमियों से, और बिखर जाते हैं अहंकार से। नीलकमल वैष्णव

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 ये जो मोहब्बत है जनाब

 ये जो मोहब्बत है जनाब

ये जो मोहब्बत है जनाब, ये करनी नहीं पड़ती, राह चलते किसी से ये नजरें यूँ ही नहीं लड़ती। किस्मत में लिखा होता है तन्हा रातों में जगना, वरना मिलकर मोहब्बत कभी नहीं बिछड़ती। डॉ सुलक्षणा

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आब तेरे कितने हैं रंग

आब तेरे कितने हैं रंग

आब तेरे कितने हैं रंग रुत बदली और बदले ढंग जिस्म जिस्म बनता ये तुझसे रस्म रस्म पर स्वाद सुगंध आब तेरे कितने हैं रंग। प्रियंवदा अवस्थी

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 कभी तुम्हारे रूप को 

 कभी तुम्हारे रूप को 

कभी तुम्हारे रूप को कभी तुम्हारे बिम्ब को साथ मैं पाती रही हूँ आंसू जो आते आंखों में मेरे चुपके से अकसर बिन कुछ जताए पोंछ जाते हो तुम अस्तित्व में मेरे गहरे से यूं पैंठ जाते हो तुम! सरिता खोवाला

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 मेरा वज़ूद, मेरी पहचान कहाँ

मेरा वज़ूद, मेरी पहचान कहाँ

 मेरा वज़ूद, मेरी पहचान कहाँ है, ज़मीं तो है, पर आसमान कहाँ है, फडफ़ड़ा रहे हैं हौसलों के पंख, आज़माने को, इम्तिहान कहाँ है, हाथ बढ़ा रहा है खौफ ज़माने का, पकड़ तो लूँ पर गिरेबान कहाँ है, वो तो सोच थी जो बुरा कह गयी, वरना मेरे मुंह में...

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खुद को भूल कर

खुद को भूल कर

  खुद को भूल कर खुद को ही जानने निकलती हूँ मैं ... पर न जाने कैसी है विडम्बना मेरे अस्थिर विचलित मन की .... कोई पहलु ही स्थिर हो मुझे मिलने नही देता मेरे अस्तित्व की परछाई से।  मैं अपराजिता मनीषा

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 अजब है दास्तां दिल

 अजब है दास्तां दिल

अजब है दास्तां दिल की बयां कैसे करे कोई... किसी को सब मयस्सर है किसी ने जान तक खोई...! कहीं पर जलजला तो पड़ रहा सूखा कहीं पर है... अति दोहन ज़मीं का जब हुआ कुदरत भी है रोई.! नीलोफर नीलू

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 कल न हम होंगे न कोई गिला

 कल न हम होंगे न कोई गिला

कल न हम होंगे न कोई गिला होगा, सिर्फ सिमटी हुई यादों का सिललिसा होगा, जो लम्हे हैं चलो हँसकर बिता लें, जाने कल जिंदगी का क्या फैसला होगा। लालचंद वैष्णव

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 ख्वाहिशो मे जी कर देखा मैंने 

 ख्वाहिशो मे जी कर देखा मैंने 

ख्वाहिशो मे जी कर देखा मैंने, हर ख्वाहिश की ताबिर नहीं होती, टूट कर बिखर जाते है वो रिस्ते, जिनकी कोई जंजीर नहीं होती, संभल कर अक्सर गिर जाते है वो लोग, जिन्हे चलने की तमिज नही होती, अपने दर्द को छुपाने का हूनर सीख लो, जमाने की नजर कभी...

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 एक ख्वाब अधूरा सा पर कुछ

 एक ख्वाब अधूरा सा पर कुछ

एक ख्वाब अधूरा सा पर कुछ कुछ पूरा सा.. मिलन की एक सुरमई हसीन शाम होठों पर हो बस महबूब का नाम... कुछ एहसास मन में लपेटे हुए कुछ रंगीनियां आंखो में समेटे हुए... बैठे रहें एक दूसरे में और पास हो बस कुछ खामोश से लम्हें और दूर तक...

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 तेरे हक़ में क़ुबूल होती

 तेरे हक़ में क़ुबूल होती

तेरे हक़ में क़ुबूल होती रही, मेरी हर दुआ देखो .. दर्द की इन्तहा इसकदर, रोता रहा खुदा भी आसमां में, पत्तों पे शबनम के निशां देखो. सोना निगम सरन

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 यदि समाज में आप

 यदि समाज में आप

यदि समाज में आप को सम्मान मिलता है तो आप को नहीं आप के गुणों को मिलता है और यदि अपमान भी होता है तो आप के गुणों का ही होता है. इसलिए समाजिक प्रतिष्ठा और उन्नति के लिए हमेशा अपने आप में सद्गुणों का विकास निरन्तर करते रहें।  विजय...

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 कोई ना रोके आज हमें 

 कोई ना रोके आज हमें 

कोई ना रोके आज हमें तन बदन को बहक जाने दो जिस्म का कहाँ होश हमे श्याम खुद मे खो जाने दो। वावरी हो जाने दो हमे थोड़ी बेगैरत हो जाने दो। प्रीति श्रीवास्तव

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 बड़ा प्यार है उन्हें 

 बड़ा प्यार है उन्हें 

बड़ा प्यार है उन्हें अपने पहले प्यार से, वो दूजे संग वादे निभाते भी है तीजे से तो एतराज ही नही उन्हें और चौथा आए तो भी इंतजार है सबकों खुद ही बताते भी है,. सारे जग की जगह है दिल मे साहब वफा निभाते भी है। वर्षा गुप्ता

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ये दबदबा, ये हुकूमत

ये दबदबा, ये हुकूमत

ये दबदबा, ये हुकूमत, ये नशा, ये दौलतें... सब किरायेदार हैं, घर बदलते रहते हैं.. मुस्कुराहट, अपनापन, स्वभाव ये सब अपने है.... इनसे ही हम सब फलते फूलते है। रश्मि चौधरी

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 पाप पुण्य का हिसाब

 पाप पुण्य का हिसाब

पाप पुण्य का हिसाब वो अब जताने लगे हैं, कांवडिय़ों के वेश में नेता नजर आने लगे हैं । बदलते मौसम की बात श्रावणी बोलबम साज, चुनाव का डर भी उन्हें आजकल सताने लगे हैं । सुरेश वैष्णव

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चाहने वाले भी गर दे 

चाहने वाले भी गर दे 

चाहने वाले भी गर दे दगा किसी सूरत में तू न होना खफ़ा जीवन की नि:सारता से आगे बढऩे का इसे भी इक उपक्रम समझना । जो दिल के करीब है वो इसे तोड़ेंगे भी मोह के बंधन जितनी जल्दी टूटे उतना अच्छा। राजीव वर्मा

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एक चुटकी इश्क़...

एक चुटकी इश्क़...

एक चुटकी इश्क़... एक टोकरी यादें.. दामन भर वफा... आस्मां से तुम और तुम्हारा नीलापन पैबस्त हो गया मुझमें... अब सब कुछ नीला ही नीला फैला हुआ इश्क़ भी कभी संवरा हुआ होता है। आभा चन्द्रा

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 टीवी डिबेट्स में अब 

 टीवी डिबेट्स में अब 

टीवी डिबेट्स में अब विषय की योग्यता हो न हो पर जुडो कराटे, ताइक्वांडो आदि आना आवश्यक होना चाहिए। गालियों का क्रेश कोर्स किया हो तो आप सबसे पहले बुलाये जायेंगें। संगीता गांधी

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मोल-तोल का भाव है

मोल-तोल का भाव है

मोल-तोल का भाव है ,नहीं हृदय में मान। नहीं बरसता प्रेमरस, लगे नहीं अनुमान। आंसू बरसे मेघ सम ,भीग गए दिन रैन। गुपचुप पीना सीख मन ,तभी मिलेगा चैन। आंसू तो ऐसे बहे ,जैसे गंगा नीर। मत कहना किसी और से ,समझ न सकते पीर। आंसू तो वश में नहीं...

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 मिट्टी से बनी हैं, जीवन की गागर

 मिट्टी से बनी हैं, जीवन की गागर

मिट्टी से बनी हैं, जीवन की गागर, आशा-निराशा में, उलझता मन, सहरा में भटकता हैं, तिश्नगी असीम हैं ... तुझसे मांगू , दुआ मैं क्या जुबां मेरी खामोश है, जर्रे- जर्रे में हैं तू मेरी धड़कनों में शामिल हैं.... मेरी गागर में भी तू हैं , मेरी तिश्नगी में तू...

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दाद देता हूँ तेरी अक्ल

दाद देता हूँ तेरी अक्ल

  दाद देता हूँ तेरी अक्ल को, दुश्मनी से मारना मुमकिन न था कितनी आसानी से अंजाम दिया तुमने मोहब्बत के खेल में। डा.फतेह सिंह भाटी

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आज मौसम कितना खुश 

आज मौसम कितना खुश 

आज मौसम कितना खुश गंवार हो गया... .खत्म...... सभी का इंतज़ार हो गया. बारिश की बूंदे गिरी कुछ इस तरह से. लगा जैसे आसमान को ज़मीन से प्यार हो गया. कल तक उड़ती थी चेहरे पर..आज पैरों से लिपट गयी. चन्द बूँदें क्या बरसीं बरसात की.धूल की फि़तरत ही बदल...

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 जानते हो न, मोम और

 जानते हो न, मोम और

  जानते हो न, मोम और पत्थर में क्या अंतर होता है? पत्थर टूटकर बिखर जाता है... और मोम...पिघल के भी जुड़ जाता है... तो सब मोम सा रखो ये अपना 'मन टूटा नहीं, पिघला करो बस। प्रेरणा त्यागी

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 वो तो गनीमत है कि 

 वो तो गनीमत है कि 

  वो तो गनीमत है की सदन में वोटिंग ईवीएम से नहीं होती वरना विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव पर मोदी सरकार को मिले बहुमत को भी ईवीएम से हुई छेडख़ानी के मत्थे मढ़ देता। भोमेश मोदी

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 दिल मेरा बेकऱार कब

 दिल मेरा बेकऱार कब

दिल मेरा बेकऱार कब तक है आपका इंतज़ार कब तक है मुझसे बेज़ार रहो श़ौक से पर ये बता दो कि प्यार कब तक है। निधि मुकेश भार्गव

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 धरा, अम्बर, नदी

 धरा, अम्बर, नदी

धरा, अम्बर, नदी, पर्बत सभी को बांट देतें है न जाने क्यों शिकारी पर हमारा कांट देतें है विवशता ने हमारी है हमें जुगनू बनाया पर अंधेरी रात में जल हम अंधेरा छांट देतें है। कवि जतिन फैजाबादी

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 मेरे आस पास की औरते?

 मेरे आस पास की औरते?

होठों पर मुस्कान धरे नसीबो पर नहीं जीती रोटी से ज्यादा हवा पानी लेती है... शायद धुआँ धुआँ सुलगती हुई राख राख बिखरती हुई दहकें शोलो पर चटर पटर बतियाता सी भुट्टा होती है... शायद पीटी पिटाई, दर्द पर मुस्कान चिपका निपटा कर बखूबी घर के काम हँसती है रोज...

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एक दीवाना दे गया है दुनिया

एक दीवाना दे गया है दुनिया

एक दीवाना दे गया है दुनिया को अनमोल निशानी, जब तक सांस चली सीने में तब तक जिंदा रही जवानी। सौंप गया अनमोल धरोहर लिखकर कोरे पन्नों पर, भूल सकेगा क्या ये जमाना प्यार भरे गीतो की रवानी, कौन पिरोएगा माला अब टांक के दिल जजबातों की, एक तेरे जाने...

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सरिता सागर को मीठा

सरिता सागर को मीठा

सरिता सागर को मीठा बनाने चली है, खातिर उसके वो हर आकार में ढली है। अब सागर तो सागर ही है सरिता को कौए बताए, खारापन उसका स्वभाव नहीं स्वाद है। बिट्टू पुरोहित

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पहले जैसे सड़क छाप 

पहले जैसे सड़क छाप 

पहले जैसे सड़क छाप मजनू जब तक थप्पड़ ना खाये तब तक प्रपोज करना नहीं छोड़ते थे, वैसे ही आजकल डिजिटल जमाने में इन्बोक्सिया आशिक ब्लॉक होने की हद तक प्रेमालाप करने में यकीन करते है....रिश्ता वही सोच नई। यूएस मिश्रा स्वप्निल

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 चाहे किसी भी मजहब के

 चाहे किसी भी मजहब के

चाहे किसी भी मजहब के हों, जो कट्टर मजहबी लोग भविष्य में सिर्फ अपनी और अपनी ही कौम को देश और दुनिया पर राज करते देखने का सपना पाले हुए हैं, क्या उनमें थोड़ी-सी भी इन्सानियत बची रह गई होगी ? क्या ऐसे लोगों के दिलो-ज़हन में दूसरे कौम के...

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 मन, उतरा है आज, विद्रोह 

 मन, उतरा है आज, विद्रोह 

मन, उतरा है आज, विद्रोह करने, नही देगा कोई विचार, कोई भाव, जिससे बने कविता, शून्य सा, अटक गया, न चंचल, न स्थिर, काजर की कोठरी सा, घुप्प अँधेरा, न आहट, न थाप कोई, सिर्फ सन्नाटा, चल रहा काली रात सा, निर्विकार, निस्तब्ध सा, नि:शब्द हो, असीम, भाव के आभाव...

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 आंखे मर्त सर्द हवाएं 

 आंखे मर्त सर्द हवाएं 

भीग रहा दर्द फ़टे -चिथड़े वस्त्र में जिस्म सिकोड़ती थरथराती आँखे मर्म सर्द हवाएँ चुभन करती हुई पलकों के कोर में रुकी नमकीन सी अश्क की चंद बूंदें चाँदनी की रोशनी में बेहद दुखता दर्द लिए ढल जाती हैं जब उभरते गालों में तब झुकी झुकी आंखें ठिठुरती हुई देह...

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आज भी इस ज़हीन दुनिया की भीड़

आज भी इस ज़हीन दुनिया की भीड़

आज भी इस ज़हीन दुनिया की भीड़, पत्थर मारती है उस पागल को,सुना है,आज भी वो पागल पागल फिरता है अपने जैसे एक पागल की तलाश में।  अनिल अनमोल शर्मा 

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 दोहरी मानसिकता वाले नियम जैसे मूल अधिकार

 दोहरी मानसिकता वाले नियम जैसे मूल अधिकार

दोहरी मानसिकता वाले नियम जैसे मूल अधिकार फिर ये बवाल सारा भारत एक है फिर धारा 370 धर्म निरपेक्षता फिर? एक तीर्थ में सब्सिडी और दूजे में तीर्थ सुविधा टेक्स सुविधा से याद आया माननीय को पेंशन और ? नवीन कुमार तिवारी 

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 इसको भूमि नही माँ कहा कीजिये

 इसको भूमि नही माँ कहा कीजिये

भारती से सदा ही वफ़ा कीजिए ! इसको भूमि नही,माँ कहा कीजिए! पालकर-पोसकर, है बनाया तुम्हे, इसका खाकर नमक,न दगा कीजिए! सुनिल शर्मा नील

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 हर एक पूछ रहा है बता

 हर एक पूछ रहा है बता

हर एक पूछ रहा है बता के तू क्या है, भाइयों में माजरा-ए-गुफतगू क्या है, मकसद एक दोनों का मगर रस्ते जुदा, हैं भटके दोनों न जानें मंजिल क्या है। शब्द मसीहा केदारनाथ

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कृपया दान धर्म ऐसा न

कृपया दान धर्म ऐसा न

कृपया दान धर्म ऐसा न करे कि आपकी हत्या हो जाये । बच्चों में चॉकलेट, बिस्कुट और भी चीजे बांटने से लोग आपको बच्चा चोर समझ कर आपके प्राण ले सकते है । बचिए ऐसे धर्म कर्म और दान से। डीएस अहलुवालिया

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उन सभी कारणों को भूल

उन सभी कारणों को भूल

  उन सभी कारणों को भूल जाएं कि कोई कार्य नहीं होगा। आपको केवल एक अच्छा कारण खोजना है कि यह कार्य सफल होगा। अरूणा राव

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 यही तो है कुछ दास्तां अजीब 

 यही तो है कुछ दास्तां अजीब 

यही तो है कुछ दास्तां अजीब होती है कदम- कदम चल पड़ते है हम वहाँ तक फिर वहीं से एक-एक कदम लौटना पड़ता है लौटने में दर्द का छलावा होता है और समेटना होता है अपने आप को समेटना शुरु... पर आसान नही है ये अपने आप से इन्द्रिय निग्रह...

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 बहुत हो गई देरी बेटे वापस

 बहुत हो गई देरी बेटे वापस

बहुत हो गई देरी बेटे वापस आजा ना .. पलकें बिछाये बैठी है माँ पल-पल तेरी राह देखे अब ना सताना.. टूट गई माँ तेरी साँसे थकने लगी झील बनी आँखे बस कर रूलाना आँचल मेरा पुकारे तुझे आजा इसके छांव तले अब न भटकना .. माँ की बांहे खोजे...

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जैसे एक घर बनाने

जैसे एक घर बनाने

जैसे एक घर बनाने के लिए हमें एक योजना की आवश्यकता होती है, वैसे ही जिंदगी बनाने के लिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि हमारे पास लक्ष्य के रूप में महत्वपूर्ण योजना आवश्य हो। सत्यम सिंह बघेल

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 आँखों में इक सवाल

 आँखों में इक सवाल

रात दिन इक मलाल अब भी है, आँखों मे इक सवाल अब भी है, साथ तुम हो नही सनम लेकिन, पर तुम्हारा खयाल अब भी है।।  गोविन्द शर्मा 

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 मैं कहाँ पर हूँ उसे कौन बता देता है 

 मैं कहाँ पर हूँ उसे कौन बता देता है 

मैं कहाँ पर हूँ उसे कौन बता देता है । जहाँ जाऊँ वहीं आवाज लगा देता है ।। अजीब शख्स है एक पल जुदा नहीं रहता । रात की नींद दिन का चैन उड़ा देता है।।  मनोज कुमार मून

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वो पीठ पीछे बोलने वाले लोग

वो पीठ पीछे बोलने वाले लोग

वो पीठ पीछे बोलने वाले लोग वो हाथ में नुकीली धार लिए लोग  कब कहाँ कैसे कुछ कर जाए असंख्य समस्या बना जाए कुछ कहा नहीं जा सकता! (पीठ पे वार)। पुष्पा त्रिपाठी 'पुष्प

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  बारिश में हल्की खुराक पानी सी होनी चाहिए

  बारिश में हल्की खुराक पानी सी होनी चाहिए

बारिश में हल्की खुराक पानी सी होनी चाहिए..  तेल तैरे पानी पर पकौड़ा तैरे तेल पर बस हल्का है पकौड़ा सबसे यही सत्य मानिए आनंद उठाने मौसम का यही पेट में डालिए। मंगलमयी मानसून....। अशोक मिश्रा 

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दोनों का संगम करे

दोनों का संगम करे

  सागर अरु संगीत का, चोली दामन साथ ।। लहरें दोनों खींचती, फैलाकर दो हाथ ।। कल-कल बहती हैं सदा, खुदी बनाकर राह, दोनों का संगम करे, नाथों के वो नाथ ।।  मिथलेश सिंह 

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 एक साथ देना तुम कुछ 

 एक साथ देना तुम कुछ 

एक साथ देना तुम कुछ नहीं चाहिए, बस... हो अगर दुविधा उलझन को सुलझाना, हो जाऊ परेशां ख्याल बन जाना, अश्क बहें तो वो रुमाल तू बन जाना आँधियों मे  छोड़ न जाना हाथ  दोस्ती बन आये हो सारथी बन जाना तुम, कहना बहुत कुछ शब्द जऱा कम है रो...

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 झिलमिल तारों की बगिया में

 झिलमिल तारों की बगिया में

शून्य गगन में खिला चंद्र यह, करता तारों से बातें। हाथ उठाये बाट जोहती, बीती यहाँ घनी रातें।। चाहत दिल में हरपल पाले, पास कभी वो आयेगा। झिलमिल तारों की बगिया में, लोरी मुझे सुनायेगा ।। मंद पवन हर्षाता मौसम, लोहित है धरणी सारी। नीलांबर है देखो सुंदर, मोहित मन...

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 कल कभी आता नहीं और आज

 कल कभी आता नहीं और आज

आज से बेहतर कुछ नहीं क्योंकि कल कभी आता नहीं और आज कभी जाता नहीं इसलिए स्वस्थ रहे मस्ते रहे और अपने काम में व्यस्त रहे।  हरिराम चोयल

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  पिता की सरपरस्ती में पलती हैं बेटियाँ

 पिता की सरपरस्ती में पलती हैं बेटियाँ

पिता की सरपरस्ती में पलती हैं बेटियाँ, थाम के अँगुली पिता की पहला कदम चलती हैं बेटियाँ, तकलीफ हो गर कोई तो पिता का संबल बनती हैं बेटियाँ,  जिन्दगी में संघर्ष का सबक पिता से ही सीखती हैं बेटियाँ।। तेरे बिन तेरे संग। मीना सोनी 

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 दर्द , अच्छा भला नही मिलता

 दर्द , अच्छा भला नही मिलता

दर्द , अच्छा भला नही मिलता। धूप में काफि़ला नही मिलता। लौट आती है खाली आवाज़ें। अब कोई रहनुमा नही मिलता। आज सब है पुजारी जिस्मों के। प्यार सच्चा यहां नही मिलता। भीड़ है इस ज़मी पे चहरो की। कोई दिल बावफा नही मिलता। किससे कहिएगा दिल की बेताबी। दर्द...

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 गुलदान सी महकती हूँ 

 गुलदान सी महकती हूँ 

गुलदान सी महकती हूँ, छूकर नजऱों से जाम करते हो... प्यास बनकर जो बरसती हूँ.. इन्द्रधनुषी सी शाम करते हो...तेरी...इश्क़ की शिवाला में..फिर गज़लें, मुकम्मल रमजान बनती है...अहसास सज़दे में जो झुकाती हूँ लफ्ज़़ आयत से..पाक लगते हो! किरण मिश्रा 

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 मुझको लफ्ज़़ों में बाँधोगे

 मुझको लफ्ज़़ों में बाँधोगे

मुझको लफ्ज़़ों में बाँधोगे, ख़्वाब न ऐसे पालो तुम मुझको अपनी गज़़ल कहोगे, ख़्वाब न ऐसे पालो तुम बातों में घोली है तुमने दुनिया भर की शक्कर क्यों रफ़्ता रफ़्ता फुसला लोगे, ख़्वाब न ऐसे पालो तुम शरद ऋतू वाली पूनम के चाँद सरीखा मेरा दिल झरते अमृत में भीगोगे,...

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पलकों को अश़कों के

पलकों को अश़कों के

 पलकों को अश़कों के समुंदर देने की जरूरत क्या थी, तोहफ़े में रुसवाईयों के शहर देने की जरूरत क्या थी, एक बार कहा तो होता हम आँखों में काट देते जि़ंदगी, मेरी रातों की नींदों को प्तज़हर देने की जरूरत क्या थी। अनिल अनमोल शर्मा

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