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रचनाएँ

 यही तो है कुछ दास्तां अजीब 

 यही तो है कुछ दास्तां अजीब 

यही तो है कुछ दास्तां अजीब होती है कदम- कदम चल पड़ते है हम वहाँ तक फिर वहीं से एक-एक कदम लौटना पड़ता है लौटने में दर्द का छलावा होता है और समेटना होता है अपने आप को समेटना शुरु... पर आसान नही है ये अपने आप से इन्द्रिय निग्रह...

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 बहुत हो गई देरी बेटे वापस

 बहुत हो गई देरी बेटे वापस

बहुत हो गई देरी बेटे वापस आजा ना .. पलकें बिछाये बैठी है माँ पल-पल तेरी राह देखे अब ना सताना.. टूट गई माँ तेरी साँसे थकने लगी झील बनी आँखे बस कर रूलाना आँचल मेरा पुकारे तुझे आजा इसके छांव तले अब न भटकना .. माँ की बांहे खोजे...

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जैसे एक घर बनाने

जैसे एक घर बनाने

जैसे एक घर बनाने के लिए हमें एक योजना की आवश्यकता होती है, वैसे ही जिंदगी बनाने के लिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि हमारे पास लक्ष्य के रूप में महत्वपूर्ण योजना आवश्य हो। सत्यम सिंह बघेल

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 आँखों में इक सवाल

 आँखों में इक सवाल

रात दिन इक मलाल अब भी है, आँखों मे इक सवाल अब भी है, साथ तुम हो नही सनम लेकिन, पर तुम्हारा खयाल अब भी है।।  गोविन्द शर्मा 

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 मैं कहाँ पर हूँ उसे कौन बता देता है 

 मैं कहाँ पर हूँ उसे कौन बता देता है 

मैं कहाँ पर हूँ उसे कौन बता देता है । जहाँ जाऊँ वहीं आवाज लगा देता है ।। अजीब शख्स है एक पल जुदा नहीं रहता । रात की नींद दिन का चैन उड़ा देता है।।  मनोज कुमार मून

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वो पीठ पीछे बोलने वाले लोग

वो पीठ पीछे बोलने वाले लोग

वो पीठ पीछे बोलने वाले लोग वो हाथ में नुकीली धार लिए लोग  कब कहाँ कैसे कुछ कर जाए असंख्य समस्या बना जाए कुछ कहा नहीं जा सकता! (पीठ पे वार)। पुष्पा त्रिपाठी 'पुष्प

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  बारिश में हल्की खुराक पानी सी होनी चाहिए

  बारिश में हल्की खुराक पानी सी होनी चाहिए

बारिश में हल्की खुराक पानी सी होनी चाहिए..  तेल तैरे पानी पर पकौड़ा तैरे तेल पर बस हल्का है पकौड़ा सबसे यही सत्य मानिए आनंद उठाने मौसम का यही पेट में डालिए। मंगलमयी मानसून....। अशोक मिश्रा 

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दोनों का संगम करे

दोनों का संगम करे

  सागर अरु संगीत का, चोली दामन साथ ।। लहरें दोनों खींचती, फैलाकर दो हाथ ।। कल-कल बहती हैं सदा, खुदी बनाकर राह, दोनों का संगम करे, नाथों के वो नाथ ।।  मिथलेश सिंह 

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 एक साथ देना तुम कुछ 

 एक साथ देना तुम कुछ 

एक साथ देना तुम कुछ नहीं चाहिए, बस... हो अगर दुविधा उलझन को सुलझाना, हो जाऊ परेशां ख्याल बन जाना, अश्क बहें तो वो रुमाल तू बन जाना आँधियों मे  छोड़ न जाना हाथ  दोस्ती बन आये हो सारथी बन जाना तुम, कहना बहुत कुछ शब्द जऱा कम है रो...

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 झिलमिल तारों की बगिया में

 झिलमिल तारों की बगिया में

शून्य गगन में खिला चंद्र यह, करता तारों से बातें। हाथ उठाये बाट जोहती, बीती यहाँ घनी रातें।। चाहत दिल में हरपल पाले, पास कभी वो आयेगा। झिलमिल तारों की बगिया में, लोरी मुझे सुनायेगा ।। मंद पवन हर्षाता मौसम, लोहित है धरणी सारी। नीलांबर है देखो सुंदर, मोहित मन...

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 कल कभी आता नहीं और आज

 कल कभी आता नहीं और आज

आज से बेहतर कुछ नहीं क्योंकि कल कभी आता नहीं और आज कभी जाता नहीं इसलिए स्वस्थ रहे मस्ते रहे और अपने काम में व्यस्त रहे।  हरिराम चोयल

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  पिता की सरपरस्ती में पलती हैं बेटियाँ

 पिता की सरपरस्ती में पलती हैं बेटियाँ

पिता की सरपरस्ती में पलती हैं बेटियाँ, थाम के अँगुली पिता की पहला कदम चलती हैं बेटियाँ, तकलीफ हो गर कोई तो पिता का संबल बनती हैं बेटियाँ,  जिन्दगी में संघर्ष का सबक पिता से ही सीखती हैं बेटियाँ।। तेरे बिन तेरे संग। मीना सोनी 

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 दर्द , अच्छा भला नही मिलता

 दर्द , अच्छा भला नही मिलता

दर्द , अच्छा भला नही मिलता। धूप में काफि़ला नही मिलता। लौट आती है खाली आवाज़ें। अब कोई रहनुमा नही मिलता। आज सब है पुजारी जिस्मों के। प्यार सच्चा यहां नही मिलता। भीड़ है इस ज़मी पे चहरो की। कोई दिल बावफा नही मिलता। किससे कहिएगा दिल की बेताबी। दर्द...

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 गुलदान सी महकती हूँ 

 गुलदान सी महकती हूँ 

गुलदान सी महकती हूँ, छूकर नजऱों से जाम करते हो... प्यास बनकर जो बरसती हूँ.. इन्द्रधनुषी सी शाम करते हो...तेरी...इश्क़ की शिवाला में..फिर गज़लें, मुकम्मल रमजान बनती है...अहसास सज़दे में जो झुकाती हूँ लफ्ज़़ आयत से..पाक लगते हो! किरण मिश्रा 

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 मुझको लफ्ज़़ों में बाँधोगे

 मुझको लफ्ज़़ों में बाँधोगे

मुझको लफ्ज़़ों में बाँधोगे, ख़्वाब न ऐसे पालो तुम मुझको अपनी गज़़ल कहोगे, ख़्वाब न ऐसे पालो तुम बातों में घोली है तुमने दुनिया भर की शक्कर क्यों रफ़्ता रफ़्ता फुसला लोगे, ख़्वाब न ऐसे पालो तुम शरद ऋतू वाली पूनम के चाँद सरीखा मेरा दिल झरते अमृत में भीगोगे,...

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पलकों को अश़कों के

पलकों को अश़कों के

 पलकों को अश़कों के समुंदर देने की जरूरत क्या थी, तोहफ़े में रुसवाईयों के शहर देने की जरूरत क्या थी, एक बार कहा तो होता हम आँखों में काट देते जि़ंदगी, मेरी रातों की नींदों को प्तज़हर देने की जरूरत क्या थी। अनिल अनमोल शर्मा

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